अगर आप के घर, गांव, शहर, यहां तक की देश में कोई बाहरी मुल्क से घुस जाए और आपके जमीन आपके खेत खलिहान आपके जिविका पर अपना हक जमाने लगे और आपको अपना ही घर शहर और देश बेगाना लगने लगे और आप आपने आप को आपने ही घर मुल्क में असुरक्षा के साए तले अपनी जिंदगी बसर करने को मजबूर हो तो आप क्या करेंगे...? आवाज उठाएंगे..आपनी मांग को सरकार के पास रखेंगे और जब आपकी समस्या का हल इन तरीको से नहीं होगी तो फिर आप मजबूर होकर अपनी समस्या का हल खुद ही सोचेंगे...और सोचना भी चाहिए...क्योंकि जब बात इंसान की जान पर बन जाए तो फिर ना तो उसे मरने का डर होता है और ना ही उसे किसी भी खतरे से...इस स्थिति में इंसान वो कर बैठता जो वो कभी सोच भी नहीं सकता...असम में लगी आग के पीछे की कहानी का भी इतिहास कुछ यही दास्तां बयां करती है...बोडो इलाके में एक दशक में ये चौथी बार ये हिंसात्मक और चिंताजनक वारदत है...पहली बार 1993 में यहां हिंसा भड़की...पर घटना का स्वरूप छोटा था...जिसे जल्दी ही काबू में कर लिया गया...लेकिन समस्या तब भी वही थी जो आज है...यहां के मूल निवासी आज भी अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं..और यही कराण है कि वहां के लोगों का मन बार बार उद्वलित होता है...और मन में लगी आग की चिंगरा जब बाहर निकती है तो हाल की घटना को बार बार दोहराती है और इसी आग की धधक में वो लोग भी जलते हैं जिनका वस्ता दूर दूर तक इससे नहीं होता...जिसका उदाहरण हमें मुंबई के आजाद मैदान में देखने को मिल चुका है...जहां मीडिया और पुलिस के लोग अकारण ही इस चिंगारी का शिकार हो चुका...।1993 के बाद फिर से एक बार असम के बोडोलैंड के निवासी का गुस्सा 1996 में फूटा जिसका आकार और प्रकार पहले से कुछ ज्यादा ही गंभीर था...इसी तरह फिर से 1998 और 2003 में असम में आग लगी...लगातार घटती इस घटना से एक बात तो साफ हो चुका था कि यहां के लोगों में अब धैर्य खो चुके हैं...और अपनी हक की लड़ाई के लिए यहां के लड़को ने हथियार उठा लिया...और लड़ाई शुरू हो गई...जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा...फिर बोडो और सरकार के बीच एक समझौता हुआ...जिसमें बोडोलैंड को एक स्वायत जिला बनाया गया...तब वहां के लोगों को एक बार ऐसा लगा कि उनका वर्षों का सपना एक बार पूरा हो चुका है अब वो अपनी जमीन और जंगल का हम ही मालिक हैं...पर इनका ये सपना धीरे धीर टूटता गया और बिखर गया...और बेचारा बनने के लिए अभिशप्त हो गया...और यही बेचारगी उनके मन में एक टकराव की भावना को जन्म दिया...।
इस बार जिस तरिके से असम में हिंसा फैली और 70 से ज्यादा लोग मौत के आगोश में समा गये और हजारों लोग घर से बेघर हो कर शरणार्थी शिवर में अपना अश्राय लिए वो किसी सुनियोजित घटना नहीं थी वो उसी बेचारगी और बेगानगी से उपजी शोले की थी...जो पहले से ही सीने में दफन थी...।असम समस्या की बुनायाद में बोडो जनजातिय समुदाय और बंग्लादेश से आए मुस्लमानों के बीच जंगल जमीन पर कब्जे की होड़ है...और इसी टकराव की वजह से असम कई दशकों से जलती आ रही है...। सरकार जितना ही इस समस्या को सुलझाना चाहती उतना ही समस्या विकट होती जा रही है....क्योंकि असम के स्थाई नागरिक और फिरकापरस्त में पहचान करना ही सरकार के लिए समस्या बन गई है...। क्योंकि भारत का पूर्वोत्तर राज्य से जमीनी संबंध केवल असम के कोकराझाड़ जिले से ही है और वो भी पश्चिम बंगाल के बरास्ते बिहार से...। और इस एकमात्र जमीनी रास्ते से ही भारत के राष्ट्रीय एकता को खतरा है...भले ही बंग्लादेश से भारत को कोई ऐसी मानवीय खतरा नहीं है फिर भी असम में जो हाल की स्तिथि बनी है इसका अकेला जिम्मेदार तो सिर्फ यही रास्ता है...जो बंग्लादेश के बनने से पहले ही शुरू हुआ था और आज भी जारी है...।
अब इन तमाम समस्याओं के बीच खोजना ये है कि इन समस्याओं का हल क्या है आखिर क्यों 1993 से लेकर आज तक इस समस्या का अचूक हल नहीं निकाला गया...क्यों सरकार देश की अस्मिता के सवाल पर चुप्पी साधी बैठी है...। अगर सरकार सही मायने में देश को अखंड रखना चाहती है तो फिर इसे वही करना चाहिया जो उसने जम्मू कश्मीर मसले पर की थी राष्ट्रीय एकता परिषद की अपात बैठक...और 1971 के बाद आए घुसपैठियों को पहचाना जाए और उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाए...।
सरकार को राज्य सरकार के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक करनी चाहिए...हर छोटी बड़ी बिंदु पर एक मत होकर उसका हल निकालना चाहिए...। और राज्य सरकार को अपने प्रदेश के लोगों के बीच फिर से विश्वास बहाल करने के लिए बेहतर तरीके अपनाने चाहिए...और उसे आवश्यक सुविधा मुहैया करानी चाहिए...तभी कहीं जा कर असम और पूरे देश में एक शांति की लहर आएगी....।
प्रणव झा