Friday, 25 October 2013

अब जज्वातों पर सियासत




मैं हत्याओं के दर्द को भुगत चुका हूं... इसिलिए मैं मौत से नहीं डरता। दंगों के खिलाफ गुस्सा आने में एक मिनट लगता है... लेकिन उसे खत्म करने में बरसों लग जाते हैं...। मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और शायद मुझे भी मार देंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे।
फर्क नहीं पड़ता, मौतों से, क्योंकि मौत का डर नहीं... राहुल गांधी इतिहास का पन्ना उलटा कर भविष्य का किताब लिखना चाह रहे हैं...शायद...

मौसम बदल रहा है सूरज अपनी गर्मी को कम कर रहा है तो ठंड अपने सफेद चादर ओढ़ कर लोगों के शरीर पर हावी होने की कोशिश कर रहा है वहीं देश का भी मौसम इस मौसम से उलट हो रहा है ठंड की शितलता हाशिए पर आ रही वहीं गरमी बेतरतिब बढ़ती जा रही है...बढ़नी भी चाहिए क्योंकि सियासत का मैदान फिर से महारथियों के गर्जना से अहलादित हो रहा है...। पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा और 2014 के चुनाव का शंखनाद हो चुका है...।

देश में चुनाव होने जा रहा है यानि लोकतंत्र- जनता के द्वारा जनता पर कि जाने वाले शाषण का महापर्व...।

एक दौर था जब धर्म पे सियासत हुआ करता था जाति को तकसीम कर वोट बैंक बनाया जाता था खून और रंग का अहसास दिला कर सत्ता की कुर्सी तय की जाती थी...। वक्त बदाल तो हर चीज के मायने भी बदल गए...। अब एक नया फार्मूला भी ईजाद कर लिया गया या यों कहिए कि पहले से मौजूद फार्मूले को नए हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना...। अब जिस दौर में सियासत का अखाड़ा तैयार हो रहा है वहां सियासतदान जज्वादों पर सियासत करने पर उतारू हैं...। क्योंकि ये अब तक का सबसे सफल फार्मूला रहा है...। इस देश में अगर कोई इंसान ऐसे किसी भी प्रयास से झुकता नहीं है तो उसके जज्वातों को हथियार बना कर उसे आप आसानी से झुका सकते हैं...क्योंकि इस देश के लोगों के पास कुछ हो ना हो जज्वातों की कोई कमी नहीं है...।

पहले बिहार फिर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जो हाल हुआ है वो पूरे देश के साथ कांग्रेस पार्टी भी बखुबी जानते हैं और इससे भी ज्यादा अनुभव कांग्रेस के युवराज यानि राहुल गांधी को कुछ ज्यादा ही है जिसका अहसास उनके भाषणों से निकल कर सबके सामने आ रहा है...। राहुल गांधी इस बात को जान गए हैं कि अब वो दौर बदल चुका है जब देश की आधी की आधी आवादी अशिक्षित जिसे सियासी भाषा में मूर्ख कहा जाय, नहीं रही है...। देश की जनता अब अपना भला और बुरा पूरी तरह से तो नहीं पर एक हद तक समझने लगी है...। तो इस दौर में धर्म, जाति, खून के नाम पर सियासत करना मूर्खता ही होगा...। तो क्यों नहीं इनके जज्वातों के साथ खेला जाए और एक बार फिर से सिंहासन को पक्का करने का कवायदा तेज किया जाए....।

मध्य प्रदेश के शरडोल में युवराज आदिवासियों को संबोधन में इज्जत का मतलब समझने हुए अपनी मां की कहानी सब को सुनाई और उसके तीन दिन बाद ही फिर से इंदौर की सभा में मौत का मायाने समझने लगे। जनता के बीच भावनाओं का बवंडर फोर खुद राहुल हवा हो गए लेकिन पीछे छोड़ गए जख्मों का बड़ा सा पुलिंदा...।

भारत के इतिहास में ये पहला मौका नहीं है जब इस तरह की बातें सामने आई है...इससे पहले भी कई बार ऐसी घटना घट चुका है जब कोई भी शस्त्र कामयाब नहीं हुए तब जज्वाती शस्त्र के माध्म से सियासतदां अपनी सियासत की पारी को आगे बढ़ाई है...। कुछ ऐसे ही उदाहरण यहां है-

14 अगस्त 1947
देश के आजादी से एक दिन पहले जब जवाहर लाल नेहरू जब संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि
आधी रात के समय जब दुनिया सो रही होगी तब भारत आजादी और नए जीवन के लिए जगेगा। वक्त आता है, इतिहास में ऐसे मौके कम आते हैं जब हम पुराने को छोड़ कर नए दौर में जाते हैं, जब युग का अंत होता है और जब लंबे समय से दबी कुचली देश की आत्मा को आवाज मिलती है
जिसका असर भी भरपूर हुआ नेहरू की लोकप्रियता और भी दुगुनी हो गई

1965
लाल बहादूर शास्त्री पाकिस्तान युद्ध के समय एक जनसभा के संबोधन में आनाज के संकट से जूझ रहे देश के लिए एक दिन का उपवास रखने को कहा था...साथ ही किसानों का उतसाह वर्धन के लिए जय जवान, जय किसान का नारा दिया था
असर ऐसा हुआ कि आज भी लोग इस नारे को अपनी जुवाव पर साजए हुए हैं और युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह से पराजीत किया

1971
इंदिरा गांधी ने कहा-
वो कहते हैं कि इंदिरा को हटाओ, मैं कहती हूं कि गरीबी को हटाओ
इंदिरा के इस भाषण से 71 के चुनाव में पार्टी की शानदार जीत हुई...और केंद्र में इंदरा ने सरकार बनाई।

1984- आज का ओडिशा
देश की पूर्व प्रधानमंत्री और राहुल की दादी इंदिरा गांधी अपनी मौत से पहले कहीं थी-
मैं रहूं ना रहूं, लेकिन मेरे खून का एक-एक कतरा इस देश के काम आएगा। इस देश को मजबूती देगा।
जिसका असर पूरे देश में 1985 के आम चुनाव में देखा गया जब उनके इस भाषम का ऑडियों रिकॉर्ड कर के पूरे देश में सुनाया गया और कांग्रेस फिर से एक बार भारी बहुत के साथ सत्ता में आई...।

1990 अलवर, राजस्थान
अपने भाषण में राजीव गांधी ने कहा था-
सरकार एक रुपया भेजती है लेकिन इस रुपए का 15 पैसा ही आप लोगों तक पहुंच पाती है, 85 पैसा तो बीच में खा लिया जाता है
बोफोर्स मामले में घिरने का बावजूद राजीव के इस भाषण ने लोगों के दिल में जगह बना ली और केंद्र में 1991 में राजिव गांधी ने फिर से सरकार बनाई

2012 जुलाई- गांधीनगर, गुजरात
नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था-
अगर मैं गोधरा दंगे का दोषी हूं तो मुझे फांसी पर चढ़ा दो। 2004 में मैंने कहा था मैं माफी क्यूं मांगू। अगर मेरी सरकार ने ऐसा किया है तो मुझे सार्वजानिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाए। ताकि अगले 100 सालों तक कोई ऐसा करने का साहस न कर सके

कुछ ही महीनों के बाद मोदी लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और चौथे बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

और अब राहुल गांधी और कई अन्य नेता जो इस दुहराते हुए नजर आते हैं..

ये कुछ इतिहास के पन्ने हैं जो यह तस्दीक कर रहा है कि इस देश में भानाओं का हवाला देख कर आप हावाओं का रुख कहीं भी मोड़ सकते हैं तो क्या फिर से एक बार जज्वातों की आंधी में जनता की आंसू सूख जाएगी...। ये तो वक्त आने पर पता चल ही जाएगा।

पर इन सब के बीच सवाल वहीं खड़ा है जहां वो बरसों से खड़ा है उसे जवाब नहीं मिला कि क्या इस देश में हर बार कमजोरी का सहार ले कर ही सत्ता की कुर्सी मजूबत होती रहेगी या सत्ता के मजबूती से देश की जनता का आत्मबल मजबूत होगा। क्या इस देश की चिंता किसी को नहीं रह गई क्या यहां बस लोग अपने लिए ही पैदा हुए है अगर यही सोच आगे तक रही तो फिर कोई पैदा नहीं होगा सब खत्म हो जाएगा...। क्या ये देश सिर्फ जज्वातों से चलेगा....
नहीं साब... जज्वातों से सिर्फ मन बदल सकता है देश की ये माली हालात नहीं...।

Pranav Jha

25-10-13

Saturday, 12 October 2013

शक्ति की पूजा और शक्ति की पहचान?




नवरात्र नौ दिन तक तन मन धन से शक्ति यानि मां दुर्गा की उपासना...।  नौ दिन तक मां दुर्गा के अलग अलग रूपों की उपासाना करना नवरात्र होता है। साल में एक बार लोग पूरे तन मन धन से शक्ति की उपासना करते हैं व्रत करते हैं पूजा करते हैं और अलग अलग प्रकार से मां की आराधना में जुटे रहते हैं।

मन को साध कर और अपनी दैनिक क्रियाओं को समय बदल कर या उसे छोड़ कर बस मां दुर्गा की उपासना करना ही नवरात्र होता है! ये अब तक के अनुभव से के आधार पर है...।
आगे बढ़ने से पहले मैं बता दूं की ये लेख ना तो किसी की धर्मिक आस्था को चोट करना चाहता है और ना ही नास्तिकता को मजूबत करने के संदर्भ में ये लिखा गया है।  समाज की रुढ़ और परंपरावादी सोच से निकल कर कभी एक बार ये सोचने के लिए मात्र एक पहल है कि क्या नवरात्र में हम तन मन धन समर्पित कर के उन अकर्मों से निजात पा सकते हैं जो हम साल पर ये जानते हुए करते हैं कि ये गलत है और हम वो सारे कामों को बस दस दिनों के लिए ही छोड़ते हैं जैसे ही नवरात्र का दसवां दिन आता है मां को विदा कर फिर से अपने पूर्ववत कार्य में तल्लिन हो जाते हैं मां के भक्त।

भारत विभिन्न धर्मों का एक समभव है यहां के लोग का मूल ही धर्म है ये बात यहां रह कर, यहां जी कर, यहां देख कर लगता है भारत में लोग धर्म को सबसे ऊपर रखते हैं...क्योंकि इसका एक ये भी कारण हो सकता है कि ये सबसे बड़ा रक्षा कवच है अपने करने वाले उन सारे कामों को जो मानवता और समाज के विरूद्ध है...। इस बात को हम जानते भी हैं पर हमेशा नकारते आए हैं और ये सबसे बड़ा कायरता है...।

नवरात्र में जिस देवी मां की आराधना हम पूरे भक्ति भाव से करते हैं उस देवी की विवेचना भी हम ग्रथों में पढ़ते हैं...। मां दुर्गा जो शक्ति की सूचक है मानक है हम उसकी पूजा करते हैं पर वही शक्ति जो हमारे जीवन को हमारे साथ रह कर हमें सहारा देकर हर वक्त हमारे साथ चलती है हम उसकी उपेक्षा करते हैं निंदा करते हैं उसे कोसते हैं दुनिया भर की जुल्मों सितम करते हैं यहां तक की उसकी जिंदगी को नर्क बनाने से भी नहीं चुकते...। क्या यही हमरी पूजा की वास्तविकता है...। हम पूरे साल भर हर वो काम करते हैं जो हमरे हित में हो और हमारा हित हमेशा नेक नहीं होता...।  आज भारत का जो हाल है उसमें हम किस मूंह से मां दुर्गा की उपासना कर सकते हैं हम उसे किस मुंह से उसके नामों का वर्णन कर सकते हैं...। नवरात्र में जिस कान्या को हम खिलते हैं जिससे हम आशिर्वाद लेते हैं उसी कान्या की हत्या हम उसे दुनिया में आने से पहले करते हैं जिसका पैदा होना  हमें अभिशाप लगता हैं उससे हम आशिर्वाद की चाहत कैसे कर सकते हैं जिसे हम घर में रख कर उसे तमाम तरह की यातना देते हैं उसे हम किस लव्ज से दुर्गा कह कर पुकार सकते हैं जिसकी शक्ति को हम हर पल अपने अहं के आगे रैंद रैंद कर उसे पर कटे पक्षी की भांति बना देते हैं उसे हम किस मंत्रों से शक्ति का रूप कह सकते हैं...।
अगर हम माता की उपासान के विधि में जाए तो जबसे पहले हम दुर्गासप्तसती में वर्णित मां दुर्गा के उस स्लोक की बात करेंगे जो सीधे तैर पर कहती है कि मां दुर्गा मूर्ति में नहीं पत्थर में नहीं वो हमारे घर में हमेशा हमारे साथ रहती है

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नम:

जो देवी मेरी मां है उसे हम सत्-सत् नमन करते हैं...
जो देवी हमरी लज्जा है उसे हम सत्-सत् नमन करते हैं...
जिस देवी का हम मेरे ऊपर दया है उस देवी को हम सत्-सत् नमन करते हैं...

अखिर वो देवी कौन जिसे हम पूजते है?

हम नहीं जानते क्योंकि हमने जानने की कोशिश नहीं कि या हम जान कर भी अनजान बने हुए है...।
इन तमाम स्लोको में क्या कहा गया है कभी इसकी गहराई को समझे है या समझने की कोशिश किए है...नहीं....कभी नहीं हम तो बस मां की आरधाना के लिए बनाए गए कानून के मुताबिक बस किताब उलटाए और अध्याय शुरू से अंत तक स्पीड में पढ़ कर बस काम पूरा कर दिए क्योंकि हमरे यहां पूजा के लिए यही संविधान है और हम इसे कानून का पालन के तौर पर लेते हैं और आशा करते हैं कि मां इस से प्रसन्न होती है। क्योंकि पूजा के संविधान निर्माता (पंडित) यही कहते हैं।

तमाम स्लोको में बस एक औरत का ही पूरा वर्णन है जो हर रूप में हमारे साथ है जो सर्वशक्ति से संपन्न है जो हमारे जीवन को पूरा कर सकती है हमें इसी धरती पर स्वर्ग की अनूभूति दिला सकती है पर हम तो ये जान कर भी अंजान है हम उस शक्ति को पता नहीं... कहां कहां नहीं खोजते पर वो हमें कहीं नहीं मिलती पर जो हमारे सामने है उसे हम हमेशा अनदेखी करते और पूजा की तो बात ही नहीं हमें उसे हिकारत भरी नजरों से देखते हैं उसकी मौलकिता को शून्य समझते हैं उसे बस उपभोग की वस्तु ही समझते हैं...।
क्या वेदों में ये लिखा गया है मां शक्ति के बारे में कि दुर्गा मां नहीं दुर्गा बेटी नहीं दुर्गा बहन नहीं, दुर्गा पत्नी नहीं...नहीं ये नहीं लिखा गया हम इस बात को जानते हैं फिर हम वही काम करते हैं जिससे हमें तथाकथित सुख की अनुभूति होती है...। ये कितना विडम्बना है और कितना मूर्खतापूर्ण है कि हम जिसे शक्ति के रूप में पूजते हैं जिसे शक्ति का मानक मान उसकी प्रतिमा के आगे अपना सर्वस्व निछावर करने की बात करते हैं वही जो प्राण और पूरे शरीर के साथ हमारे साथ होती है (घर की स्त्री) तो उसे हम निरबन, अबला और शक्तिहीन मान कर उसके संप्रभू को खत्म कर देते हैं...।

आज के दौर में पूजा के मायने!
आज के दौर में इंसान खुद को इतना बुद्धिमान समझने लगा है कि वो अपने बुद्धि के सामने सब को ठेंगे पर रखता है...। इंसान तो इंसान वो जिसे अपना रचैयता मानता है उसे भी नहीं छोड़ता वो उसके साथ भी धोखा करने से नहीं चूकता...। उसे भी भ्रष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ता वो उसे कई तरह का लालच देता है कि भगवान अगर मेरे काम हो जाएगा तो ये कर दूंगा वो कर दूंगा...काम नहीं हुआ तो कोसने से भी बाज नहीं आता...। और सारा दोष भगवान पर मढ़ कर छोड़ देता है कि भगवान को तो मंजूर ही नहीं था तो कैसे हो जाएगा काम..।
आज के दौर में पूजा का मायने अपने दुखते मन आर गंदे मन का बोझ हल्का करना रह गया और कुछ भी नहीं..। अगर एक बार इस प्रश्न का उत्तर अपने मन से पूछे तो वो हमें बेहतर उत्तर दे सकता है...।

Pranav Jha

12-10-13