Friday, 25 October 2013

अब जज्वातों पर सियासत




मैं हत्याओं के दर्द को भुगत चुका हूं... इसिलिए मैं मौत से नहीं डरता। दंगों के खिलाफ गुस्सा आने में एक मिनट लगता है... लेकिन उसे खत्म करने में बरसों लग जाते हैं...। मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और शायद मुझे भी मार देंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे।
फर्क नहीं पड़ता, मौतों से, क्योंकि मौत का डर नहीं... राहुल गांधी इतिहास का पन्ना उलटा कर भविष्य का किताब लिखना चाह रहे हैं...शायद...

मौसम बदल रहा है सूरज अपनी गर्मी को कम कर रहा है तो ठंड अपने सफेद चादर ओढ़ कर लोगों के शरीर पर हावी होने की कोशिश कर रहा है वहीं देश का भी मौसम इस मौसम से उलट हो रहा है ठंड की शितलता हाशिए पर आ रही वहीं गरमी बेतरतिब बढ़ती जा रही है...बढ़नी भी चाहिए क्योंकि सियासत का मैदान फिर से महारथियों के गर्जना से अहलादित हो रहा है...। पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा और 2014 के चुनाव का शंखनाद हो चुका है...।

देश में चुनाव होने जा रहा है यानि लोकतंत्र- जनता के द्वारा जनता पर कि जाने वाले शाषण का महापर्व...।

एक दौर था जब धर्म पे सियासत हुआ करता था जाति को तकसीम कर वोट बैंक बनाया जाता था खून और रंग का अहसास दिला कर सत्ता की कुर्सी तय की जाती थी...। वक्त बदाल तो हर चीज के मायने भी बदल गए...। अब एक नया फार्मूला भी ईजाद कर लिया गया या यों कहिए कि पहले से मौजूद फार्मूले को नए हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना...। अब जिस दौर में सियासत का अखाड़ा तैयार हो रहा है वहां सियासतदान जज्वादों पर सियासत करने पर उतारू हैं...। क्योंकि ये अब तक का सबसे सफल फार्मूला रहा है...। इस देश में अगर कोई इंसान ऐसे किसी भी प्रयास से झुकता नहीं है तो उसके जज्वातों को हथियार बना कर उसे आप आसानी से झुका सकते हैं...क्योंकि इस देश के लोगों के पास कुछ हो ना हो जज्वातों की कोई कमी नहीं है...।

पहले बिहार फिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जो हाल हुआ है वो पूरे देश के साथ कांग्रेस पार्टी भी बखुबी जानते हैं और इससे भी ज्यादा अनुभव कांग्रेस के युवराज यानि राहुल गांधी को कुछ ज्यादा ही है जिसका अहसास उनके भाषणों से निकल कर सबके सामने आ रहा है...। राहुल गांधी इस बात को जान गए हैं कि अब वो दौर बदल चुका है जब देश की आधी की आधी आवादी अशिक्षित जिसे सियासी भाषा में मूर्ख कहा जाय, नहीं रही है...। देश की जनता अब अपना भला और बुरा पूरी तरह से तो नहीं पर एक हद तक समझने लगी है...। तो इस दौर में धर्म, जाति, खून के नाम पर सियासत करना मूर्खता ही होगा...। तो क्यों नहीं इनके जज्वातों के साथ खेला जाए और एक बार फिर से सिंहासन को पक्का करने का कवायदा तेज किया जाए....।

मध्य प्रदेश के शरडोल में युवराज आदिवासियों को संबोधन में इज्जत का मतलब समझने हुए अपनी मां की कहानी सब को सुनाई और उसके तीन दिन बाद ही फिर से इंदौर की सभा में मौत का मायाने समझने लगे। जनता के बीच भावनाओं का बवंडर फोर खुद राहुल हवा हो गए लेकिन पीछे छोड़ गए जख्मों का बड़ा सा पुलिंदा...।

भारत के इतिहास में ये पहला मौका नहीं है जब इस तरह की बातें सामने आई है...इससे पहले भी कई बार ऐसी घटना घट चुका है जब कोई भी शस्त्र कामयाब नहीं हुए तब जज्वाती शस्त्र के माध्म से सियासतदां अपनी सियासत की पारी को आगे बढ़ाई है...। कुछ ऐसे ही उदाहरण यहां है-

14 अगस्त 1947
देश के आजादी से एक दिन पहले जब जवाहर लाल नेहरू जब संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि
आधी रात के समय जब दुनिया सो रही होगी तब भारत आजादी और नए जीवन के लिए जगेगा। वक्त आता है, इतिहास में ऐसे मौके कम आते हैं जब हम पुराने को छोड़ कर नए दौर में जाते हैं, जब युग का अंत होता है और जब लंबे समय से दबी कुचली देश की आत्मा को आवाज मिलती है
जिसका असर भी भरपूर हुआ नेहरू की लोकप्रियता और भी दुगुनी हो गई

1965
लाल बहादूर शास्त्री पाकिस्तान युद्ध के समय एक जनसभा के संबोधन में आनाज के संकट से जूझ रहे देश के लिए एक दिन का उपवास रखने को कहा था...साथ ही किसानों का उतसाह वर्धन के लिए जय जवान, जय किसान का नारा दिया था
असर ऐसा हुआ कि आज भी लोग इस नारे को अपनी जुवाव पर साजए हुए हैं और युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह से पराजीत किया

1971
इंदिरा गांधी ने कहा-
वो कहते हैं कि इंदिरा को हटाओ, मैं कहती हूं कि गरीबी को हटाओ
इंदिरा के इस भाषण से 71 के चुनाव में पार्टी की शानदार जीत हुई...और केंद्र में इंदरा ने सरकार बनाई।

1984- आज का ओडिशा
देश की पूर्व प्रधानमंत्री और राहुल की दादी इंदिरा गांधी अपनी मौत से पहले कहीं थी-
मैं रहूं ना रहूं, लेकिन मेरे खून का एक-एक कतरा इस देश के काम आएगा। इस देश को मजबूती देगा।
जिसका असर पूरे देश में 1985 के आम चुनाव में देखा गया जब उनके इस भाषम का ऑडियों रिकॉर्ड कर के पूरे देश में सुनाया गया और कांग्रेस फिर से एक बार भारी बहुत के साथ सत्ता में आई...।

1990 अलवर, राजस्थान
अपने भाषण में राजीव गांधी ने कहा था-
सरकार एक रुपया भेजती है लेकिन इस रुपए का 15 पैसा ही आप लोगों तक पहुंच पाती है, 85 पैसा तो बीच में खा लिया जाता है
बोफोर्स मामले में घिरने का बावजूद राजीव के इस भाषण ने लोगों के दिल में जगह बना ली और केंद्र में 1991 में राजिव गांधी ने फिर से सरकार बनाई

2012 जुलाई- गांधीनगर, गुजरात
नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था-
अगर मैं गोधरा दंगे का दोषी हूं तो मुझे फांसी पर चढ़ा दो। 2004 में मैंने कहा था मैं माफी क्यूं मांगू। अगर मेरी सरकार ने ऐसा किया है तो मुझे सार्वजानिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाए। ताकि अगले 100 सालों तक कोई ऐसा करने का साहस न कर सके

कुछ ही महीनों के बाद मोदी लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और चौथे बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

और अब राहुल गांधी और कई अन्य नेता जो इस दुहराते हुए नजर आते हैं..

ये कुछ इतिहास के पन्ने हैं जो यह तस्दीक कर रहा है कि इस देश में भानाओं का हवाला देख कर आप हावाओं का रुख कहीं भी मोड़ सकते हैं तो क्या फिर से एक बार जज्वातों की आंधी में जनता की आंसू सूख जाएगी...। ये तो वक्त आने पर पता चल ही जाएगा।

पर इन सब के बीच सवाल वहीं खड़ा है जहां वो बरसों से खड़ा है उसे जवाब नहीं मिला कि क्या इस देश में हर बार कमजोरी का सहार ले कर ही सत्ता की कुर्सी मजूबत होती रहेगी या सत्ता के मजबूती से देश की जनता का आत्मबल मजबूत होगा। क्या इस देश की चिंता किसी को नहीं रह गई क्या यहां बस लोग अपने लिए ही पैदा हुए है अगर यही सोच आगे तक रही तो फिर कोई पैदा नहीं होगा सब खत्म हो जाएगा...। क्या ये देश सिर्फ जज्वातों से चलेगा....
नहीं साब... जज्वातों से सिर्फ मन बदल सकता है देश की ये माली हालात नहीं...।

Pranav Jha

25-10-13

Saturday, 12 October 2013

शक्ति की पूजा और शक्ति की पहचान?




नवरात्र नौ दिन तक तन मन धन से शक्ति यानि मां दुर्गा की उपासना...।  नौ दिन तक मां दुर्गा के अलग अलग रूपों की उपासाना करना नवरात्र होता है। साल में एक बार लोग पूरे तन मन धन से शक्ति की उपासना करते हैं व्रत करते हैं पूजा करते हैं और अलग अलग प्रकार से मां की आराधना में जुटे रहते हैं।

मन को साध कर और अपनी दैनिक क्रियाओं को समय बदल कर या उसे छोड़ कर बस मां दुर्गा की उपासना करना ही नवरात्र होता है! ये अब तक के अनुभव से के आधार पर है...।
आगे बढ़ने से पहले मैं बता दूं की ये लेख ना तो किसी की धर्मिक आस्था को चोट करना चाहता है और ना ही नास्तिकता को मजूबत करने के संदर्भ में ये लिखा गया है।  समाज की रुढ़ और परंपरावादी सोच से निकल कर कभी एक बार ये सोचने के लिए मात्र एक पहल है कि क्या नवरात्र में हम तन मन धन समर्पित कर के उन अकर्मों से निजात पा सकते हैं जो हम साल पर ये जानते हुए करते हैं कि ये गलत है और हम वो सारे कामों को बस दस दिनों के लिए ही छोड़ते हैं जैसे ही नवरात्र का दसवां दिन आता है मां को विदा कर फिर से अपने पूर्ववत कार्य में तल्लिन हो जाते हैं मां के भक्त।

भारत विभिन्न धर्मों का एक समभव है यहां के लोग का मूल ही धर्म है ये बात यहां रह कर, यहां जी कर, यहां देख कर लगता है भारत में लोग धर्म को सबसे ऊपर रखते हैं...क्योंकि इसका एक ये भी कारण हो सकता है कि ये सबसे बड़ा रक्षा कवच है अपने करने वाले उन सारे कामों को जो मानवता और समाज के विरूद्ध है...। इस बात को हम जानते भी हैं पर हमेशा नकारते आए हैं और ये सबसे बड़ा कायरता है...।

नवरात्र में जिस देवी मां की आराधना हम पूरे भक्ति भाव से करते हैं उस देवी की विवेचना भी हम ग्रथों में पढ़ते हैं...। मां दुर्गा जो शक्ति की सूचक है मानक है हम उसकी पूजा करते हैं पर वही शक्ति जो हमारे जीवन को हमारे साथ रह कर हमें सहारा देकर हर वक्त हमारे साथ चलती है हम उसकी उपेक्षा करते हैं निंदा करते हैं उसे कोसते हैं दुनिया भर की जुल्मों सितम करते हैं यहां तक की उसकी जिंदगी को नर्क बनाने से भी नहीं चुकते...। क्या यही हमरी पूजा की वास्तविकता है...। हम पूरे साल भर हर वो काम करते हैं जो हमरे हित में हो और हमारा हित हमेशा नेक नहीं होता...।  आज भारत का जो हाल है उसमें हम किस मूंह से मां दुर्गा की उपासना कर सकते हैं हम उसे किस मुंह से उसके नामों का वर्णन कर सकते हैं...। नवरात्र में जिस कान्या को हम खिलते हैं जिससे हम आशिर्वाद लेते हैं उसी कान्या की हत्या हम उसे दुनिया में आने से पहले करते हैं जिसका पैदा होना  हमें अभिशाप लगता हैं उससे हम आशिर्वाद की चाहत कैसे कर सकते हैं जिसे हम घर में रख कर उसे तमाम तरह की यातना देते हैं उसे हम किस लव्ज से दुर्गा कह कर पुकार सकते हैं जिसकी शक्ति को हम हर पल अपने अहं के आगे रैंद रैंद कर उसे पर कटे पक्षी की भांति बना देते हैं उसे हम किस मंत्रों से शक्ति का रूप कह सकते हैं...।
अगर हम माता की उपासान के विधि में जाए तो जबसे पहले हम दुर्गासप्तसती में वर्णित मां दुर्गा के उस स्लोक की बात करेंगे जो सीधे तैर पर कहती है कि मां दुर्गा मूर्ति में नहीं पत्थर में नहीं वो हमारे घर में हमेशा हमारे साथ रहती है

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

जो देवी मेरी मां है उसे हम सत्-सत् नमन करते हैं...
जो देवी हमरी लज्जा है उसे हम सत्-सत् नमन करते हैं...
जिस देवी का हम मेरे ऊपर दया है उस देवी को हम सत्-सत् नमन करते हैं...

अखिर वो देवी कौन जिसे हम पूजते है?

हम नहीं जानते क्योंकि हमने जानने की कोशिश नहीं कि या हम जान कर भी अनजान बने हुए है...।
इन तमाम स्लोको में क्या कहा गया है कभी इसकी गहराई को समझे है या समझने की कोशिश किए है...नहीं....कभी नहीं हम तो बस मां की आरधाना के लिए बनाए गए कानून के मुताबिक बस किताब उलटाए और अध्याय शुरू से अंत तक स्पीड में पढ़ कर बस काम पूरा कर दिए क्योंकि हमरे यहां पूजा के लिए यही संविधान है और हम इसे कानून का पालन के तौर पर लेते हैं और आशा करते हैं कि मां इस से प्रसन्न होती है। क्योंकि पूजा के संविधान निर्माता (पंडित) यही कहते हैं।

तमाम स्लोको में बस एक औरत का ही पूरा वर्णन है जो हर रूप में हमारे साथ है जो सर्वशक्ति से संपन्न है जो हमारे जीवन को पूरा कर सकती है हमें इसी धरती पर स्वर्ग की अनूभूति दिला सकती है पर हम तो ये जान कर भी अंजान है हम उस शक्ति को पता नहीं... कहां कहां नहीं खोजते पर वो हमें कहीं नहीं मिलती पर जो हमारे सामने है उसे हम हमेशा अनदेखी करते और पूजा की तो बात ही नहीं हमें उसे हिकारत भरी नजरों से देखते हैं उसकी मौलकिता को शून्य समझते हैं उसे बस उपभोग की वस्तु ही समझते हैं...।
क्या वेदों में ये लिखा गया है मां शक्ति के बारे में कि दुर्गा मां नहीं दुर्गा बेटी नहीं दुर्गा बहन नहीं, दुर्गा पत्नी नहीं...नहीं ये नहीं लिखा गया हम इस बात को जानते हैं फिर हम वही काम करते हैं जिससे हमें तथाकथित सुख की अनुभूति होती है...। ये कितना विडम्बना है और कितना मूर्खतापूर्ण है कि हम जिसे शक्ति के रूप में पूजते हैं जिसे शक्ति का मानक मान उसकी प्रतिमा के आगे अपना सर्वस्व निछावर करने की बात करते हैं वही जो प्राण और पूरे शरीर के साथ हमारे साथ होती है (घर की स्त्री) तो उसे हम निरबन, अबला और शक्तिहीन मान कर उसके संप्रभू को खत्म कर देते हैं...।

आज के दौर में पूजा के मायने!
आज के दौर में इंसान खुद को इतना बुद्धिमान समझने लगा है कि वो अपने बुद्धि के सामने सब को ठेंगे पर रखता है...। इंसान तो इंसान वो जिसे अपना रचैयता मानता है उसे भी नहीं छोड़ता वो उसके साथ भी धोखा करने से नहीं चूकता...। उसे भी भ्रष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ता वो उसे कई तरह का लालच देता है कि भगवान अगर मेरे काम हो जाएगा तो ये कर दूंगा वो कर दूंगा...काम नहीं हुआ तो कोसने से भी बाज नहीं आता...। और सारा दोष भगवान पर मढ़ कर छोड़ देता है कि भगवान को तो मंजूर ही नहीं था तो कैसे हो जाएगा काम..।
आज के दौर में पूजा का मायने अपने दुखते मन आर गंदे मन का बोझ हल्का करना रह गया और कुछ भी नहीं..। अगर एक बार इस प्रश्न का उत्तर अपने मन से पूछे तो वो हमें बेहतर उत्तर दे सकता है...।

Pranav Jha

12-10-13

Friday, 27 September 2013

इस शहर को गांव बना देता


इस शहर में
दौड़ती सड़कों पर रुक जाता हूं एक पल
सोचता हूं यूं खड़ा
काश मैं ये रौशनी बुझा देता और
इस शहर को गांव बना देता...
गांव जहां हिंदुस्तान रहता है
देश का दिल बसता है...
इस शहर में
छत पर खड़ा देखता हूं जब दूर
निगाहें इमरतों से टकरा रो पड़ती है
और कहती है
काश मैं इमारतों को गिरा सकूं
देख सकूं खेत खलिहानों को
जहां अन्न उपजता है...
लहलहती है फसले सोने सी
जहां की मिट्टी सोना देती है
तो जीता है हिंदुस्तान...

इस शहर में मैं जब भी निकलता हूं
एक सोच में डूब जाता हूं...कि
ये शहर कितना हंसता है...कभी रोता नहीं!!!
पर आंसू जो निकलता है हंसी से
वो किताना झूठा है और
हंसी कितनी फीकी...
वो आंसू हंसी का नहीं दर्द का है...
धुटन का है...।
और चलती सड़को पर सोचता हूं यूं खड़ा
काश मैं ये रौशनी बुझा देता और इस शहर को
गांव बाना देता...।
गांव जहां हवा स्वछंद है...नदियां गाती है...
चिड़यों की चहचहाहट से
भोर होती है...।
आज भी जब इस शहर में
जब भी खिड़की पर खड़ा होता हूं
उस हवा को महसूस करने के लिए
जो हवा पेड़ के पत्तों को छू कर
खिड़की से मेरे घर आती थी...
काश इस शहर में भी मैं
पेड़ों का झुरमुठ लगा पाता
और हवाओं का रुख गांव से
शहर की ओर कर पाता


और इस शहर को मैं फिर से गांव बना देता...।

Pranav Jha

Tuesday, 25 June 2013

तुम तो चले गए...!!!

मुझ से रुखसत हो के तुम तो चले गए
पर छोड़ गए बरसे हुए बादल का एक टुकड़ा
एक परछाई एक वक्त जो आ भी रुका हैं
वहीं जहां तुम मुझे आखरी सांस दिए
आईने की वो तस्वीर वहीं खड़ी है
जहां तुम उस दिन अपने जुल्फों को जुरे से आजाद की
जुल्फ तो आजाद हो गया था उस वक्त
पर वक्त वहीं ठहरा है आज भी इंतजार में
तुम तो चले गए शामों सहर की जद्दोजहद से आजाद हो के
पर आज भी तेरे होंठे के उस लाली से मेरा सवेरा होता है
और तेरे आंखों के उस काजल से रात का अंधेरा होता है
आज भी तुम्हारी चुड़ियों के टुटने की आवाज घर के हर दिवार से टक्कराती
और आज भी वो टुकड़ें वहीं बिखरे हमरे उस पल के फसाने कहते हैं
बेमंजिल इस राह में चलते हुए एक हवा आती है पास मेरे
देखने के लिए कि तुम्हारी याद की परछाई है या नहीं
पर नदां है वो ये भी नहीं समझती
याद तो उसे करते हैं हम जिसे भूलने की कोई गुंजाइश हो
इस जिस्त में हम तो सांस लेते हैं तेरे बगैर
पर क्या इस सांसों की रवानी को ही जिंदगानी कहते हैं...।
यूं तो इस जिनत से रुखसत के लिए
तेरी यादों का एक पल मिटना ही काफी है
पर जिंदा रहने के लिए तेरा एक अहसास जरूरी है...।

Pranav Jha

कब आओगे घर ?

                                               

आसमां सुर्ख है..हर चीख भी खामोश है
पर सन्नाटे के इस शोर का रहनुमा कौन है
लाशों की ढेर पर सोया वह पूछ रहा
इंसा के जिस्म पर लगे इस दाग का गुनेहगार कौन है?????


वो रात इतनी काली थी कि उस रात की सुबह हो नहीं रही...। आंसुओं की जीख और भूख की तड़प जब चट्टानों से टकराई तो सांस थम गई...और कल तक एक हंसता गाता परिवार बस तस्वीरों में सिमट कर रह गया...। आंसुओं के सैलाब का तस्दीक कर रही पथराई आंखों की पलके..... बस मानो कह रही हो कब आओगे घर...। पर इस विकल आवाज को सुनने बचा ही कौन ना तो इंसान और ना ही भगवान...।

देवो की भूमि उत्तराखंड जब खंड-खंड हो रहा था तब देवताओं के अस्तिवत्व को लेकर इंसान की जेहनियत में भी एक जोर दार सवाल उठ रहा था...। आखिर देवो की इस पावन नगरी में देवता कहां है...। जिस भगवान का नाम लेकर इंसान भवसागर को पार करने की बात करता है आज वो भगवान कहां जा के सो गए कि अपना और अपने भक्तों की नैया को डूबने से नहीं बचा सकें...देवभूमि में पावन धरती केदारनाथ के नाथ तो बच गए पर नाथ को नाथ बनाने वाला अनाथ हो गया...।

चट्टानों के गर्भ से निकले महाविनाश ने जब अपनी लीला देवो की भूमि पर मचाई तो वहां एक भी परिंदा नहीं बचा जो इस विनाश की विभिषका का हाले-ए-बयां कर पाए...। दुनिया ने जब पहली बार वहां की तस्वीर देखी तो दिखा बस इंसानी लोशों का ढेर...। ना तो कहीं से चीख आ रही थी ना ही पुकार बस सन्नाटों की शोर से हर दिशा हिल रहा था
खुशहाली कब आंसू में बदल गई और आंसू कब खामोशी में ये पता भी नहीं चला...पर जब आंख खुली तो दुनिया के सामने तस्वीर पूरी तरह से बदल गई थी...। कल तक नोएडा का जो ओमकार अपने घर के सदस्य को अपनी आंखों से दिदार करता था आज वो अपने खामोश आंखों के साथ परिवार का फोटो हाथ में लिए बस यही कह रहा कि घर कब आओगे...।
जब जिंदगी के सामने भूख मौत बन कर खड़ी हो तो इंसान और जानवर के बीच अंतर मिट जाता है...यही हाल-ए-बयां जिंदगी की जंग जीत कर लौटे एक सैलानी ने कहा जब वे भूख को मिटाने के लिए चट्टान पर उगी घास खा कर अपनी जान बचाई...।

चट्टानों के बीच में आज भी बची और फंसी जिंदगी बस एक ही पुकार कर रही है कोई तो जान बचा लो....सब खत्म हो गया...।उत्तराखंड के आसमां में फटा बादल हिंदुस्तान के हर कोने में जा कर आंसू बन कर बरसा...।देश के हर कोने से भगवान की अराधना और पुण्य की चाहत में आए भक्त को क्या मालूम था कि भक्ति करने का इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी...। और भगवान का ये दर्शन इस बार मोक्ष का ही रास्ता खोल देगा...। मौत की हवस से बची जिंदगी की बस एक ही आस है कि कोई तो आए जो उसे बचा कर उसके अपनो के पास लेकर जाए...। सरकार की नाकामी के बाद जब मोर्चा सेना ने संभाली तो कही से भी बची जिंदगी के जान में जान आई....। और सेना ने इस दुर्गम इलाके में अपनी जिंदगी का परवाह किए बिना हजारों जिंदगियों को बचाया और बचा ने में लगातर लगी हुई है...। और पूरे देश की जुबां से एक ही लब्ज निकल रहा सेना को सलाम....।

मौत का सामना कर लौटी कुछ जिंदगियों से जब पूछा गया हाल तो उसके हाल सुन कर रूह सिहर उठी...। लाशों के बीच में भूख गंदिली हवा और पानी के साथ लगातार चार दिनों तक जिंदगी गुजारना क्या होता है ये इन लोगों के सिवा और कोई नहीं जान सकता है...। जिंदगी की जंग जीत कर जो लौट रहे वो अपने घर तो आ गए पर अपनी जिंदगी को छोड़ कर...लखनऊ का आशिष जब अपने घर से उत्तराखंड गया था तो उसका पूरा परिवार उसके साथ था पर जब वो मौत को मात देकर अपने घर लौटा तो अकेला....। जान तो बच गई पर जीने के लिए कुछ नहीं बचा...। उसकी आंखों से आंसू की बाबसता बस यही पूकार रही है कि...कब आओगे घर...।
बहुत गुस्सा आता है इस मंजर को देख कर पर सोचता हूं गुस्सा किस पर कुरूं तो....जुबान और अंतरमन खामोश हो जाता है...हम लाख कहे कि हम बुरे नहीं अगर हम बुरे हैं तो मेरी आत्मा उस बात की गवाही देती है और हमें बार-बार यही कचोटती है कि तुम बुरे हो तो बुरे हो चाहे लाख कोशिश कर लो...इस बात तो झूठ नहीं ठहरा सकते....।

आखिर इस तबाही का गुनेहगार कौन है...क्या सच में ये आसमानी आफत थी या फिर इंसान के हाथों ही बोया वो खुजूर का पेड़ जो कभी आम नहीं आ सकता....। क्या कुदरत की खामोशी को इंसान ने उसकी कमजोरी मान लिया था...। कुदरत कुछ बोलती नहीं मतलब क्या वो कुछ समझती नहीं....। प्रकृति के सामने इंसान की औकात क्या भगवान की भी नहीं चल पाई कभी...। हम क्यों भूलते हैं जापान में आई उस सुनामी को हम क्यों भूलते हैं हर हमरे देश के अलग अलग हिस्सों में आई बाढ़ को जिस शहर को हम पूरे शिद्दत से सजाते हैं उस शहर को उजाड़ने में बाढ को एक पल भी नहीं लगता...इन सब को देख कर हम क्या कहेंगे क्या ये आसमानी आफत है..नहीं ये आसमानी नहीं ये इंसान के द्वारा ही की गई उसके गुनाहों की सजा है....।

लोभ और लालच सबसे बड़ी घातक चीज होती है और इंसान कभी भी इस चीज से बच नहीं सकता....। वो अपने तथाकथित विकास के लिए सारे कानून कायदे को भूल जाता है और अपने विकास के पागलपन के धुन में वो क्या क्या करने लगता है उसे मालूम भी नहीं होता...। वो कुदरत के हर कायदे कानून को ऐसे ठेंगा दिखाता है जैसे कुदरत जनता हो और इंसान सरकार...वो कुदरत का पुरजोर शोषण करता है और फिर लोकतंत्र की तरह ही परिणाम भी आता है जब जनता अपने पर आती है तो सरकार का पत्ता पत्ता शाख से नीचे गिर आता है...।

हमें फिर से सोचने की जरूरत है कि हम क्यों उसी डाल को काट रहे हैं जिस डाल पर हम अपना आशियाना बनाए हैं...। हम सब कुछ समझते हुए भी सबकुछ देखते हुए भी अंजान क्यों हैं हम सोचते तो हैं पर करते क्यों नहीं....। हर बार हम क्यों आंसू और लाशों के साथ कसम खाते हैं और जैसे ही आंखों से आंसू सुखती है सारे कसमें वादे भूल जाते हैं और फिर से गुनाहों की दल दल में जा फंसते हैं...। पर कुदरत तो कुदरत है हम उसके बच्चें हैं हम गुनाह करते हैं वो सजा भी देती है पर रखती तो वो हैं हमेशा अपनी आंचल में छुपा कर...वो हमेशा सोचती है और इंसान से हमेशा यही कहती रहती है कि मेरे बच्चों कब आओगे घर....।
प्रणव झा

25-06-2013

Sunday, 26 May 2013

आखिर कब तक?

धूंए के साथ सोना
धूंए के साथ उठना
और फिर धूंए बन उड़ जान
आखिर कब तक...?

आंख मीचते ब्रश के साथ
साबून की खुशबू को चुमना
ना शर्ट को इज्जत देना
ना जूते को रस्सी से आजाद करना
आखिर कब तक...?

खाने की जिद्द में
खाने को ही भूल जाना
रीत-रिवाज घर की परंपरा को ठेंगा दिखान
आखिर कब तक....?

हेलमेट की मुलायम फोम से
बालों को रैंदना
नुकिली लोहे की छड़ को
बाइक में चुभाना
फिर उसकी कान मड़ोड़
उसके धूंए के साथ उड़ जाना
आखिर कब तक....?

पहुंच सपनों की दुनिया में
अपने ख्वाबों को टूटते देखना
वीओसी आईड़ी के चक्कर में
की बोर्ड पर यूं ही ऊंगली को चकराना
आखिर कब तक...?

पश्चिमी डेस्क से आती आवाजों पर
बिना रंज हुए तेबर दिखाना
बिना काम भी काम दिखाना
और आवाजों की ऊंचाई से
खुद को सबसे अहम बनाना
आखिर कब तक...?

आपस में हुई बातों को
प्यार इश्क मुलाकातों को
बॉस से लेकर इंटरन तक फैलाना
आखिर कब तक...?

थक हार कर छोड़ दफ्तर को
शाम जले घर आना
सूबह से लेकर शाम तक कि
हर सीन को रिवर्स कर देखना
फिर वहीं रोज का झंझट खाने की जुगत
और तलब की आग में रोटी जले खुद पक जाना
आखिर कब तक...?????

प्रणव झा