Thursday, 28 May 2015

बदलाव एक छलावा...



हम ये क्यों नहीं कहे कि कुछ भी नहीं बदला। हम ये क्यों नहीं कहे कि बदलाव एक वहम है, एक छलावा है, झूठ है। अगर कुछ दिन कि बात हो तो मान भी लेते लेकिन जहां कई दसक बीत जाए वहां तो इंतजार का फलसफ़ा भी मर जाता है। इसलिए अरुणा शानबाग की कहानी ज़िंदा लाश की कहानी है। जो 42 बरस से हिंदुस्तान के फिज़ा में चलती आ रही है। साथ ही सवाल की एक अनसुलझी गुत्थी भी सामने रख रही है, जिसे इस मुल्क के हर शख़्स को सुलझाने हैं। अरुणा मर गई क्योंकि वो और इंतज़ार नहीं कर पाई। इन 42 सालों को किसी ने परखा तो वो अरुणा ही थी और उसकी मौत इस बात की गवाही देती है कि इस मुल्क में चाहे जो भी हो जाए यहां के लोगों की सोच कभी नहीं बदल सकती। चाहे ये मुल्क मंगल पर ही क्यों न चला जाए या फिर विकासशील से विकसित ही हो जाए पर इनकी मानसिकता वहीं रहेगी जो 29 नवंबर 1973 की रात को थी। हां, यही सच है।

सच तो ये भी है कि यहां तस्वीर का फ्रेम तो बदल जाता है लेकिन तस्वीर नहीं बदलती। भारतीय समाज की संरचनाकाल से जो जड़ता चला आ रहा है वो आज 21वीं सदी में भी नहीं खत्म हो पा रहा है। भारतीय समाज सदियों से पुरुष प्रधान रहा है जहां महिलाओं को बस एक उपभोग की वस्तु समझा जाता है, ऐसी सोच में क्या बदला है? जिन महिलाओं की दुनिया घर कि चौखट तक सीमित रहती थी उसके हालात कितने बदले? ऐसे प्रश्नों को अगर आज बदले हुए पैमाने पर पूछा जाए तो इतना साफ है कि बदलाव आया है कि आज महिलाओं की हक़ की बात ज़ोरशोर से हो रही है, महिलाएं अब घर की चौखट से निकल कर बाहर आ गई हैं। पुरुष के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही है। यहां तक की वो चांद तक जा पहुंची है। बहुत कुछ बदल चुका है लेकिन नहीं बदला तो अभी तक जड़ता वाली सोच। आज भी घर से लेकर दफ्तर तक महिला सशंकित है। सड़क पर, बस में, यहां तक की अपने घर वालों के साथ भी सुरक्षा का वो अहसास नहीं होता जितनी आज़ादी का अहसास भारतीय पुरुषों को होता है। यूं तो कहने के लिए भारतीय महिलाएं अब किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है लेकिन एक अकेलापन, एक खालीपन, एक सुनापन और एक असुरक्षा का भाव हर पल महिलाओं में होती है। दामान में आंसू और सीने में दर्द, मजबूरी पहचान और खामोशी आदत आज भी भारतीय महिलाओं से अलग नहीं हुआ है। क्योंकि ऊपर से लिबास चाहे विदेशी क्यों ना हो लेकिन अंदर की काया भारतीय ही होती है, जिस काये को आज हिंदुस्तान में सिर्फ आधी आज़ादी ही मिल पाई है। नहीं तो एक मौत को मरने में 42 साल नहीं लगता, कोई जिंदगी किसी की हवस मिटा कर सड़कों पर नहीं तड़पती। कोई नन्ही मासूम अपनी मासूमियत नहीं खोती। कोई बेटी पेड़ से नहीं लटकती। कोई बाप जीते जी नहीं मरता। लेकिन अरुणा की मौत देश में एक दिन के लिए हदासा जरूर रहा।  


चाहे अब आप इसे हादसा कहो या फिर वारदात, जो भी हो क्या फर्क पड़ता है...अरुणा तो 42 साल से लगातार मर रही थी और अब जा के उसे मुकम्मल ज़िंदगी मिली है। क्यों होता है ऐसा हमारे ही देश में जहां मौत भी आसानी से नहीं आती और ज़िंदगी से तो कोई वास्ता ही नहीं रहता। क्यों हर एक ऐसी कहानियों पर मातम मनाता है ये मुल्क....क्यों इतना लाचार हो गया ये मुल्क। बेबसी की ऐसी कौन सी बेड़ी है जिसे सदियों से हम तोड़ नहीं पा रहे हैं। आखिर किस कड़ी में हमसे चूक हो जाती है की ज़हिनयत को चीर कर रख देने वाली घटना घटती है और हम आंसू बहाते हैं। हाथों में मोमबत्ती और जुबां पर नारे कुछ भी नहीं बदल सकें बजाय राजनैतिक चुल्हों की आग के अलावा।

इस सुनसान रास्ते पर सदियां गुज़र गई
ना सफर ही बदला ना मंजिल ही आई

pranav jha


Friday, 22 May 2015

सिमरिया के 'दिनकर'


बिहार के बेगुसराय के सिमरिया गांव जहां इतिहास के सुखे पेड़ से आज भी फूल गिरते हैं और आज के दौर के सियासत के नुमांइदों को सावधान करते हुए कहते हैं कि
"हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहां,
वो जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है"।

ये फूल कोई और नहीं रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताओं के फूल हैं जो आज भी पूरे देश को समय-समय पर दिशा निर्देशित करता रहता है। वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता के मद में चूर हो कर उल्टे-सीधे फैसले लेने लगी थी जब बिहार के जयप्रकाश नारायण ने "सिंहासन खाली करो की जानता आती है" का नारा देते हुए संपूर्ण क्रांति का आवाह्न किया था।
अगर 'उर्वशी' को छोड़ दें तो वीररस के कवि दिनकर जी की कविता में हमेशा ही स्वछंदता रही है, चाहे वो अंग्रेजों का काल हो या फिर स्वतंत्र भारत की, दिनकर जी अपनी कविता से हमेशा समाज के दलित, पीड़ित और शोषकों को प्रमुखता से जगह दिया है। रामधारी सिंह दिनकर हमेशा से ही जात-पात के विरोध में रहे और उन्होंने कहा भी था जब तक बिहार जात-पात के बंधन से मुक्त नहीं होगा तब तक बिहार का सर्वगिन विकास संभव नहीं है। ग़ुलाम भारत में जन्मे दिनकर की रचना में शुरू से ही देशभक्ति की भावना रही है जिसे देख कर अंग्रेजों ने उनकी किताबों पर रोक लगा दी थी लेकिन उनकी भावनाओं को कभी नहीं दबा पाएं। बाद में जब देश आज़ाद हुआ और नेहरु की सरपरस्ती में सरकार बनी तब रामधारी सिंह दिनकर नेहरु के करीबी माने जाते थे क्योंकि दिनकर कि लिखी किताब संस्कृति के चार अध्याय की भूमिका जवाहरलाल नेहरू ही लिखे थे लेकिन जब 1962 के युद्ध में हमारे सैनिक मारे गए तब वो नेहरु के आलोचना करने से भी नहीं चुके, परशुराम की प्रतीक्षा में दिनकर लिखते हैं
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है
समझो, उसने ही हमें यहां मारा है।

ये सिमरिया के ही दिनकर हैं जिन्होंने साहित्य को एक ऊंचाई दी। साथ ही, पूरे देश में राष्ट्रीय कवि के रूप में जाने गए। दिनकर को उनके महान रचनाओं के लिए कई पुरुस्कार भी मिलें संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी और उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। साथ ही दिनकर जी को पद्म विभूषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया। द्वापर युग कि घटना महाभारत पर लिखी कुरुक्षेत्र काव्य रचना को विश्व के 100 काव्यों में 74वां स्थान दिया गया है।
बिहार की पावन धरती में से एक बेगुसराय जिला का सिमरिया गांव रहा है क्योंकि सिमरिया में गंगा नदी बहती है। जहां आज भी लोग जा कर मां गंगा का दर्शन और स्नान करते हैं। यहीं रामधारी सिंह दिनकर का जन्म हुआ था। वैसे तो दिनकर हमेशा अपने गांव से दूर ही रहे लेकिन अपनी जन्मभूमि से वो बेहत प्यार करते थे और सिमरिया को वो कभी नहीं भूले साथ ही अपने गांव को याद करते हुए लिखते हैं
हे जननी जन्मभूमि सतबार नमन
तुझ सा ना सिमरिया घाट  अन्य
रामधारी सिंह दिनकर देश के विकास में महिलाओं की भूमिका को अग्रणीय मानते थे, वो मानते थे कि जब तक देश की आधी आबादी अपनी भूमिका में नहीं आएगी तब तक किसी भी राज्य देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाएगा इसलिए दिनकर जी ने स्त्रियों की स्थिति पर गहरा शोध किया और उसी नतीजे के अनुसार उन्होंने कहा कि जबतक भारत की महिलाएं शिक्षित नहीं होगी तब तक ना तो उसका विकास हो पाएगा ना ही देश का लेकिन विडंवनाओं के इस देश में यह भी विडंवना है कि स्त्रियों की हालात को शिक्षा के माध्यम से सुधारने कि कोशिश में जिस कन्या आवासीय विद्यालय को खोला गया था, वो विद्यालय आज खंडहर बन चुका है और दिनकर का गांव बदहाली में जी रहा है, और आज भी बिहार शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ है। वहीं भारत में कवियों की जन्मभूमि हमेशा से उपेक्षित ही रही है और उसी कड़ी में सिमरिया भी है। दिनकर के नाम पर समर्पित एक सभागार के नाम पर सिर्फ एक छत खड़ी कर दी गई है जो किसी भी काम की नहीं है। वहीं शिक्षा का स्तर भी दैयनीय बना हुआ है। ऐसी कल्पना तो नहीं किए थे हमारे राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह 'दिनकर'।

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;

सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)

हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।

(परशुराम की प्रतिक्षा से)