हम ये क्यों नहीं कहे
कि कुछ भी नहीं बदला। हम ये क्यों नहीं कहे कि बदलाव एक वहम है, एक छलावा है,
झूठ है। अगर कुछ दिन कि बात हो तो मान भी लेते लेकिन जहां कई दसक बीत
जाए वहां तो इंतजार का फलसफ़ा भी मर जाता है। इसलिए अरुणा शानबाग की कहानी ज़िंदा लाश
की कहानी है। जो 42 बरस से हिंदुस्तान के फिज़ा में चलती आ रही है। साथ ही सवाल की
एक अनसुलझी गुत्थी भी सामने रख रही है, जिसे इस मुल्क के हर शख़्स
को सुलझाने हैं। अरुणा मर गई क्योंकि वो और इंतज़ार नहीं कर पाई। इन 42 सालों को किसी
ने परखा तो वो अरुणा ही थी और उसकी मौत इस बात की गवाही देती है कि इस मुल्क में चाहे
जो भी हो जाए यहां के लोगों की सोच कभी नहीं बदल सकती। चाहे ये मुल्क मंगल पर ही क्यों
न चला जाए या फिर विकासशील से विकसित ही हो जाए पर इनकी मानसिकता वहीं रहेगी जो 29
नवंबर 1973 की रात को थी। हां, यही सच है।
सच तो ये भी है कि
यहां तस्वीर का फ्रेम तो बदल जाता है लेकिन तस्वीर नहीं बदलती। भारतीय समाज की संरचनाकाल
से जो जड़ता चला आ रहा है वो आज 21वीं सदी में भी नहीं खत्म हो पा रहा है। भारतीय समाज
सदियों से पुरुष प्रधान रहा है जहां महिलाओं को बस एक उपभोग की वस्तु समझा जाता है, ऐसी सोच में
क्या बदला है? जिन महिलाओं की दुनिया
घर कि चौखट तक सीमित रहती थी उसके हालात कितने बदले? ऐसे प्रश्नों को अगर आज बदले
हुए पैमाने पर पूछा जाए तो इतना साफ है कि बदलाव आया है कि आज महिलाओं की हक़ की बात
ज़ोरशोर से हो रही है,
महिलाएं अब घर की चौखट से निकल कर बाहर आ गई हैं। पुरुष के साथ कदम से
कदम मिला कर चल रही है। यहां तक की वो चांद तक जा पहुंची है। बहुत कुछ बदल चुका है
लेकिन नहीं बदला तो अभी तक जड़ता वाली सोच। आज भी घर से लेकर दफ्तर तक महिला सशंकित
है। सड़क पर, बस में, यहां तक की अपने घर वालों के साथ भी सुरक्षा का वो अहसास नहीं
होता जितनी आज़ादी का अहसास भारतीय पुरुषों को होता है। यूं तो कहने के लिए भारतीय
महिलाएं अब किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है लेकिन एक अकेलापन, एक खालीपन,
एक सुनापन और एक असुरक्षा का भाव हर पल महिलाओं में होती है। दामान में आंसू और सीने
में दर्द, मजबूरी पहचान और खामोशी आदत आज भी भारतीय महिलाओं से
अलग नहीं हुआ है। क्योंकि ऊपर से लिबास चाहे विदेशी क्यों ना हो लेकिन अंदर की काया
भारतीय ही होती है, जिस काये को आज हिंदुस्तान में सिर्फ आधी आज़ादी ही मिल पाई है।
नहीं तो एक मौत को मरने में 42 साल नहीं लगता, कोई जिंदगी किसी
की हवस मिटा कर सड़कों पर नहीं तड़पती। कोई नन्ही मासूम अपनी मासूमियत नहीं खोती। कोई
बेटी पेड़ से नहीं लटकती। कोई बाप जीते जी नहीं मरता। लेकिन अरुणा की मौत देश में एक
दिन के लिए हदासा जरूर रहा।
चाहे अब आप इसे हादसा
कहो या फिर वारदात, जो भी हो क्या फर्क पड़ता है...अरुणा तो 42 साल से लगातार मर रही
थी और अब जा के उसे मुकम्मल ज़िंदगी मिली है। क्यों होता है ऐसा हमारे ही देश में जहां
मौत भी आसानी से नहीं आती और ज़िंदगी से तो कोई वास्ता ही नहीं रहता। क्यों हर एक ऐसी
कहानियों पर मातम मनाता है ये मुल्क....क्यों इतना लाचार हो गया ये मुल्क। बेबसी की
ऐसी कौन सी बेड़ी है जिसे सदियों से हम तोड़ नहीं पा रहे हैं। आखिर किस कड़ी में हमसे
चूक हो जाती है की ज़हिनयत को चीर कर रख देने वाली घटना घटती है और हम आंसू बहाते हैं।
हाथों में मोमबत्ती और जुबां पर नारे कुछ भी नहीं बदल सकें बजाय राजनैतिक चुल्हों की
आग के अलावा।
इस सुनसान रास्ते पर
सदियां गुज़र गई
ना सफर ही बदला ना
मंजिल ही आई
pranav jha


