‘मैं हत्याओं के दर्द को भुगत चुका हूं... इसिलिए
मैं मौत से नहीं डरता। दंगों के खिलाफ गुस्सा आने में एक मिनट लगता है... लेकिन
उसे खत्म करने में बरसों लग जाते हैं...। मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और
शायद मुझे भी मार देंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे।‘
फर्क नहीं पड़ता,
मौतों से, क्योंकि मौत का डर नहीं... राहुल गांधी इतिहास का पन्ना उलटा कर भविष्य
का किताब लिखना चाह रहे हैं...शायद...
मौसम बदल रहा है
सूरज अपनी गर्मी को कम कर रहा है तो ठंड अपने सफेद चादर ओढ़ कर लोगों के शरीर पर
हावी होने की कोशिश कर रहा है वहीं देश का भी मौसम इस मौसम से उलट हो रहा है ठंड
की शितलता हाशिए पर आ रही वहीं गरमी बेतरतिब बढ़ती जा रही है...बढ़नी भी चाहिए
क्योंकि सियासत का मैदान फिर से महारथियों के गर्जना से अहलादित हो रहा है...।
पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा और 2014 के चुनाव का शंखनाद हो चुका है...।
देश में चुनाव होने
जा रहा है यानि लोकतंत्र- जनता के द्वारा जनता पर कि जाने वाले शाषण का
महापर्व...।
एक दौर था जब धर्म
पे सियासत हुआ करता था जाति को तकसीम कर वोट बैंक बनाया जाता था खून और रंग का
अहसास दिला कर सत्ता की कुर्सी तय की जाती थी...। वक्त बदाल तो हर चीज के मायने भी
बदल गए...। अब एक नया फार्मूला भी ईजाद कर लिया गया या यों कहिए कि पहले से मौजूद
फार्मूले को नए हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना...। अब जिस दौर में सियासत का
अखाड़ा तैयार हो रहा है वहां सियासतदान जज्वादों पर सियासत करने पर उतारू हैं...।
क्योंकि ये अब तक का सबसे सफल फार्मूला रहा है...। इस देश में अगर कोई इंसान ऐसे
किसी भी प्रयास से झुकता नहीं है तो उसके जज्वातों को हथियार बना कर उसे आप आसानी
से झुका सकते हैं...क्योंकि इस देश के लोगों के पास कुछ हो ना हो जज्वातों की कोई
कमी नहीं है...।
पहले बिहार फिर
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जो हाल हुआ है वो पूरे देश के साथ कांग्रेस पार्टी
भी बखुबी जानते हैं और इससे भी ज्यादा अनुभव कांग्रेस के युवराज यानि राहुल गांधी
को कुछ ज्यादा ही है जिसका अहसास उनके भाषणों से निकल कर सबके सामने आ रहा है...।
राहुल गांधी इस बात को जान गए हैं कि अब वो दौर बदल चुका है जब देश की आधी की आधी
आवादी अशिक्षित जिसे सियासी भाषा में मूर्ख कहा जाय, नहीं रही है...। देश की जनता
अब अपना भला और बुरा पूरी तरह से तो नहीं पर एक हद तक समझने लगी है...। तो इस दौर
में धर्म, जाति, खून के नाम पर सियासत करना मूर्खता ही होगा...। तो क्यों नहीं
इनके जज्वातों के साथ खेला जाए और एक बार फिर से सिंहासन को पक्का करने का कवायदा
तेज किया जाए....।
मध्य प्रदेश के
शरडोल में युवराज आदिवासियों को संबोधन में इज्जत का मतलब समझने हुए अपनी मां की
कहानी सब को सुनाई और उसके तीन दिन बाद ही फिर से इंदौर की सभा में मौत का मायाने
समझने लगे। जनता के बीच भावनाओं का बवंडर फोर खुद राहुल हवा हो गए लेकिन पीछे छोड़
गए जख्मों का बड़ा सा पुलिंदा...।
भारत के इतिहास में
ये पहला मौका नहीं है जब इस तरह की बातें सामने आई है...इससे पहले भी कई बार ऐसी
घटना घट चुका है जब कोई भी शस्त्र कामयाब नहीं हुए तब जज्वाती शस्त्र के माध्म से
सियासतदां अपनी सियासत की पारी को आगे बढ़ाई है...। कुछ ऐसे ही उदाहरण यहां है-
14 अगस्त 1947
देश के आजादी से एक
दिन पहले जब जवाहर लाल नेहरू जब संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि
‘आधी रात के समय जब दुनिया सो रही होगी तब भारत
आजादी और नए जीवन के लिए जगेगा। वक्त आता है, इतिहास में ऐसे मौके कम आते हैं जब
हम पुराने को छोड़ कर नए दौर में जाते हैं, जब युग का अंत होता है और जब लंबे समय
से दबी कुचली देश की आत्मा को आवाज मिलती है’
जिसका असर भी भरपूर
हुआ नेहरू की लोकप्रियता और भी दुगुनी हो गई
1965
लाल बहादूर शास्त्री
पाकिस्तान युद्ध के समय एक जनसभा के संबोधन में आनाज के संकट से जूझ रहे देश के
लिए एक दिन का उपवास रखने को कहा था...साथ ही किसानों का उतसाह वर्धन के
लिए जय जवान, जय किसान का नारा दिया था
असर ऐसा हुआ कि आज
भी लोग इस नारे को अपनी जुवाव पर साजए हुए हैं और युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को
बुरी तरह से पराजीत किया
1971
इंदिरा गांधी ने
कहा-
वो कहते हैं कि ‘इंदिरा को हटाओ, मैं कहती हूं कि गरीबी को हटाओ’
इंदिरा के इस भाषण
से 71 के चुनाव में पार्टी की शानदार जीत हुई...और केंद्र में इंदरा ने सरकार
बनाई।
1984- आज का ओडिशा
देश की पूर्व
प्रधानमंत्री और राहुल की दादी इंदिरा गांधी अपनी मौत से पहले कहीं थी-
‘मैं रहूं ना रहूं, लेकिन मेरे खून का एक-एक कतरा
इस देश के काम आएगा। इस देश को मजबूती देगा।‘
जिसका असर पूरे देश
में 1985 के आम चुनाव में देखा गया जब उनके इस भाषम का ऑडियों रिकॉर्ड कर के पूरे
देश में सुनाया गया और कांग्रेस फिर से एक बार भारी बहुत के साथ सत्ता में आई...।
1990 अलवर, राजस्थान
अपने भाषण में राजीव
गांधी ने कहा था-
‘सरकार एक रुपया भेजती है लेकिन इस रुपए का 15
पैसा ही आप लोगों तक पहुंच पाती है, 85 पैसा तो बीच में खा लिया जाता है’
बोफोर्स मामले में
घिरने का बावजूद राजीव के इस भाषण ने लोगों के दिल में जगह बना ली और केंद्र में
1991 में राजिव गांधी ने फिर से सरकार बनाई
2012 जुलाई-
गांधीनगर, गुजरात
नरेंद्र मोदी ने
अपने भाषण में कहा था-
‘अगर मैं गोधरा दंगे का दोषी हूं तो मुझे फांसी पर
चढ़ा दो। 2004 में मैंने कहा था मैं माफी क्यूं मांगू। अगर मेरी सरकार ने ऐसा किया
है तो मुझे सार्वजानिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाए। ताकि अगले 100 सालों तक कोई
ऐसा करने का साहस न कर सके’
कुछ ही महीनों के
बाद मोदी लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और चौथे बार
राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
और अब राहुल गांधी और कई अन्य नेता जो इस दुहराते हुए नजर आते
हैं..
ये कुछ इतिहास के
पन्ने हैं जो यह तस्दीक कर रहा है कि इस देश में भानाओं का हवाला देख कर आप हावाओं
का रुख कहीं भी मोड़ सकते हैं तो क्या फिर से एक बार जज्वातों की आंधी में जनता की
आंसू सूख जाएगी...। ये तो वक्त आने पर पता चल ही जाएगा।
पर इन सब के बीच
सवाल वहीं खड़ा है जहां वो बरसों से खड़ा है उसे जवाब नहीं मिला कि क्या इस देश
में हर बार कमजोरी का सहार ले कर ही सत्ता की कुर्सी मजूबत होती रहेगी या सत्ता के
मजबूती से देश की जनता का आत्मबल मजबूत होगा। क्या इस देश की चिंता किसी को नहीं
रह गई क्या यहां बस लोग अपने लिए ही पैदा हुए है अगर यही सोच आगे तक रही तो फिर
कोई पैदा नहीं होगा सब खत्म हो जाएगा...। क्या ये देश सिर्फ जज्वातों से चलेगा....
नहीं साब...
जज्वातों से सिर्फ मन बदल सकता है देश की ये माली हालात नहीं...।
Pranav Jha
25-10-13