Friday, 22 May 2015

सिमरिया के 'दिनकर'


बिहार के बेगुसराय के सिमरिया गांव जहां इतिहास के सुखे पेड़ से आज भी फूल गिरते हैं और आज के दौर के सियासत के नुमांइदों को सावधान करते हुए कहते हैं कि
"हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहां,
वो जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है"।

ये फूल कोई और नहीं रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताओं के फूल हैं जो आज भी पूरे देश को समय-समय पर दिशा निर्देशित करता रहता है। वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता के मद में चूर हो कर उल्टे-सीधे फैसले लेने लगी थी जब बिहार के जयप्रकाश नारायण ने "सिंहासन खाली करो की जानता आती है" का नारा देते हुए संपूर्ण क्रांति का आवाह्न किया था।
अगर 'उर्वशी' को छोड़ दें तो वीररस के कवि दिनकर जी की कविता में हमेशा ही स्वछंदता रही है, चाहे वो अंग्रेजों का काल हो या फिर स्वतंत्र भारत की, दिनकर जी अपनी कविता से हमेशा समाज के दलित, पीड़ित और शोषकों को प्रमुखता से जगह दिया है। रामधारी सिंह दिनकर हमेशा से ही जात-पात के विरोध में रहे और उन्होंने कहा भी था जब तक बिहार जात-पात के बंधन से मुक्त नहीं होगा तब तक बिहार का सर्वगिन विकास संभव नहीं है। ग़ुलाम भारत में जन्मे दिनकर की रचना में शुरू से ही देशभक्ति की भावना रही है जिसे देख कर अंग्रेजों ने उनकी किताबों पर रोक लगा दी थी लेकिन उनकी भावनाओं को कभी नहीं दबा पाएं। बाद में जब देश आज़ाद हुआ और नेहरु की सरपरस्ती में सरकार बनी तब रामधारी सिंह दिनकर नेहरु के करीबी माने जाते थे क्योंकि दिनकर कि लिखी किताब संस्कृति के चार अध्याय की भूमिका जवाहरलाल नेहरू ही लिखे थे लेकिन जब 1962 के युद्ध में हमारे सैनिक मारे गए तब वो नेहरु के आलोचना करने से भी नहीं चुके, परशुराम की प्रतीक्षा में दिनकर लिखते हैं
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है
समझो, उसने ही हमें यहां मारा है।

ये सिमरिया के ही दिनकर हैं जिन्होंने साहित्य को एक ऊंचाई दी। साथ ही, पूरे देश में राष्ट्रीय कवि के रूप में जाने गए। दिनकर को उनके महान रचनाओं के लिए कई पुरुस्कार भी मिलें संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी और उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। साथ ही दिनकर जी को पद्म विभूषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया। द्वापर युग कि घटना महाभारत पर लिखी कुरुक्षेत्र काव्य रचना को विश्व के 100 काव्यों में 74वां स्थान दिया गया है।
बिहार की पावन धरती में से एक बेगुसराय जिला का सिमरिया गांव रहा है क्योंकि सिमरिया में गंगा नदी बहती है। जहां आज भी लोग जा कर मां गंगा का दर्शन और स्नान करते हैं। यहीं रामधारी सिंह दिनकर का जन्म हुआ था। वैसे तो दिनकर हमेशा अपने गांव से दूर ही रहे लेकिन अपनी जन्मभूमि से वो बेहत प्यार करते थे और सिमरिया को वो कभी नहीं भूले साथ ही अपने गांव को याद करते हुए लिखते हैं
हे जननी जन्मभूमि सतबार नमन
तुझ सा ना सिमरिया घाट  अन्य
रामधारी सिंह दिनकर देश के विकास में महिलाओं की भूमिका को अग्रणीय मानते थे, वो मानते थे कि जब तक देश की आधी आबादी अपनी भूमिका में नहीं आएगी तब तक किसी भी राज्य देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाएगा इसलिए दिनकर जी ने स्त्रियों की स्थिति पर गहरा शोध किया और उसी नतीजे के अनुसार उन्होंने कहा कि जबतक भारत की महिलाएं शिक्षित नहीं होगी तब तक ना तो उसका विकास हो पाएगा ना ही देश का लेकिन विडंवनाओं के इस देश में यह भी विडंवना है कि स्त्रियों की हालात को शिक्षा के माध्यम से सुधारने कि कोशिश में जिस कन्या आवासीय विद्यालय को खोला गया था, वो विद्यालय आज खंडहर बन चुका है और दिनकर का गांव बदहाली में जी रहा है, और आज भी बिहार शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ है। वहीं भारत में कवियों की जन्मभूमि हमेशा से उपेक्षित ही रही है और उसी कड़ी में सिमरिया भी है। दिनकर के नाम पर समर्पित एक सभागार के नाम पर सिर्फ एक छत खड़ी कर दी गई है जो किसी भी काम की नहीं है। वहीं शिक्षा का स्तर भी दैयनीय बना हुआ है। ऐसी कल्पना तो नहीं किए थे हमारे राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह 'दिनकर'।

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;

सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)

हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।

(परशुराम की प्रतिक्षा से)

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