गौरवमयी बिहार की कहानी
पार्ट-1
बिहार
चुनाव पर बिहार को खोजने की कोशिश
हर कोशिश में मैं बदला
हूं...हर सांचे में मैं ढला हूं...हर जुबान में, हर इंसान में मैं मिला हूं....... हर बार मिल जाता हूं, ढल जाता हूं और बदल जाता
हूं क्योंकि समय का मैं सवारी हूं....मैं बिहारी हूं।
गाली की मौलिकता आवाज़ की
ऊंचाई में होती है लेकिन एक गाली ऐसी है जिसे धीमी आवाज़ में भी बोली जाए तो भी
उतना ही काम करती है जितना की अन्य गालियां अपनी चरम ऊंचाई से करती है।

एक गौरवशाली मिट्टी कैसे गाली बन जाती है, वो बिहार के ‘बिहारी’यों से अच्छा कोई नहीं जान सकता है। बिहार के बासिंदे को अगर बिहारी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ! लेकिन, आज वक्त इस कदर बदल चुका है कि ‘मां-बहन’ की गाली से भी अगर कोई उत्तेजक गाली है तो वो है किसी को ‘बिहारी’ कहना। बिहार के बाहर कहीं भी किसी शहर में, किसी भी व्यक्ति का अगर घोर अपमान करना हो तो आप उसे ‘बिहारी’ कह दें, वो आपको अपनी क्षमता का सबसे उच्य स्तरीय प्रक्रिया जरूर देगा।
आज शहर में रिक्शा या ठेला
खीचने वालों का कोई अलग-अलग नाम नहीं होता। उन समुदाय का एक ही नाम होता है ‘बिहारी’। कंपनियों में काम करने
वाले मजदूरों को भी उसके ऑरिज़नल नाम से नहीं बुलाया जाता, उन्हें भी ‘बिहारी’ कह कर ही बुलाया जाता... ‘ऐ बिहारी ठीक से काम कर’। शहर के मलीन बस्तियों में
रहने वाले लोग चाहे जहां से भी आये हों, उन्हें ‘बिहारी’ के श्रेणी में ही रखा जाता है। ऑफिस हो या कोई
कंपनी किसी भी आदमी को नीचा दिखाने के लिए ‘बिहारी’ शब्द का उपयोग किया जाता है, और जैसे ही उसे ‘बिहारी’ की उपाधि दी जाती है उसके
रगों में जमा खून खौल उठता है।
आखिर ऐसा क्यों?
ऐसा कैसे हो गया कि जिस
प्रांत में ज्ञान की गंगा बहती हो, राजनीति जहां खेल हो, मेहनत जहां की ईमान हो और
परिस्थितियां जहां कपड़े समान हो कि जब जैसा हो वैसा ही पहनो, उस प्रांत का नाम
पूरे राष्ट्र में गाली बन गई हो, आखिर कैसे...?
इस वज़ह के पीछे एक पूरा
सफर है, जो पाटलिपुत्र से बिहार तक तय किया गया है।
इसके पीछे एक ज्ञान की मौत
है, एक अहिंसा की मौत, एक क्रांति की मौत है, एक सभ्यता कि मौत है, एक धर्म की मौत
है, मौत है एक सम्राट के पहचान की, मौत है इतिहास की। साथ ही मारता है हर रोज
बिहार जब कोई बिहारी अपने आपको ऊंचा दिखाने के लिए बोलता कि मैं बिहारी नहीं हूं।
बिहार की पहचान को धूमिल
करने में यहां के राजनेता, यहां के समाज के रहनुमा और जाति के भेदभाव का बड़ा
हाथ रहा है। आज दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई अन्य शहर हो, हर जगह आपको बिहार के
लोग मिल जाएंगे। ‘बिहारी’ सिर्फ मजदूर वर्ग में ही नहीं होते, ‘बिहारी’ हर वर्ग में होते हैं।
जैसे की किसी कंपनी का मालिक ‘बिहारी’ है तो उसके साथ कंपनी में काम कर रहे कर्मचारी भी ‘बिहारी’ होते हैं। इससे आप अंदाज़ा
लगा सकता हैं कि ‘बिहारी’ के पास ना तो दिमाग की कमी है और ना ही प्रतिभा की, अगर
कमी है तो वो है अवसर की।
जिस प्रांत में ये पैदा
होते हैंं उस प्रांत में इनके पास रहने के लिए ज़मीन, घर, कपड़ा तो होता है लेकिन खाने के लिए
रोटी नहीं होती क्योंकि उस प्रांत में रोजगार का कोई उचित साधन नहीं है। इसलिए ये
लोग बिहार से बाहर जा कर ‘बिहारी’ बन जाते हैं।
क्रमश:
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