16 दिसंबर की रात जब
दिल्ली के सड़क पर चलती बस में इंसानिय को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम दिया
गया उसके बाद पूरे देश की जुबना पर बस एक ही मांग था कड़े कानून..कड़े कानून ताकी
फिर से कोई इस जघन्य अपराध को दोहराने के लिए 100 बार सोचे...।
पूरे देश के इस मांग
को लेकर जब देश के नीति निर्माताओं ने पूरा करने की सोची तो एक ऐसा कानून देश के
सामने ला कर रखा जिससे पूरे देश के महिलाओं को ही नागावर गुजर रहा है...साथ ही
पुरुष वर्ग में भी खासी रोस देखी जा रही है...।पूरा देश इस कानून के प्रवाधानों के
लेकर हतप्रभ है...इस कानून के तहत किसी भी महिला की तरफ 17 सेकेंड से ज्यादा देखा
तो वो पुरुष अपराध की श्रेणी में आएगा और कोर्ट से उसे बेल भी नहीं मिलागा...अगर
कोई लड़का किसी लड़की के पीछे चल रहा है और लड़की उसकी शिकायत पुलिस से कर दे कि
ये मेरा पीछा कर रहा है तो वो लड़का गया काम से...अगर बस ट्रेन या फिर कही भी गलती
से भी कोई किसी महिला से टक्करा जाए या टच हो जाय तो वो लड़का या पुरुष अपराधी
घोषित हो जाएगा...और सबसे अनर्गल प्रावधान ये दिया गया है कि अब कोई 16 साल की
उम्र में ही मर्जी से किसी के साथ संबंध बना सकता है...।
कानून के इस
प्रावधान के बारे में जान कर पूरे देश में बस बहस छिड़ी हुई है...यहां तक की कई
लोग इस कानून को तालिबानी कानून के साथ जोड़ कर देख रहे हैं...महिलाओं के लिए बनाए
जा रहे इस कानून के बारे में जब लड़कियों और औरतों से पूछा गया तो वो भी इस कानून
के पुरजोर विरोध में दिख रही हैं क्योंकि हर महिला या लड़की के घर में उसका भाई
बेटा और पति भी रहता है ऐसे में कानून के आने के बाद हर घर में दहशत का साया हमेशा
दिखेगा...महिलाओं की सुरक्षित करने के लिए लाए जाने वाले इस कानून के सकारात्मक
पहलु से ज्यादा नकारात्मक पहलु ज्यादा नजर आता है...।
ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स
यानि जीएमओ के बाद यह कानून कैबिनेट में भी पास हो गया है अब बस आखरी पड़ाव यानि
संसद के दोनों सदनों में पास होने बाकि है...वैसे ये राह आसान नहीं नजर आ रहा पर
अगर ये प्रस्ताव संसद में पास हो जाता है तो फिर पूरे देश में इस कानून को लेकर एक
तरह से अराजकता के माहौल पैदा हो सकता है...।
वहीं दूसरी तरफ
दुष्कर्म जैसे अपराध को रोकने के लिए सरकार संबंधों की उम्र घटाने जैसे बचकानी
फैसले को तरजिह दे रही है...क्या संबंध के उम्र को घटाने मात्र से दुष्कर्म जैसे
वारदातें कम हो जाएगी? क्या ऐसे कठोर कानून पारित कर के समाज के
कुपोषित मानसिकता को बदला जा सकता है? क्या इस कानून के तहत समाज की नजरिया को बदला जा
सकता है? जहां तक ऐसे मानसिकता वाले लोगों का सवाल है वो अपनी हवस
की आग को बुझाने के लिए उम्र को ताक पर रख कर 2-4 साल के बच्चियों को भी अपना
शिकार बनाते हैं वहीं सरकार संबंधों का कम उम्र घटा कर ऐसे प्रवृति वाले लोगों के
लिए एक सौगात साबित नजर आती दिखती है...।
अगर इस कानून को
सियासत की चश्में से देखा जाय तो ये सिर्फ 2014 में सियासी घमासन को नजर में रख कर
आनन-फानन में लिया गया एक बेतुका फैसला ही देखा जा रहा है...। वहीं दूसरी तरफ
विपक्ष की भूमिका भी इस मामले में शून्ह ही नजर आ रही है कहने को तो अधिकांश विरधी
दल इस बिल का विरोध कर रहे है पर वो सिर्फ कहने मात्र के लिए है पर धरातल पर वो भी
सत्ता पक्ष की भाषा बोल रहा है पहले जमाने में कहा जाता था कि जिस राज्य देश में
विपक्ष की भूमिका ना के बराबर हो या उसका हस्तक्षेप तरजीह लायक ना हो तो उस देश या
राज्य का पतन तय होता है साथ ही विपक्ष की समाप्ति भी तय हो सुनिश्ति हो जाती
है...और कुछ ऐसा ही मौहोल अब इस मुल्क में भी दिख रहा है जहां विपक्ष सत्ता पक्ष
के हां में हां मिलाता नजर आ रहा है...
देश एक ऐसा कानून का
मांग कर रहा है जिसमें महिला समेत देश में बढ़ रहे अपराधिक प्रवृति के पूर्ण तरह से
सफाया हो जाए पर जिस तरह से देश के सिरोधज कानून को अंतिम रूप दे रहे है उससे तो अपराध को जड़ से मिटाने की बात दूर-दूर तक नहीं दिखता वहीं इस
कानून से सिर्फ अपराध को दबाने की गुंजाइस ही दिख रहा और किसी चीज को दबने से वो
खत्म नहीं होता...बाद में उसका परिणाम और भी खतरनाक ही साबित होता है...जिसका
उदाहरण हम कश्मिर घटी में से ले सकते हैं...।
अब सवाल ये है कि
देश के नीति निर्माताओं को देश और देशवासियों का कोई ख्याल नहीं है? क्या सियासतदान सिर्फ अपने वोट बैंक को बचाने के लिए देश के साथ किसी भी हद तक
मजाक करने को आतुर हैं? क्या ऐसे कानून पारित करने से महिला पुर्ण रूप
से सुरक्षित हो जाएगी? क्या इस
बिल को पास करने से पूरे देश का बिगड़ा मिजाज ठीक हो जाएगा? अगर नहीं... तो फिर इस बिल की मौलिकता क्या है और इसे पास कर के सरकार क्या
साबित करना चाहिती है?....ये हम नहीं पूरा देश पूछ रहा है
प्रणव झा