Tuesday, 29 December 2015

'कितना बदला भारत'

2014 से 2015 तक का सफर शपथ का ही रहा। 2014 पीएम का तो 2015 सीएम का। जनता ने भी खूब विश्वास दिखाया। 2014 में ये आशा थी कि दिन अब अच्छे आने वाले हैं लेकिन कैलेंडर पर बस पन्ने पलटते गए और अच्छे दिन का सपना टूटता गया। परिणाम ये हुआ कि दिल्ली में केजरीवाल अपने दल बल के साथ आ गए। केजरीवाल मोदी जी से भी ज्यादा सपने दिखा कर कुर्सी पर बैठ गए और फिर जनता की नींद टूट गई। इतिहास के 68 साल में जनता इतनी जल्दी नहीं जागी जितनी जल्दबाजी दिल्ली और बिहार चुनाव में दिखाई। क्योंकि मुल्क का भाग्य ही खराब है जो हमेशा एक ही कहानी दुहराती है।

जिस मंगलराज की कामना में बिहार में जनता ने सुशासन बाबू के हाथ में अपनी किस्मत फिर से दे दी वहां कुशासन का ऐसा नंगा नाच हो रहा है कि जंगलराज की याद फिल्म की तरह रिकैप होने लगी है। दिनदहाड़े किसी को भी गोली से भून दिया जाता है। फिरौती के लिए फोन आता है और ना देने पर गोली मार दिया जाता है। डकैती की घटना आम हो गई है जो बिहार के लिए शुभ संकेत नहीं है।
लेकिन सपनों के सौदागर के तौर पर क्रांति पुरूष ने लोकपाल के चक्कर में जनता को ऐसे उलझाया और सुविधा देने के नाम पर समीकरण का ऐसा जाल बुना की लोग भी थक कर बैठ गए। जहां वाई-फाई के नाम पर नेटवर्क भी ठीक नहीं हुआ, वहीं बिजली पानी का संकट और भी बढ़ गया। सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली पूरे राज्य की तुलना में सबसे असुरक्षित राज्य हो गया।
लेकिन देश आज भी बदलाव का गीत गा रहा है। 16 दिसंबर अब काले दिन के तौर पर याद किया जाता है लेकिन उसके बाद भी 33707 घटनाएं घटित हुई है, जो यहां के लोगों को शर्मसार करने के लिए काफी है। लेकिन इस मुल्क में रह रहे कुछ लोगों को शर्म नहीं आती क्योंकि उसके जेहन में इंसानी खून नहीं बहता, वो वहशी है जो मासूमों को अपना शिकार बनाता है। लेकिन एक वहशी और भी है इस मुल्क में, वो है किसानों की हत्या का जिन्न। इस जिन्न ने कई बेकसूर किसानों को मिट्टी में मिला दिया। सरकार ने इस पर खूब सियासत किया। अंतत: कुछ भी नहीं हुआ ये सिलसिला जारी है आज भी....।
लेकिन फिर भी हौसला है कि बदलाव आएगा। इस देश में जनता की अपेक्षा की हमेशा उपेक्षा होती रही है, और ये अब तो ये आम हो गया है। मोदी के तुफान ने इस देश का इतिहास तो बदला लेकिन भूगोल और रियाया की किस्मत पर आ कर मार खा गई। सिर्फ आंकड़ों के आधार पर ही मुद्रास्फीति कम हुई है बाकि देश में रोटी चावल खान भी मुश्किल हो रहा है। मोदी जी के शासन शैली को लेकर 'मेक इन इंडिया' का रंग भी इंडिया पर नहीं चढ़ रहा है। जहां एक तरफ लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है वहीं दूसरी तरफ उद्योग-धंधे का भी हाल बेहाल है। एक तरफ शहर में इतने लोग माईग्रेट हो रहे हैं जिससे अब किसी भी शहर में रहना गवारा नहीं है वहीं दूसरी तरफ गांव में कोई नहीं है। क्योंकि गांव में न सुविधा है और ना ही रोजगार का कोई साधन है।

जहां तस्वीर नहीं बदल रही है वहीं सियासत की गांठ भी ढिली नहीं पड़ रही, वो बदस्तूर जारी है। सब कुछ अपने हिसाब से चल रहा है। तारीखें तो बदल रही है, लेकिन तस्वीर बदलने का नाम नहीं ले रही क्योंकि सबको अपनी पड़ी है, देश की नहीं। इस सब के बीच जनतंत्र कहां है, आजादी कहां है, देश कहां है और लोगों का विश्वास कहां? अब यहां सब कुछ एक सपना सा लगता है,जो हर एक आहट पर टूट जाता है। 

Sunday, 6 December 2015

20 सितंबर के बाद....नेपाल

एक समान सभ्यता, संस्कृति और परंपरा होने भर से एक लकीर को पाटी नहीं जा सकती है, दो देशों के बीच खींची हुए लकीर, धर्म या साहित्य के एक होने से नहीं खत्म होती। ये इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि भारत और नेपाल दुनिया के पटल पर दो अलग देश हैं और बहुत कुछ समानताओं के बाद भी ये दोनों देश स्वयंभू राष्ट्र हैं और बहुत सारी असमानताएं भी हैं। समय-समय पर दोनों राष्ट्रों के बीच की लकीर भावनात्मक रूप से मिटती रही है लेकिन बदलते वक्त के बिसात पर तस्वीर भी बदलती रही है। और आज जो तस्वीरें हमारे सामने हैं ये उस नेपाल की है जहां राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। वहीं शांतिस्थली के रूप में देखाजाने वाला नेपाल अब खून-खराबे और जंग का मैदान हो गया है। क्योंकि राजतंत्र के अंत के बाद से नेपाल बहुत तेजी से बदलते हुए एक संवैधानिक देश बन गया है। संविधान को अंगीकृत करने से पहले नेपाल की छवि एक हिंदू राष्ट्र के रूप में थी लेकिन अब वो हिंदू राष्ट्र नहीं रहा। यहीं से शुरू हुई दूसरी कहानी जहां मौत आम हो गई है और शांति, सपनों की बातें।

पिछले कुछ दिनों में भारत-नेपाल संबंध में जो भूकंप आया है वो नेपाल भूकंप की त्रासदी से कम नहीं है। आज नेपाल का फ़िजा भारत विरोधी हो गया है। नेपाल में भारतीय मीडिया पर बैन लगा दिया गया, चैनल्स पर बैन लगा दिया गया। नेपाल के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्म पर रोक लगा दिया गया है। कहीं-कहीं भारतीय गाड़ियों के साथ आगजनी भी की गई है। इन सब बातों से जो बात निकल कर आती है वो ये है कि भारत और नेपाल अब ना तो खुले तौर पर दुश्मन है ना ही दोस्त।
भारतीय सीमा से सटे नेपाल के क्षेत्र में नाकेबंदी कर दी गई है जिससे नेपाल की आर्थिक स्थिति बेहाल हो गई है। वहीं नेपाल के उप-प्रधानमंत्री का मानना है कि ये भारत का नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है जो नहीं होना चाहिए। भारत नेपाल से उसके तराई क्षेत्र को अलग करना चाहता है और अपनी सीमा में मिलाना चाहता है जिससे नेपाल की संप्रभुता खत्म हो जाएगी। वहीं इनके दूसरे नेताओं का कहना है कि भारत हमारी रसद, तेल आदि की आपूर्ति को बंद कर रहा है तो हम मोटर साइकिल की जगह साइकिल से चल लेंगे लेकिन भारत के तलवे नहीं चाटेंगे उसकी जी-हुजूरी नहीं करेंगे। ऐसे बयान है तो बहुत तीखे पर राजनीति से प्रेरित हैं जो एक तरह से मान्य है लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखा जाए तो ये मामला बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि भारत और नेपाल के बीच में बन रही इस खाई का फायदा भारत के बाकी पड़ोसी देश जो की दुश्मन के भूमिका में सराहे जाते हैं उनको मिलने लगेगा। क्योंकि अगर नेपाल से भारत की दूरी बनती है तो नेपाल का भी वही हाल हो सकता है जो आज तिब्बत का है क्योंकि अगर नेपाल में चीनी वर्चस्व बढ़ता है तो नेपाल का प्रयोग चीन, भारत के खिलाफ खुले तौर पर भी कर सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल की समस्या उसकी अपनी समस्या है लेकिन जब समस्या घर से निकल कर बाहर आ जाती है तो उसपर सबकी निगाह होती है। भारत के साथ बरसों के पारंपरिक संबंध होने के बावजूद भी आज नेपाल और भारत के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई है कि नेपाल में भारत की छवि नकारात्मक हो गई है जिससे वह चीन के बहुत करीब आ गया।


भारत के तरफ से इस तनाव पर नजर रखी जा रही है लेकिन अगर समय रहते ही इस समस्या का निदान नहीं किया जाता है तो रिश्ते बेहतर होने के बजाय और उलझेगी ही, जो कि ना तो भारत के लिए ठीक होगा और ना ही नेपाल के लिए।