Sunday, 15 June 2014

कहर के बाद कब होगी सहर




कहर-कहर जब चली


लाश लाश बिछ गई


निकल सका ना चू भी


कि हाय सांस टुट गई


शमशान बन गया शहर


कि देव भी सिहर गए


ना रहा वजूद कुछ


कि करे  कोई सिनाख्त भी


मिट गया कहर में सब


और धुआं बन उड़े जब रब


ज्ञान-विज्ञान सब धरा रहा वही कहीं


जब फट रहा था आसमां और रो रही थी जमीं


पात-पात छोड़ दो वहां दरख्त भी नहीं


जो रो सके जो कह सके कि क्या हुआ उस रात में


वो रात आज भी वहीं खड़ी हो रही घनी कहीं


सहर की खोज में जब वक्त बन गई तारीखी


तंत्र को भी मंत्र भी हिला सका न अब तलक


नाथ वो केदार का कहां चले गए थे तुम कि


कहर-कहर जब चली कि


लाश-लाश बिछ गई...

 

Tuesday, 3 June 2014

इंसान तुझे क्या हो गया?












जहां बुझती राख से आग जलने की बात होती रही वहां आग की धधक भी खौलते पानी से बुझ रही है। जिस कुंध तलवार को तोड़ने की बात होती रही वहां उसी टूटी तलवार से जंग लड़ी जा रही है। जहां सत्ता की कुर्सी पर मिट्टी से राजतिलक की बात थी वहां वंश की विभूतियों का सोने की मुकुट पहनाई जाती रही है। यूं इस मुल्क में कोई बद नहीं होता  बदायूं की जैसी घटना ही मजबूर करता रहा है।

वो दरख्त खामोश अटहास कर रहा है बदायूं में खड़ा जिसके नीचे इंसानियत बदनाम हुआ। इंसानियत के जब चीथड़े हुए तो वह फाया बन मुल्क में पसरा और खामोश फिजाओं में हेलिकॉप्टर की आवाज गूंजने लगी पूर्व से लेकर वर्तमान तक के रहनुमा आए शोक जताए और चले गए। घोषणाएं हुए और तर्क कुतर्क के शोर में सिसकियां दफ्न हो गई। सूबे के रहनुमा ने कहां मीडिया को सिर्फ उत्तर प्रदेश का ही रेप, लूट और बदनामियां दिखता है। उसे से पहले जनाब के अब्बा ने कहा था युवकों से ऐसे ही गलतियां हो जाती है।

जख्म का दर्द और घाव इतना गहरा है कि अब ऐसे नमकों का असर नहीं दिखता। टेलिविजन पर नैतिकता की दुहाई होती रही पैनल पर बहस गरमाता गया देश के मन में गुस्से का लावा ताव के बिसात पर फूटता रहा। पर वो दरख्त खामोश रहा, वो गलियां सूखी आंखों से रोती रही है मां का वो गर्भ शर्मासार होता रहा। गले की आवाज आंसू बन कर जिस्म में समाता रहा। वो मिट्टी कलंकित हो गई। जहां युवा हुक्मरां सरताज पहने बैठे हैं।


ना तो ये पहली घटना है और ना ही आखिरी। मौलिकता कि बात अब रही नहीं इसलिए करना बेवकूफी है। सवाल इतने सारे है कि सवालों का जाल सा बन गया है और इसमें सवाल खुद ही उलझ रहा है। इसलिए सवाल भी करना लाजिम नहीं समझता है। बस कुंठित हूं... देख रहा हूं... सोच रहा हूं... जो बन पड़ता है वो कर भी रहा हूं...। आशावादी हूं इसलिए आशा भी करता हूं कि कभी तो इस मुल्क में सहर होगी।

pranav jha