Sunday, 15 June 2014

कहर के बाद कब होगी सहर




कहर-कहर जब चली


लाश लाश बिछ गई


निकल सका ना चू भी


कि हाय सांस टुट गई


शमशान बन गया शहर


कि देव भी सिहर गए


ना रहा वजूद कुछ


कि करे  कोई सिनाख्त भी


मिट गया कहर में सब


और धुआं बन उड़े जब रब


ज्ञान-विज्ञान सब धरा रहा वही कहीं


जब फट रहा था आसमां और रो रही थी जमीं


पात-पात छोड़ दो वहां दरख्त भी नहीं


जो रो सके जो कह सके कि क्या हुआ उस रात में


वो रात आज भी वहीं खड़ी हो रही घनी कहीं


सहर की खोज में जब वक्त बन गई तारीखी


तंत्र को भी मंत्र भी हिला सका न अब तलक


नाथ वो केदार का कहां चले गए थे तुम कि


कहर-कहर जब चली कि


लाश-लाश बिछ गई...

 

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