Wednesday, 15 October 2014

ये कौन सा मजहब है?




इस्लाम धर्म में लड़के-लड़िकों को एक साथ बैठ कर पढ़ना और उठना बैठना मना है ये मजहब के खिलाफ है इस्लाम के खिलाफ है। जब तक पर्दों का माकूल व्यवस्था नहीं हो जाता है तब तक लड़कियों को मदरसे में नहीं पढ़ाया जा सकता है....।
मोहम्मद मुमताज, प्रिंसपल अजीजिया मदरसा, बिहारशरिफ, नलंदा

क्या फर्क पड़ा कि तख्त बदल दी गई, क्या फर्क पड़ा की ताज बदल दिया गया, क्या फर्क पड़ा की दौर बदल गया, क्या फर्क पड़ा कि परंपरा रिवाज और बंदिशे बदल ने की कहानी गढ़ी गई। कुछ भी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि...जिस नालंदा की धरती को दुनिया भर में लोहा माना जाता रहा है उस के गौरवमंडित सर को वहां के एक मदरसे के प्रिंसपल ने एक पल में कुचल कर रख दिया और समाज को फिर एक एक बार उस दौर में ला कर पटक दिया जहां से शुरूआत की गई थी। क्योंकि प्रिंसपल साहब को 70 फीसदी से ज्यादा लड़कियों को नमांकन होने वाले मदरसे में लड़कियों के लिए माकूल व्यवस्था कम लगने लगा जो और साहब का मजहब उसकी इज्जात देने से मना कर दिया।

जिस मुल्क में महिलाओं को शिक्षित करने के वो सारे बंदिशे तोड़ने के लिए कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं वहीं सदियों से चले आ रहे उसी मुल्क के एक हिस्से में आज भी रूढ़ीवादी परंपरा की जड़ता कम नहीं हो रही है। क्योंकि जब हसरत वास्तविकता के बंधन को तोड़ कर एक दौर में आ कर सिमट जाता है तो फिर मौलिकता किसी कोने में जा कर वक्त के कंधे पर सर टिका कर रोने लगता है।

कैमरों की इस अंधे दौर में जहां हर इंसान की चाहत होती है कि एक चमक के साथ वो भी सुर्खियों में बने रहे लेकिन इस चाहत को पूरा करने के लिए जब इंसान अपने ऊसूलों को ताक पर रख देता है तब उसकी मौलिकाता कि लकीर पतली होनी शुरू हो जाती है और वो उस तार को छेड़ता है जो उस दौर में सबसे ज्यादा संवेदनशील हो...। प्रिंसपल मुमताज ने भी मदरसे की अहाते से कुछ ऐसा ही किया है।

मुहम्मद मुमताज ने जिस मजहब का हवाला देकर मासूम बच्चियों के भविष्य पर इतना बड़ा फैसला सुना दिया है क्या वो दिखाएंगे के उस मजहब के पाक कुरान के किस आयत में उस व्यवस्था का उल्लेख है। या फिर ये सब इन मासूम लड़कियों की भविष्य की बिसात पर सूर्खियां बटोरने का एक शर्मनाक किस्सा है...पर जो भी है एक सुबे के लिए कलंक है वो भी उस सुबे के लिए जिस सुबे में सुशासन का डंका बज चुका है...।


कभी तो लगता है कि क्या यह किस्सा उसी मुल्क का है जो मुल्क मंगल ग्रह पर जा कर एक नया इतिहास रच दिया है क्या यह प्रकरण उसी मुल्क का है जहां के नागरिक को रूढ़ीवादी परंपरा को खत्म करने में सहायता करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा शांति सम्मान दिया जाता है और क्या यह वही मजहब है जहां एक बच्ची को इसी दकयानुसी लकीर को मिटने की कोशिश के लिए दुनिया सम्मानित करती है। हमें तो शर्म आती है इसे सोचते हुए भी.... पर ऐसा हुआ है नालंदा की पवित्र भूमि पर। लेकिन सरकार चुप है उसके कानों तक आवाज नहीं पहुंच रही है उन बच्चियों की जिसका भविष्य मजहब के ऐसे ठेकेदारों के हाथों में है जो अपने फायदे के लिए उसकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे हैं..। लेकिन हो भी क्या सकता है क्योंकि सियासत से आगे की दुनिया बहुत काली है जहां कुछ भी नहीं दिखता है....अगर दिखता भी है तो सिर्फ और सिर्फ सियासत। सिंहासन की इस दौर में लोकतंत्र का दम धुट रहा है वो तिल-तिल मर है। 

pranav jha

Sunday, 12 October 2014

कश्मीर से आगे....



खून का लाल रंग शरीर से निकलने के बाद एक जैसा ही होता है जाहे वो इंसान के शरीर से निकला हो या फिर जानवर के शरीर से। आज-कल सरहद पर ये दोनों खून एक साथ ही हिंदुस्तान की मिट्टी को लाल कर रहे हैं। क्योंकि सीमा पार से गोलियां बरसाई जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्र में बने घरों की दीवारें अपने सीने पर गोली खा छलनी होते हुए एक बेजुवान कहानी हमारे पूरे मुल्क को सुना रही है।

डर क्या होता है... ये हम कभी महसूस नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हम सुरक्षित है, हमें कोई फिकर नहीं कि हमारे घर के अंदर कभी मोर्टार का गोला भी आ सकता है हमें ये सुध नहीं रहता कि रात को सोते हुए कि खिड़की की बाहर से कभी बंदूक की गोली भी अंदर आ सकती है। हम तो आराम से चैन की नींद सोते हैं। तो हमें डर का भी एहसास नहीं होता है। पर कभी अगर ऐसा होता है तो क्या होगा? इस अहसास के आगही मात्र से हमारी रूह तक कांप जाती है। लेकिन ऐसा होता है कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में... जहां पड़ोसी मुल्क की सेनाओं की बंदुक की गोली उनकी खिड़कियों के अदंर आती है मोर्टार का गोला घर के दरवाजे के बाहर मिलता है कभी घर के अंदर मातम होता है तो कभी घर के बाहर।

ये कोई पहली बार नहीं है जब उधर से गोलियां चलाई गई है ऐसा हमेशा होता रहता है समय दर समय...लेकिन इस बीच नहीं होता है कुछ भी तो वो है शांति। हां ये बात और है कि शांति समझौता के लिए हर बार सियासी करवट जरूर ली जाती है। दोनों मुल्क के निजाम आपस में देश और विदेश दोनों जगह मिलते हैं बात करते हैं पर सीमा पर तो गोलियों से ही बात होती है।

धरती पर जन्नत का एहसास कराने वाला कश्मीर दोनों देश के बीच एक नासूर बन कर रह गया है और दोनों मुल्क के दर्द को कभी कम होने नहीं देना का काम करता है। इस्लामाबाद और दिल्ली की गद्दी पर जब-जब नए निजाम आते है कश्मीर की आग दुगुनी रफ्तार से धधकने लगती है।
आखिर कश्मीर के मुद्दे को कैसे सुलझाया जा सकता है? क्या खोखले शांति समझाते के जरिए कश्मीर की आग को बुझाई जा सकती है? या फिर युद्ध से ही इस मसले का हल निकाला जा सकता है। इन तमाम रस्साकशी में कभी उस दर्द को उस डर को दोनों मुल्कों ने महसूस किया। नहीं....जिस डर के साए में कश्मीर के लोग अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।

दोनों मुल्कों के टीवी पर चलती खबरों में कभी कश्मीर के दर्द को नहीं दिखाय जाता है कभी वहां के डर को नहीं दिखाई जाती है कभी वहां के जिंदगी नहीं दिखाई जाती है तो कभी वहां मौत के मातम को नहीं दिखाया जाता है। दिखाता है तो सिर्फ और सिर्फ नफरत की लकीर...। जिसे मिटने के लिए नहीं बढ़ाने के लिए दोनों मुल्कों की सेनाओं की बंदूक दनदनाती है और तोपें गरजते हैं। जैसे बाकी हिंदुस्तान और पाकिस्तान को रात को चैन से सोने का अधिकार है वैसे ही कश्मीर के लोगों को भी चैन से सांस लेने का अधिकार है पर ऐसा नहीं हो पाता है वहां हर एक सांस संगीन के साए में ली जाती है और कब कौन सी सांसें आखिरी हो जाए कहा नहीं जा सकता है। क्या कोई ऐसी जिंदगी का कामना भर कर सकता है..नहीं, लेकिन ऐसा होता है धरती के इस जन्नत में।

पड़ोसी मुल्क का सियासत जहां कश्मीर से ताय होता है तो हमारे मुल्क में वोट बैंक का बड़ा हिस्सा कश्मीर को माना जाता है। पाकिस्तान अपने जन्म से आज तक अपना भविष्य कभी भी कश्मीर से आगे नहीं देखता है वहीं भारत के ध्यान को भी अपने नापाक हरकतों से भटकाता रहता है।

तो क्या अमन के लिए तरसती कश्मीर की धरती की किस्मत कभी नहीं बदलेगी। आज तक के हालत को देखते हुए कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। पर अगर ये कयास लगाया जाता है कि इस मुद्दे का हल युद्ध से ही हो सकता है तो हम ये कहेंगे कि युद्ध से कभी शांति नहीं मिलसकती मिलेगी युद्ध बस एक गहरी खामोशी देगा और युद्ध से उठे धूल के काले बादल के साए में इंसान मिट्टी में मिल जाएगा। तो जब तक युद्ध टल रहा है टलने दो युद्ध के बाद कोई भी विकल्प सही हो सकता जो दोनों मुल्क और मानवता के लिए उचित होगा।