वो बागों के फूलें वो खेतों की फसलें
वो हरियाली डालें वो शाखों के पत्तें
कहां हैं कहां हैं कहां हैं?....
वो अमन की अजानों से सूरज का उगना
मद खुशियों की आंखों से आसुंओं का निकलना
नहीं है नहीं है नहीं है.....
चांद से आगे पहुंचा है अपना सवेरा
जलते हुए आशियानों की चीखें
लाशों से लटकी वो पेडों की शाखें
यहीं हैं यहीं हैं यहीं है......
बुलाओ ज़रा उन रहबरों को यहां पे
दिखाओं ये ज़ख़्म जो लगा है सीने पे
रंगों में बंटते मुल्क को तुम बुलाओ
सड़कों पर भूखे सोये भविष्य को बैठाओ
ये बेटियों की अस्मतों से ज़रा पूछो
पूछो ज़रा खेत के हलधरों से
वो सोने की मिट्टी वो अमन के कबूतर
उड़ गए है उड़ गए हैं उड़ गए हैं....
आंखों की ठिठकी आंसूओं को गिराओ
लाशों पर बैठे रहनुमा को बताओ
आओ ज़रा देख लो अब इन्हें भी
ये कुचें ये निलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहां हैं कहां हैं मुहाफिज़ ख़ुदी के
जिन्हें नाज़ था हिंद पर वो कहां हैं.....कहां हैं.....कहां हैं.......

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