Sunday, 14 September 2014

जन्नत बनाम दोजख



दीदार-ए-जन्नत की चाह में ऐ खुदातुने जन्नत ही मुकम्मल कर दिया.........

जिस जन्नत की चाह के लिए हम खुदा से हर वक्त दुआ करते हैं वो खुदा आज इतना बेरहम हो गया कि जन्नत को दोजख में तबदील कर दिया...।

खूबसूरती खतरनाक होती है सुनते आ रहे थे पर इस कदर खतरनाक होगी सोचा नहीं था। हंसी वादियों की दिदार के चाहत में निकले हिंदुस्तान के हजारों परिवारों के घर आसूं का सैलाब निकल रहा है, गुनाह इतना है कि उन्होंने जमीं पर जन्नत कश्मीर  को देखना की जहमत की।

उस दिन सहर तो वहां भी हुई थी लेकिन उस जमीं पर जन्नत का एहसास कराने वाले इस शहर की तस्वीर दुनिया ने कुछ और देखी...हर तरफ चीख थी, पुकार था, दर्द ऐसा ता की उसके बारे में सोचने मात्र से रूह खड़ा हो जाए।

जिस डल झील को पर कल तक सिकारों में लोग स्वर्ग की अनुभूति लेते थे वो झील लोगों से इस कदर रूठा कि अपने सैलाब में लोगों को ही डुबोने लगा। तबी नदी इतना बैखला गई की शहर के हर घर में घुस गई। देखेत ही देखते पूरा कश्मीर घाटी एक पानी के समंदर में तब्दील हो गया और हर तरफ बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी किसी भी तरह जान बचा लो।

सैलाब में बहती लाशों और टूटती आशों के बीच आसमान के काले बदलों को रौंदता हुआ जब सेना के हेलिकॉपटरों की आवाज जब यहां घरों में फंसे बेजान हो रहे इंसानों के कानों में पड़ी तो जैसे लगा कि खुदा सीधे आसमां से उतर कर जमीं पर आ गया हो और देखते ही देखते सेना के वीर जवानों में लाखों लोगों को सही ठिकाने पर पहुंचा दिया।

केंद्र सरकार ने फुर्ती दिखाई और सहायता तेज करने की मुहिम में लगी तो राज्य सरकार भी उसके साथ कदमताल करती दिखी। फंसे हुए लोगों को घर तक खानापूर्ति से लेकर अन्य सहायक चीजों की आपूर्ति  होने लगी।

पर जो इस वादी के दीदार का ख्याल लिए अपने घर से निकले थे उसमें से बहुत सारे लोग घर नहीं लौट पाए। उनके परिवार के आंखू के उस आंसू की कीमत ना तो सरकार के पास है और ना ही भगवान के पास...।

आखिर इस हादसे का गुनहगार कौन है? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर हर शक्स के जेहन पर है पर जुवान इस बाहर निकालने के कतराता है। लेकिन सच को कब तक हाशिए पर रखेंगे वो आप के सामने ऐसे ही कभी उत्तराखंड के रूप में सामने आएगा तो कभी कश्मीर घाटी की तरह।
प्रकृति ने हम सब को अपने गोद में जगह दिया है वो हमें पाल रहा है लेकिन हम हैं कि जिस डाल पर बैठे हैं उसी डाल को काट रहे हैं। विकास के नाम पर अंधे हो चुके हम आज के दौर में उस 
प्रकृति के साथ लागातार खिलवाड़ कर रहे हैं और जिसका नतीजा भी हम भुगत रहे हैं। फिर भी हमारी नींद ऐसी है कि खुलती नहीं। जिस जन्नत को हम कुरानों में गीता में वेद में बाइबल में पढ़ते आ रहे हैं वो जन्नत कहां है?  हमें नहीं मालूम, लेकिन जिस जन्नत को आंखों से दीदार करते हैं, उसी को अपने हाथों मिटा भी रहे हैं। 

प्रकृति ने इस कायनात को बहुत शिद्दत से खुबसूरत बनाया है और इसी कायनात में वो सारी चीजें हैं, जो हमें इन पाक किताबों में लिखा गया इसे देखने के बाद कुछ भी नहीं, जो अनदेखा हो लेकिन ख्वाब की धरा पर हम हकिकत से इस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं कि हर सहर में एक विरान शहर हो रहा मिट रहा है खुदा की नेमत, बर्बाद हो रहा है ईश्वर का वरदान..।


जागो कि अब देर हो रही है। 

Pranav Jha