ग्लैमर, चकाचौंध और शहर को इस शोरशराबों से दूर 46 साल पहले एक ऐसी रहस्यमयी
कहानी की बुनियाद पड़ती है जिसे सुन कर पूरा मुल्क सकते में आ जाता है कि रिश्तों
की ऐसी मकड़जाल.....कैसे हो सकता है ! मुंबई शहर से बहुत दूर असम के दिसपुर में ये
कहानी शुरू होती है । साल 1969 था जब उपेंद्र कुमार बोरा के छोटे भाई की पत्नी
दुर्गा रानी दास एक बेटी को जन्म देती है और जन्म देने के कुछ दिन बाद उसके पिता
यानि उपेंद्र कुमार बोरा का छोटा भाई दुर्गा रानी को छोड़ देता है। बाद में उपेंद्र,
दुर्गा रानी से शादी कर लेता है।
जन्म लेते ही रिश्तों को पलट कर रख देने वाली दुर्गा रानी की बेटी का नाम
इंद्राणी ने अभी तक रिश्तों का ऐसा मकड़जाल बुना जिसमें कोई मकड़ी भी उलझ कर दम
तोड़ दे। साल 1975 में इंद्राणी दिसपुर के सेंटमेरी स्कूल में दाखिला ली। उसके बाद
वो शिलांग चली गई। जहां उसकी मुलकात सिद्धार्थ दास से होती है और वहीं कुछ दिनों
के बाद वे दोनों शादी कर लेते हैं। इस शादी से दो बच्चे होते हैं जिसका नाम शिना
और मिखाइल होता है। कुछ वक्त के बाद इंद्राणी सिद्धार्थ को तलाक दे कर 1990 में
कोलकाता पहुंचती है। जहां संजीव खन्ना से शादी करती है और उससे एक बेटी होती है
जिसका नाम होता है विधि। अपने मुकाम की तलाश में इंद्राणी फिर से अपनी जिंदगी में
रिश्तों के इस पैराहन को उतार कर फेकते हुए संजीव खन्ना से 1998 में तलाक ले लेती
है और 1999 में पहुंच जाती है मायानगरी मुंबई। मुंबई पहुंच कर इंद्राणी स्टार
इंडिया के एचआर मैनेजर बन जाती है जिसके सीईओ रहते हैं मीडिया मुगल पीटर मुखर्जी
जिन्हें निजी चैनलों को कामयाब बनाने वाले सीईओ के तौर पर भी देखा जाता है।
इंद्राणी और पहले से तलाकशुदा पीटर मुखर्जी के बीच एक बार फिर से प्यार परवान
चढ़ता है और 2002 में दोनों शादी कर लेते हैं। इंद्राणी से शादी से पहले पीटर
मुखर्जी को पूर्व पत्नी शबनम से दो बच्चा होता है राहुल और रॉबिन, जो कि अपने मां
के साथ देहरादून में रहता था।
इंद्राणी पीटर को अपनी तलाकशुदा पति संजीव खन्ना और बेटी के बारे में बताती
है। वहीं शिना और मिखाइल को अपने भाई और बहन के रूप में पीटर के सामने पेश करती
है। इधर पीटर का स्टार इंडिया से कांट्रौक्ट खत्म होने के कगार पर था। कुछ बिजनेस
शर्तों के आधार पर पीटर मुखर्जी इंद्राणी के नाम से एक कंपनी खोलता है जिसका
चेयरमैन खुद और सीईओ इंद्राणी को बनाता है।
इंद्राणी की बहन की पहचान रखने वाली शीना बोरा मुंबई पहुंचती है। जहां
इंद्राणी के जरिए वह सौतेले पिता पीटर मुखर्जी से साली के तौर पर मिलती है। शीना
को मुंबई मेट्रो में नौकरी मिलती है, जहां उसकी मुलाकात पीटर के पूर्व पत्नी शबनम
के बेटे राहुल से होती है और दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगने लगती है और वे दोनों
शादी करने का फैसला करते है जो ना तो पीटर को मंजूर था और ना ही इंद्राणी को। इस
बीच 24 अप्रैल 2012 को शीना का मर्डर हो जाता है जिसके रहस्य से पर्दा मुंबुई
पुलिस के सामने इंद्राणी का ड्राइवर के साथ एक गुमनाम कॉल उठाता है और फिर शुरू
होता है ‘लाइव क्राइम थ्रीलर
शो’ जो लगातार चले ही जा रहा
है।
इस अंतहीन रहस्यमय क्रिमनल कथा में ग्लैमर है, बेसुमार पैसा है, ताकत, नशा,
सेक्स और एक लंबा धोखा है। इस कथा में सच सौतेला है, अपना खून झूठा है, सौतेले
रिश्तों में अपना प्यार है। महत्वकांक्षा के चादर पर जिंदगी ‘लिव-इन’ में है।
सेल वैल्यू के जब सारे कंटेंट एक साथ एक कथा में समाहित हो तो मीडिया इस अवसर
को भुनाने से कहां चुकता है। चाहे उसके सामने जंतर-मंतर पर ‘वन रैंक’ ‘वन पेंशन’ के लिए कोई आंदोलनकारी
अपनी जान देने को तैयार हो या फिर आरक्षण की ने आग किसी प्रदेश में विकट रूप ले लिया
हो....कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इंद्राणी कथा में रोज एक नया खुलासा हो रहा है।
इंद्राणी का तिलिस्म हर दिन एक नया डेली शॉप बनाता जा रहा है और सनसनी फैलाने
वाला मीडिया उसे टीआरपी के रूप में खरीदता जा रहा है।
यह एक अनंत कथा है जिसके कहने वाले अनेक है। कभी इस कथा को अपराधी बाचता है तो
कभी पुलिस जो बच जाता है उसे तो मीडिया कइयो एंगल बना कर कई तरीके से बाचता है। ये
कथा इस लिए भी रोचक है क्योंकि इस कथा में एक हत्यारिन मां के कई तरह के इफैक्ट्स
हैं जो बहुत जहग असर छोड़ते हैं। ‘माता सुनी ना कुमाता’ ये संस्कृत का श्लोक है। जो संस्कृत की तरह ही
किसी सदी में छूट गया है। अब यहां सब कुछ संभव है। यहां माता भी कुमाता होती है।
लेकिन सवाल इंद्राणी का नहीं है यहां अपराधबोध का है कहीं मीडिया अपराधबोध
करवाते करवाते खुद ही ना अपराधी हो जाए। क्योंकि जहां एक तरफ देश में वारदतों और
सनसनी से इतर कई मुद्दे सामने आने के लिए बेताब हैं वहां इस ‘हत्यारिन मां का टीआरपी शो’ दिखा कर मीडिया भी एक
अपराध कथा का हिस्सा ही तो बन रहा है।
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