Sunday, 6 December 2015

20 सितंबर के बाद....नेपाल

एक समान सभ्यता, संस्कृति और परंपरा होने भर से एक लकीर को पाटी नहीं जा सकती है, दो देशों के बीच खींची हुए लकीर, धर्म या साहित्य के एक होने से नहीं खत्म होती। ये इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि भारत और नेपाल दुनिया के पटल पर दो अलग देश हैं और बहुत कुछ समानताओं के बाद भी ये दोनों देश स्वयंभू राष्ट्र हैं और बहुत सारी असमानताएं भी हैं। समय-समय पर दोनों राष्ट्रों के बीच की लकीर भावनात्मक रूप से मिटती रही है लेकिन बदलते वक्त के बिसात पर तस्वीर भी बदलती रही है। और आज जो तस्वीरें हमारे सामने हैं ये उस नेपाल की है जहां राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। वहीं शांतिस्थली के रूप में देखाजाने वाला नेपाल अब खून-खराबे और जंग का मैदान हो गया है। क्योंकि राजतंत्र के अंत के बाद से नेपाल बहुत तेजी से बदलते हुए एक संवैधानिक देश बन गया है। संविधान को अंगीकृत करने से पहले नेपाल की छवि एक हिंदू राष्ट्र के रूप में थी लेकिन अब वो हिंदू राष्ट्र नहीं रहा। यहीं से शुरू हुई दूसरी कहानी जहां मौत आम हो गई है और शांति, सपनों की बातें।

पिछले कुछ दिनों में भारत-नेपाल संबंध में जो भूकंप आया है वो नेपाल भूकंप की त्रासदी से कम नहीं है। आज नेपाल का फ़िजा भारत विरोधी हो गया है। नेपाल में भारतीय मीडिया पर बैन लगा दिया गया, चैनल्स पर बैन लगा दिया गया। नेपाल के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्म पर रोक लगा दिया गया है। कहीं-कहीं भारतीय गाड़ियों के साथ आगजनी भी की गई है। इन सब बातों से जो बात निकल कर आती है वो ये है कि भारत और नेपाल अब ना तो खुले तौर पर दुश्मन है ना ही दोस्त।
भारतीय सीमा से सटे नेपाल के क्षेत्र में नाकेबंदी कर दी गई है जिससे नेपाल की आर्थिक स्थिति बेहाल हो गई है। वहीं नेपाल के उप-प्रधानमंत्री का मानना है कि ये भारत का नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है जो नहीं होना चाहिए। भारत नेपाल से उसके तराई क्षेत्र को अलग करना चाहता है और अपनी सीमा में मिलाना चाहता है जिससे नेपाल की संप्रभुता खत्म हो जाएगी। वहीं इनके दूसरे नेताओं का कहना है कि भारत हमारी रसद, तेल आदि की आपूर्ति को बंद कर रहा है तो हम मोटर साइकिल की जगह साइकिल से चल लेंगे लेकिन भारत के तलवे नहीं चाटेंगे उसकी जी-हुजूरी नहीं करेंगे। ऐसे बयान है तो बहुत तीखे पर राजनीति से प्रेरित हैं जो एक तरह से मान्य है लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखा जाए तो ये मामला बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि भारत और नेपाल के बीच में बन रही इस खाई का फायदा भारत के बाकी पड़ोसी देश जो की दुश्मन के भूमिका में सराहे जाते हैं उनको मिलने लगेगा। क्योंकि अगर नेपाल से भारत की दूरी बनती है तो नेपाल का भी वही हाल हो सकता है जो आज तिब्बत का है क्योंकि अगर नेपाल में चीनी वर्चस्व बढ़ता है तो नेपाल का प्रयोग चीन, भारत के खिलाफ खुले तौर पर भी कर सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल की समस्या उसकी अपनी समस्या है लेकिन जब समस्या घर से निकल कर बाहर आ जाती है तो उसपर सबकी निगाह होती है। भारत के साथ बरसों के पारंपरिक संबंध होने के बावजूद भी आज नेपाल और भारत के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई है कि नेपाल में भारत की छवि नकारात्मक हो गई है जिससे वह चीन के बहुत करीब आ गया।


भारत के तरफ से इस तनाव पर नजर रखी जा रही है लेकिन अगर समय रहते ही इस समस्या का निदान नहीं किया जाता है तो रिश्ते बेहतर होने के बजाय और उलझेगी ही, जो कि ना तो भारत के लिए ठीक होगा और ना ही नेपाल के लिए। 

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