Saturday, 16 March 2013

कानून पर सवाल


                
16 दिसंबर की रात जब दिल्ली के सड़क पर चलती बस में इंसानिय को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम दिया गया उसके बाद पूरे देश की जुबना पर बस एक ही मांग था कड़े कानून..कड़े कानून ताकी फिर से कोई इस जघन्य अपराध को दोहराने के लिए 100 बार सोचे...।

पूरे देश के इस मांग को लेकर जब देश के नीति निर्माताओं ने पूरा करने की सोची तो एक ऐसा कानून देश के सामने ला कर रखा जिससे पूरे देश के महिलाओं को ही नागावर गुजर रहा है...साथ ही पुरुष वर्ग में भी खासी रोस देखी जा रही है...।पूरा देश इस कानून के प्रवाधानों के लेकर हतप्रभ है...इस कानून के तहत किसी भी महिला की तरफ 17 सेकेंड से ज्यादा देखा तो वो पुरुष अपराध की श्रेणी में आएगा और कोर्ट से उसे बेल भी नहीं मिलागा...अगर कोई लड़का किसी लड़की के पीछे चल रहा है और लड़की उसकी शिकायत पुलिस से कर दे कि ये मेरा पीछा कर रहा है तो वो लड़का गया काम से...अगर बस ट्रेन या फिर कही भी गलती से भी कोई किसी महिला से टक्करा जाए या टच हो जाय तो वो लड़का या पुरुष अपराधी घोषित हो जाएगा...और सबसे अनर्गल प्रावधान ये दिया गया है कि अब कोई 16 साल की उम्र में ही मर्जी से किसी के साथ संबंध बना सकता है...।
कानून के इस प्रावधान के बारे में जान कर पूरे देश में बस बहस छिड़ी हुई है...यहां तक की कई लोग इस कानून को तालिबानी कानून के साथ जोड़ कर देख रहे हैं...महिलाओं के लिए बनाए जा रहे इस कानून के बारे में जब लड़कियों और औरतों से पूछा गया तो वो भी इस कानून के पुरजोर विरोध में दिख रही हैं क्योंकि हर महिला या लड़की के घर में उसका भाई बेटा और पति भी रहता है ऐसे में कानून के आने के बाद हर घर में दहशत का साया हमेशा दिखेगा...महिलाओं की सुरक्षित करने के लिए लाए जाने वाले इस कानून के सकारात्मक पहलु से ज्यादा नकारात्मक पहलु ज्यादा नजर आता है...।

ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स यानि जीएमओ के बाद यह कानून कैबिनेट में भी पास हो गया है अब बस आखरी पड़ाव यानि संसद के दोनों सदनों में पास होने बाकि है...वैसे ये राह आसान नहीं नजर आ रहा पर अगर ये प्रस्ताव संसद में पास हो जाता है तो फिर पूरे देश में इस कानून को लेकर एक तरह से अराजकता के माहौल पैदा हो सकता है...।

वहीं दूसरी तरफ दुष्कर्म जैसे अपराध को रोकने के लिए सरकार संबंधों की उम्र घटाने जैसे बचकानी फैसले को तरजिह दे रही है...क्या संबंध के उम्र को घटाने मात्र से दुष्कर्म जैसे वारदातें कम हो जाएगी? क्या ऐसे कठोर कानून पारित कर के समाज के कुपोषित मानसिकता को बदला जा सकता है? क्या इस कानून के तहत समाज की नजरिया को बदला जा सकता है? जहां तक ऐसे मानसिकता वाले लोगों का सवाल है वो अपनी हवस की आग को बुझाने के लिए उम्र को ताक पर रख कर 2-4 साल के बच्चियों को भी अपना शिकार बनाते हैं वहीं सरकार संबंधों का कम उम्र घटा कर ऐसे प्रवृति वाले लोगों के लिए एक सौगात साबित नजर आती दिखती है...।

अगर इस कानून को सियासत की चश्में से देखा जाय तो ये सिर्फ 2014 में सियासी घमासन को नजर में रख कर आनन-फानन में लिया गया एक बेतुका फैसला ही देखा जा रहा है...। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की भूमिका भी इस मामले में शून्ह ही नजर आ रही है कहने को तो अधिकांश विरधी दल इस बिल का विरोध कर रहे है पर वो सिर्फ कहने मात्र के लिए है पर धरातल पर वो भी सत्ता पक्ष की भाषा बोल रहा है पहले जमाने में कहा जाता था कि जिस राज्य देश में विपक्ष की भूमिका ना के बराबर हो या उसका हस्तक्षेप तरजीह लायक ना हो तो उस देश या राज्य का पतन तय होता है साथ ही विपक्ष की समाप्ति भी तय हो सुनिश्ति हो जाती है...और कुछ ऐसा ही मौहोल अब इस मुल्क में भी दिख रहा है जहां विपक्ष सत्ता पक्ष के हां में हां मिलाता नजर आ रहा है...
देश एक ऐसा कानून का मांग कर रहा है जिसमें महिला समेत देश में बढ़ रहे अपराधिक प्रवृति के पूर्ण तरह से सफाया हो जाए पर जिस तरह से देश के सिरोधज कानून को अंतिम रूप दे रहे है उससे तो अपराध को जड़ से मिटाने की बात दूर-दूर तक नहीं दिखता वहीं इस कानून से सिर्फ अपराध को दबाने की गुंजाइस ही दिख रहा और किसी चीज को दबने से वो खत्म नहीं होता...बाद में उसका परिणाम और भी खतरनाक ही साबित होता है...जिसका उदाहरण हम कश्मिर घटी में से ले सकते हैं...।

अब सवाल ये है कि देश के नीति निर्माताओं को देश और देशवासियों का कोई ख्याल नहीं है? क्या सियासतदान सिर्फ अपने वोट बैंक को बचाने के लिए देश के साथ किसी भी हद तक मजाक करने को आतुर हैं? क्या ऐसे कानून पारित करने से महिला पुर्ण रूप से सुरक्षित हो जाएगी?  क्या इस बिल को पास करने से पूरे देश का बिगड़ा मिजाज ठीक हो जाएगा? अगर नहीं... तो फिर इस बिल की मौलिकता क्या है और इसे पास कर के सरकार क्या साबित करना चाहिती है?....ये हम नहीं पूरा देश पूछ रहा है
प्रणव झा 

Sunday, 10 March 2013

सुरक्षा पर सवाल


 भारत आजाद तो हो गया पर आजादी तो सही मायने में हमारे देश के नीति निर्माताओ को मिली जिसका सिला वो हमारे देश को समय समय पर देते आ रहे है जो ना तो देश और ना ही देशवासी के लिए कतई उचित..जिसका असर सीधे तौर पर देश की अस्मिता पर भी बुरी तरह से पड़ रहा है..देश की परिधी की रक्षा के लिए जिस रक्षा विभाग पर पूरे देश का विश्वास टिका हुआ है अगर उसके विश्वसनियता पर सवाल उठे तो फिर देश का क्या होगा...।
पर अगर एक नजर हम आजादी के बाद के वर्षों पर दें तो हमारे विश्वास कई बार तोड़ा गया और तोड़ने का सिलसिला लगातार अभी तक चलता ही आ रहा है...आजादी के अगले वर्ष जब हम आजादी की पहली सालगिरह मना रहे थे तभी देश को जीप धोटाले ने हमारे निजाम के ईमानदारी पर एक काले सवाल का दाग चस्पा कर दिया और शुरू हो गया धपले धोटालों का दौर...1981 में पनडुब्बी धोटला,1986 में बोफोर्स घोटाला जिसमें दिवंगत पूर प्रधानमंत्री राजीव गांघी की ईमानदारी को अपने स्याह दामन में लिया पर हाल में ही सर्वोच्य न्यायालय ने उनके दामन को पाक साफ बताया...पर इससे तत्कालिन सरकार का दमान नहीं साफ होता...फिर 1996 मिसाइल घोटाला,1999 में ताबूत धोटाला, 2003 में राइफल धोटाला, 2005 में लीक प्रकरण, 2009 में ओएपबी कांट्रेक्ट फिक्सिंग, 2011 में टेट्रा ट्रक धोटला और अब 2013 में हेलीकॉप्टर घोटाला...।
ये तमाम धोटालें हमरे सिस्टम को एक नई परिभाषा देने के लिए काफी साबित हो रहे है...। धपले धोटाले और भ्रष्टाचार के इस दौर में सबसे बड़ा सवाल ये निकल कर आता है कि आखिर हम किस आधर पर कहें कि हम अपने मुल्क में सुरक्षित है क्या हमारे निजाम हमें इसका भरोसा देंगे...अगर औपचारिकता बस वो हमें ये भरोसा देते भी है तो हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली में होते बम धमाके आतंकी हमले इनके वादों का पोल समय-समय पर खोल कर रख देता है...। बात यहीं जा के खत्म नहीं होती ये सारे हमले तो देश की परिधी के बाहर से होता है जिससे सीमा सुरक्षा और इंटेलिजेंस ब्यूरो की सक्रियता को सवाल के धेरे में लेता ही है...अब बात करे देश की आंतरिक मामलों की तो हम यहां और भी हताश हो जाते हैं...माओवाद, नक्सलवाद, भगवा आतंकवाद और सबसे बड़ा ठेकेदार हम यहां भी उतना ही पंगू साबित होते है जितना हम बाहरी आतंकबाद से लड़ने में...। जहां पूरे मुल्क का सुरक्षा का भार उठाए हमारे सेना में भ्रष्टाचार का इस कदर बोलवाला है वहीं देश के आंतरिक सुरक्षा का ठेका उठाए हमारे कानून और प्रशासनका जमीर भ्रष्टाचार के सामने झुक चुका है और ये पूरी तरह से नकार साबित होते ही जा रहे है...।
हाल फिलहाल में हेलीकॉप्टर घोटाले ने देश के उस जख्म को फिर से हरा कर दिया है जो जख्म देश को बोफोर्स घोटाले ने दियाऔर एक बार फिर से देश के हुक्मरान से लेकर सैन्य प्रमुखों के विश्वसनियता को सवाल के कटघरे में ला कर खड़ा कर दिया है...।अब सवाल सिर्फ सैन्य प्रमुखों और सेनाओं की विश्वसनियता तक ही सीमित नहीं रहा सवाल अब भारत के 1.5 करोड़ लोगों के अस्तिवत्व का है...जो अपने आप को 24 घंटे असुरक्षित महसूस कर रहे हैं..चाहे वो भारत का कोई गांव हो या शहर...और भारत सरकार की रुख सुरक्षा को लेकर जो है वो बहुत ही हताश करने वाला है...हमारे सेना के पास ना तो आधुनिक हथियार है और ना ही आधुनिक तकनीक और इस बार बजट में वित्त मंत्रालाय ने रक्षा-बजट में 10 हजार करोड़ का कटौती की है जिसका असर निश्चित तौर पर हमारी सेना पर पड़ेगा ही और हमारी सेना का गुणवत्त में कमी ही आएगी...।
इन सब के बीच भारत को अपने पड़ोसियों से भी सतर्क रहन की जरूरत है जहां एक तरफ अंदरुनी भूचाल से जूझ रहे पाकिस्तान हमेशा की तरह सरदर्द बना हुआ है और वहां की फौज अपने मुल्क में अपना बर्चस्व बनाने के लिए भारत के अंदर गड़बड़ियां फैलाने से बाज नहीं आ सकता है...वहीं अधिनाकवाद चीन भी पाकिस्तना के नापाक करगिस्तानी में अपनी समान्य भूमिका निभाता हुआ नजर आ रहा है..और पाकिस्तना की मदद से वह हमारी सेना पर भी नजर गड़ए हुए है वहीं 90 हजार वर्ग किलोमीटर के भारतीए क्षेत्र पर अपनी दावेदारी करता आ रहा है...और हमारी सीमाओं पर उसकी हमेशा से निगेहवानी रही है...।
ऐसे में जो तस्वीर उभर कर सामने आती है उस बाबत में रक्षा क्षेत्र में हमरी तैयारी भी पुख्ता होनी चाहिए..और हम भी कभी भी किसी भी बाहरी मुसिबत से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहें...। पर हमरे देश के अंदर जो कोलाहल मचा है उसी में हम और हमारे निजाम झूझ रहे है और उनके पास वक्त ही नहीं है कि उससे निकल कर इस मुद्दे पर भी विचार करें...। हम भ्रष्टाचार के ऐसे अंधेरे कुएं में जा रहे जहां से निकलने कोई रास्ता ही नहीं मिल रहा है...हम एक भ्रष्टाचार के जख्म से निकल भी नहीं पाते तबतक दूसरे घपले घोटाले बोतल में बंद भूत की तरह बाहर आ जाता है...। आज हम देखे तो क्या गांव और क्या शहर पूरा देश ही भ्रष्टाचार के अंधेर कुएं में जा कर गिर गया है और जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा..। साफ है बाहरी विरोध और आंतरिक असंतोष के बीच जो तस्वीर बनी रही है बहुत ही भायवाहक हो सकती है..।
ऐसे में अब हमरे निजामों को देश के इस मुद्दे पर गौर करना ही चाहिए और हमारे फौज को और मजबूत बनाने के तरफ कोई सकारात्मक कदम उठाना ही चाहिए...हमारे फौज में आज भी 30 हजार जवानों का पद खाली है जबकि भारत में 65 फीसदी लोग 35 से कम उम्र के है ऐसी स्थिति में सैन्य क्षेत्र में जवानों की कमी कहां तक तर्कसंगत है?और ऐसी ही स्थिति रक्षा के हर क्षेत्र में है...अब अगर इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया और सेना को और पारदर्शी नहीं बनाया गया तो देश को गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तौयार रहना चाहिए...।
प्रणव झा