‘इस्लाम धर्म में
लड़के-लड़िकों को एक साथ बैठ कर पढ़ना और उठना बैठना मना है ये मजहब के खिलाफ है
इस्लाम के खिलाफ है। जब तक पर्दों का माकूल व्यवस्था नहीं हो जाता है तब तक
लड़कियों को मदरसे में नहीं पढ़ाया जा सकता है....।‘
मोहम्मद मुमताज, प्रिंसपल अजीजिया मदरसा, बिहारशरिफ, नलंदा
क्या फर्क पड़ा कि तख्त बदल दी गई, क्या फर्क पड़ा की ताज बदल दिया गया, क्या
फर्क पड़ा की दौर बदल गया, क्या फर्क पड़ा कि परंपरा रिवाज और बंदिशे बदल ने की
कहानी गढ़ी गई। कुछ भी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि...जिस नालंदा की धरती को दुनिया भर
में लोहा माना जाता रहा है उस के गौरवमंडित सर को वहां के एक मदरसे के प्रिंसपल ने
एक पल में कुचल कर रख दिया और समाज को फिर एक एक बार उस दौर में ला कर पटक दिया
जहां से शुरूआत की गई थी। क्योंकि प्रिंसपल साहब को 70 फीसदी से ज्यादा लड़कियों
को नमांकन होने वाले मदरसे में लड़कियों के लिए माकूल व्यवस्था कम लगने लगा जो और
साहब का मजहब उसकी इज्जात देने से मना कर दिया।
जिस मुल्क में महिलाओं को शिक्षित करने के वो सारे बंदिशे तोड़ने के लिए कई
तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं वहीं सदियों से चले आ रहे उसी मुल्क के एक
हिस्से में आज भी रूढ़ीवादी परंपरा की जड़ता कम नहीं हो रही है। क्योंकि जब हसरत
वास्तविकता के बंधन को तोड़ कर एक दौर में आ कर सिमट जाता है तो फिर मौलिकता किसी
कोने में जा कर वक्त के कंधे पर सर टिका कर रोने लगता है।
कैमरों की इस अंधे दौर में जहां हर इंसान की चाहत होती है कि एक चमक के साथ वो
भी सुर्खियों में बने रहे लेकिन इस चाहत को पूरा करने के लिए जब इंसान अपने ऊसूलों
को ताक पर रख देता है तब उसकी मौलिकाता कि लकीर पतली होनी शुरू हो जाती है और वो
उस तार को छेड़ता है जो उस दौर में सबसे ज्यादा संवेदनशील हो...। प्रिंसपल मुमताज
ने भी मदरसे की अहाते से कुछ ऐसा ही किया है।
मुहम्मद मुमताज ने जिस मजहब का हवाला देकर मासूम बच्चियों के भविष्य पर इतना
बड़ा फैसला सुना दिया है क्या वो दिखाएंगे के उस मजहब के पाक कुरान के किस आयत में
उस व्यवस्था का उल्लेख है। या फिर ये सब इन मासूम लड़कियों की भविष्य की बिसात पर
सूर्खियां बटोरने का एक शर्मनाक किस्सा है...पर जो भी है एक सुबे के लिए कलंक है
वो भी उस सुबे के लिए जिस सुबे में सुशासन का डंका बज चुका है...।
कभी तो लगता है कि क्या यह किस्सा उसी मुल्क का है जो मुल्क मंगल ग्रह पर जा
कर एक नया इतिहास रच दिया है क्या यह प्रकरण उसी मुल्क का है जहां के नागरिक को
रूढ़ीवादी परंपरा को खत्म करने में सहायता करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा शांति
सम्मान दिया जाता है और क्या यह वही मजहब है जहां एक बच्ची को इसी दकयानुसी लकीर को
मिटने की कोशिश के लिए दुनिया सम्मानित करती है। हमें तो शर्म आती है इसे सोचते
हुए भी.... पर ऐसा हुआ है नालंदा की पवित्र भूमि पर। लेकिन सरकार चुप है उसके
कानों तक आवाज नहीं पहुंच रही है उन बच्चियों की जिसका भविष्य मजहब के ऐसे
ठेकेदारों के हाथों में है जो अपने फायदे के लिए उसकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे
हैं..। लेकिन हो भी क्या सकता है क्योंकि सियासत से आगे की दुनिया बहुत काली है
जहां कुछ भी नहीं दिखता है....अगर दिखता भी है तो सिर्फ और सिर्फ सियासत। सिंहासन
की इस दौर में लोकतंत्र का दम धुट रहा है वो तिल-तिल मर है।
pranav jha



