Thursday, 11 December 2014

एक ख़्वाब दिखाएंगे...



सूरज की रौशनी से तिमिर चुरा कर लाएंगे
तेरे माथे के बीच में हम माहताब लगाएंगे
छत के दरीचे में रातों में चांद को बुलाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे

उम्र के इस पड़ाव पर एक बुढ़े पेड़ से मिलाएंगे
एक ठहरी यादों की कहानी नई कर सुनाएंगे
वो बचपन, वो यौवन, वो बुढ़़ापा
उस बुढ़े बरगद के नीचे से सब को बुलाबा भिजवाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे

एक खाली बर्तन होगा एक होगा रोता बच्चा
एक बेबस मां होगी और एक लंगड़े बाप से मिलाएंगे
इस शहर से दूर जब एक गांव तुमको ले जाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे

मिटती वजूदों पर एक नव अंकुर खिलाएंगे
टोपी-तिलक के बीच से वो पतली लकीर मिटाएंगे
तीन रंगों के बीच ही हम अपना मुल्क बनाएंगे
इसके शानो शौकत पर हम कुर्बां हो जाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे

Pranav Jha

Monday, 24 November 2014

लोहिया का समाज मुलायम का अप”वाद”....

सत्ता जब जागीर बन जाए और पार्टी प्राइवेट प्रोपर्टी तब शासक जनता से ऊपर हो जाता है और कल तक एक सेवक राजा कहलाता है। राम मनोहर लोहिया जिस सूत्र को प्रतिपादित कर समाज को बेहतरिन बनाने के लिए समाजवाद का सपना देखा था आज उस सपने को मुलायम सिंह ने अपवाद बना दिया।

शेफई के मंच पर समाजवाद को फिल्मी ठुमके पर नचाने के बाद भी जब मुलायम परिवार या युं कहें कि समाजवाद परिवार को ठंडक नहीं पुहंची तो 75वां वसंत देख चुके समाजवादी योद्धा मुलायम सिंह का जन्मोत्सब मनाया गया और पूरे सूबे को बताया गया कि देखो कैसे ‘सेवक’ से ‘स्वामी’ बना जाता है।

उत्तर प्रदेश की जनता की आंखे भूल चुकी होगी मुगलिया अंदाज को लेकिन उनकी प्यासी आंखों की तरस खत्म हो गई जब प्रदेश के नये स्वामी रथ पर सवार हो कर रामपूर के धरती को कृतार्थ किया। ये बग्धी लंदन से भाई आजम खां के द्वारा मंगाई गई थी अपने रहनुमा को नजराने के लिए।

75 फीट का केक बनवाया गया। 2 करोड़ में पंडाल बनाए गए और करीब 20 लाख रुपए मधुर तान छेड़ने वाले आकाओं को दिया गया। इस महान संस्कृति धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक मंत्रालाय ने 20 लाख रुपए हसिनाओं के ठुमके पर उड़ दिए। राजा जी के लफरते लव्जों को सुनने के लिए राज्य के मंत्री से लेकर संतरी तक तैनात था। 12 हजार कांस्टेबल, 27 डिप्टी एसपी और दो एसपी रैंक के ऑफिसर चक्रव्यूह बना कर बिना पलक झुकाए अपने नरेश की सुरक्षा में खड़ा था।

कमसिन हसिनाओं के चिकने काये पर हजारों नजरें फिसलते रहें ठुमके पर ठुमके लगे तो तालियों की गूंज चारों दिशा में फैली तो उन मांओं की जीख को दफ्न हो गई जो अपनी इज्जत लुटी और पेड़ से लटकी बेटी को को उतारी थी। पश्चमी उत्तर प्रदेश के चीथड़े जिस्म पर अभी दवा नहीं लगी लेकिन समाजवादियों कि सुरमयी रात में नाचते हुस्न की मलिकाओं के डांस पर सीटियां जरूर बजी जिसने उत्तर प्रदेश में हुऐ दंगों में मारे जाने वाले लोगों के परिवार की आवाज को जमींदोज कर दिया। उद्धयोगपति से लेकर खोमचेवालों और खून पसीना बहा कर मेहनत करने वाले लोगों का पैसा जब डांसर के पतली कमर पर बरसाया गया तो एक रोटी के लिए सड़क के किनारे खुले आसमान में कुत्तों के साथ सोए लोग की उम्मीद जल कर राख हो गई।

क्या तस्वीर है इस प्रदेश की.... जहां सड़क के एक तरफ उजड़े और जले हुए मकान रो रहे हैं वहीं दूसरी तरफ जन्मोत्सव में लड़ियां लगी हुई है क्योंकि ये उत्तर प्रदेश है और राम मनोहर लोहिया का समाज और मुलायम का ‘अप’वाद ये है अखिलेश का समाजवाद.....।

Pranav Jha

Thursday, 13 November 2014

बचपन बिक रहा है!


बागों के झूले वो रेतों के घर
खव्बों की दुनिया वो कागज के फूल
उतरती नहीं वो बचपन की यादों के धूल

वो रातों को जब छत पर आसमान की तरफ देखते हुए सोया करते थे तब पता नहीं आसमान के असंख्य तारों के बीच  कहां चले जाते थे और फिर कभी तारे को गिनते तो कभी तारे को तारों से मिला कर एक लकीर खींचते। चांद के अंदर झांकते और उसके दागों पर कई काहनी सुनते और जब अकले में चांद को निहारते तो उस काहनी को चांद में ढूंढते...।

ऐसा लगता है सपना था यह सब... अचानक नींद खुल गई है। मन नहीं करता इस नींद से जागने का...ये बचपन की यादों की नींद है जो बस अब यादों में सिमट कर रह गई है। हमने अपना बचपन जी लिया। अब बस उसे कभी बंद आंखों से तो कभी खुली आंखों से देख सकते हैं....। एक सपना बन गया बचपन।

वक्त की चढ़ान पर
उम्र की ढालान पर
खो गए हैं खो रहे है
बन गए वो याद सब

सौ बहाने होते थे जब स्कूल नहीं जाना होता था..। बीमार तो कभी भी हो सकते थे..। स्कूल की लास्ट घंटी की आवाज मन की मुराद सी होती थी। घर आते ही किताबों को किसी बोझ की तरह फेंक कर खेलने के लिए निकल जाते थे। पीछे से एक आवाज रोज आती थी अरेरेरे...पहले खाना तो खा लो फिर चले जाना लेकिन किसे परवाह था कि मां मेरे लिए ही बोल रही है खाने के लिए...। रात को लालटेन की रौशनी तो कभी बिजली की चमक में जब भी किताब आंखों के पास आती मानों नींद का सैलाब उमड़ पड़ता और कब हाथों में रखी किताब नीचे गिर जाती पता नहीं चलता फिर मां के जबरदस्ती उठा कर खाना खिलाना और बे-मन से पूरा खाना नींद में खाना। वक्त रेत की तरह ऐसे फिसला कि समझ नहीं पाए कब बड़े हो गए।
 
लेकिन अब जब बड़े हो गए तो पता चला कि बचपन क्या होता है। एक ऐसा दौर जो गीली मिट्टी के समान होता है उसे उस वक्त जिस सांचे में ढाल दो वो वैसा ही ढल जाएगा। लेकिन इस मुल्क में हर किसी का बचपन ऐसा नहीं होता। आज वक्त भी बदल चुका है और दौर भी...जहां भगवान से लेकर इंसान तक की कीमत तय हो वहां उम्र की कीमत ना हो ये हो नहीं सकता। जी हां, आज बचपन भी बाजार में बिक रहा है।

जो उम्र पीठ पर किताबों के बोझ को ढोने का होता है आज उसी मुल्क में लाखों पीठ कचड़े का बोड़ा और सामान ढो रहा है। जो आंख खव्बों के बुनने के लिए होती है वो आंख जागती रातों में सड़कों के किनारे रात को खत्म होने का इंतजार करती है ताकी सुबह हो तो कुछ खाना मिल जाए। जो नाजुक हाथ पेंसिल पकड़ने के लिए होता है उसकी नाजुकता बर्तन के ढेर को साफ करने में खत्म हो रहा है। क्योंकि आज बचपन बिक रहा है।

राजधानी दिल्ली या भारत के ऐसे सभी शहर जहां लोगों की भीड़ ज्यादा है वहां हर गली मुहलों में बच्चे यूं ही घूमते नजर आते हैं कोई भीख मांगता तो कोई कबाड़ी में अपनी जिंदगी तलाशता...रेल के प्लेटफार्म से लेकर बोगी तक में बच्चे कभी कुछ करतव करते नजर आते हैं तो कभी गुटका बीड़ी बेचते। चमकते शहरों के हर  दुकानों और मकानों में एक ना एक छोटू मिल ही जाता है। कभी घर में झाडू लगता तो कभी होटल का टेबल और बर्तन साफ करता।

शहरों में कई ऐसे गिरोह हैं जो गांव-घर से बच्चों को फंसा कर लाते हैं और उसे बेच देते हैं, उससे भीख मंगवाते हैं उसका शारीरक शोषण करते हैं और कईयों को विदेश भी सप्लाई कर देते हैं। जो उम्र खेलने कुदने का होता है उस उम्र में उससे वयस्कों वाला काम करतवाते है। नशे की लत लगावा कर उसके दिमाग की शक्ति को खत्म कर देते हैं। क्योंकि वो उसे बच्चा नहीं खरीदा हुआ गुलाम मानते हैं। क्योंकि आज बचपन बिक रहा है।

सच्चाई कड़वी होती है चाहे वो जिस रूप में हो। यहां हर उजली तस्वीर के पीछे एक काली तस्वीर है। जहां कुछ भी नहीं है ना आशा ना ही उम्मीद जिदगी जिसका कोई मतलब नहीं...एक सूखा हुआ समंदर जिसका रेत भी ऐसा नमकीन हो कि घाव पर लगने के बाद दुगनी तड़प देता है। अगर आज चाचा नेहरु होते तो क्या भारत के इस भाग्य को देख पाते या फिर वो भी बंगलों के आंगन में खेलते बच्चों को ही देखते जो इसलिए सुकून से अपने मां-बाप के साथ खेल रहा होता है क्योंकि उसी की तरह एक बच्चा उसके घर का सारा काम निपटा रहा होता है।

वो रो रहा था कि उसका खिलौना कबाड़ हो गया
(दूसरा) वो हंस रहा है कि कबाड़ी में आज खिलौना मिल गया....।

Pranav Jha



Wednesday, 15 October 2014

ये कौन सा मजहब है?




इस्लाम धर्म में लड़के-लड़िकों को एक साथ बैठ कर पढ़ना और उठना बैठना मना है ये मजहब के खिलाफ है इस्लाम के खिलाफ है। जब तक पर्दों का माकूल व्यवस्था नहीं हो जाता है तब तक लड़कियों को मदरसे में नहीं पढ़ाया जा सकता है....।
मोहम्मद मुमताज, प्रिंसपल अजीजिया मदरसा, बिहारशरिफ, नलंदा

क्या फर्क पड़ा कि तख्त बदल दी गई, क्या फर्क पड़ा की ताज बदल दिया गया, क्या फर्क पड़ा की दौर बदल गया, क्या फर्क पड़ा कि परंपरा रिवाज और बंदिशे बदल ने की कहानी गढ़ी गई। कुछ भी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि...जिस नालंदा की धरती को दुनिया भर में लोहा माना जाता रहा है उस के गौरवमंडित सर को वहां के एक मदरसे के प्रिंसपल ने एक पल में कुचल कर रख दिया और समाज को फिर एक एक बार उस दौर में ला कर पटक दिया जहां से शुरूआत की गई थी। क्योंकि प्रिंसपल साहब को 70 फीसदी से ज्यादा लड़कियों को नमांकन होने वाले मदरसे में लड़कियों के लिए माकूल व्यवस्था कम लगने लगा जो और साहब का मजहब उसकी इज्जात देने से मना कर दिया।

जिस मुल्क में महिलाओं को शिक्षित करने के वो सारे बंदिशे तोड़ने के लिए कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं वहीं सदियों से चले आ रहे उसी मुल्क के एक हिस्से में आज भी रूढ़ीवादी परंपरा की जड़ता कम नहीं हो रही है। क्योंकि जब हसरत वास्तविकता के बंधन को तोड़ कर एक दौर में आ कर सिमट जाता है तो फिर मौलिकता किसी कोने में जा कर वक्त के कंधे पर सर टिका कर रोने लगता है।

कैमरों की इस अंधे दौर में जहां हर इंसान की चाहत होती है कि एक चमक के साथ वो भी सुर्खियों में बने रहे लेकिन इस चाहत को पूरा करने के लिए जब इंसान अपने ऊसूलों को ताक पर रख देता है तब उसकी मौलिकाता कि लकीर पतली होनी शुरू हो जाती है और वो उस तार को छेड़ता है जो उस दौर में सबसे ज्यादा संवेदनशील हो...। प्रिंसपल मुमताज ने भी मदरसे की अहाते से कुछ ऐसा ही किया है।

मुहम्मद मुमताज ने जिस मजहब का हवाला देकर मासूम बच्चियों के भविष्य पर इतना बड़ा फैसला सुना दिया है क्या वो दिखाएंगे के उस मजहब के पाक कुरान के किस आयत में उस व्यवस्था का उल्लेख है। या फिर ये सब इन मासूम लड़कियों की भविष्य की बिसात पर सूर्खियां बटोरने का एक शर्मनाक किस्सा है...पर जो भी है एक सुबे के लिए कलंक है वो भी उस सुबे के लिए जिस सुबे में सुशासन का डंका बज चुका है...।


कभी तो लगता है कि क्या यह किस्सा उसी मुल्क का है जो मुल्क मंगल ग्रह पर जा कर एक नया इतिहास रच दिया है क्या यह प्रकरण उसी मुल्क का है जहां के नागरिक को रूढ़ीवादी परंपरा को खत्म करने में सहायता करने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा शांति सम्मान दिया जाता है और क्या यह वही मजहब है जहां एक बच्ची को इसी दकयानुसी लकीर को मिटने की कोशिश के लिए दुनिया सम्मानित करती है। हमें तो शर्म आती है इसे सोचते हुए भी.... पर ऐसा हुआ है नालंदा की पवित्र भूमि पर। लेकिन सरकार चुप है उसके कानों तक आवाज नहीं पहुंच रही है उन बच्चियों की जिसका भविष्य मजहब के ऐसे ठेकेदारों के हाथों में है जो अपने फायदे के लिए उसकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे हैं..। लेकिन हो भी क्या सकता है क्योंकि सियासत से आगे की दुनिया बहुत काली है जहां कुछ भी नहीं दिखता है....अगर दिखता भी है तो सिर्फ और सिर्फ सियासत। सिंहासन की इस दौर में लोकतंत्र का दम धुट रहा है वो तिल-तिल मर है। 

pranav jha

Sunday, 12 October 2014

कश्मीर से आगे....



खून का लाल रंग शरीर से निकलने के बाद एक जैसा ही होता है जाहे वो इंसान के शरीर से निकला हो या फिर जानवर के शरीर से। आज-कल सरहद पर ये दोनों खून एक साथ ही हिंदुस्तान की मिट्टी को लाल कर रहे हैं। क्योंकि सीमा पार से गोलियां बरसाई जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्र में बने घरों की दीवारें अपने सीने पर गोली खा छलनी होते हुए एक बेजुवान कहानी हमारे पूरे मुल्क को सुना रही है।

डर क्या होता है... ये हम कभी महसूस नहीं कर रहे हैं, क्योंकि हम सुरक्षित है, हमें कोई फिकर नहीं कि हमारे घर के अंदर कभी मोर्टार का गोला भी आ सकता है हमें ये सुध नहीं रहता कि रात को सोते हुए कि खिड़की की बाहर से कभी बंदूक की गोली भी अंदर आ सकती है। हम तो आराम से चैन की नींद सोते हैं। तो हमें डर का भी एहसास नहीं होता है। पर कभी अगर ऐसा होता है तो क्या होगा? इस अहसास के आगही मात्र से हमारी रूह तक कांप जाती है। लेकिन ऐसा होता है कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में... जहां पड़ोसी मुल्क की सेनाओं की बंदुक की गोली उनकी खिड़कियों के अदंर आती है मोर्टार का गोला घर के दरवाजे के बाहर मिलता है कभी घर के अंदर मातम होता है तो कभी घर के बाहर।

ये कोई पहली बार नहीं है जब उधर से गोलियां चलाई गई है ऐसा हमेशा होता रहता है समय दर समय...लेकिन इस बीच नहीं होता है कुछ भी तो वो है शांति। हां ये बात और है कि शांति समझौता के लिए हर बार सियासी करवट जरूर ली जाती है। दोनों मुल्क के निजाम आपस में देश और विदेश दोनों जगह मिलते हैं बात करते हैं पर सीमा पर तो गोलियों से ही बात होती है।

धरती पर जन्नत का एहसास कराने वाला कश्मीर दोनों देश के बीच एक नासूर बन कर रह गया है और दोनों मुल्क के दर्द को कभी कम होने नहीं देना का काम करता है। इस्लामाबाद और दिल्ली की गद्दी पर जब-जब नए निजाम आते है कश्मीर की आग दुगुनी रफ्तार से धधकने लगती है।
आखिर कश्मीर के मुद्दे को कैसे सुलझाया जा सकता है? क्या खोखले शांति समझाते के जरिए कश्मीर की आग को बुझाई जा सकती है? या फिर युद्ध से ही इस मसले का हल निकाला जा सकता है। इन तमाम रस्साकशी में कभी उस दर्द को उस डर को दोनों मुल्कों ने महसूस किया। नहीं....जिस डर के साए में कश्मीर के लोग अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।

दोनों मुल्कों के टीवी पर चलती खबरों में कभी कश्मीर के दर्द को नहीं दिखाय जाता है कभी वहां के डर को नहीं दिखाई जाती है कभी वहां के जिंदगी नहीं दिखाई जाती है तो कभी वहां मौत के मातम को नहीं दिखाया जाता है। दिखाता है तो सिर्फ और सिर्फ नफरत की लकीर...। जिसे मिटने के लिए नहीं बढ़ाने के लिए दोनों मुल्कों की सेनाओं की बंदूक दनदनाती है और तोपें गरजते हैं। जैसे बाकी हिंदुस्तान और पाकिस्तान को रात को चैन से सोने का अधिकार है वैसे ही कश्मीर के लोगों को भी चैन से सांस लेने का अधिकार है पर ऐसा नहीं हो पाता है वहां हर एक सांस संगीन के साए में ली जाती है और कब कौन सी सांसें आखिरी हो जाए कहा नहीं जा सकता है। क्या कोई ऐसी जिंदगी का कामना भर कर सकता है..नहीं, लेकिन ऐसा होता है धरती के इस जन्नत में।

पड़ोसी मुल्क का सियासत जहां कश्मीर से ताय होता है तो हमारे मुल्क में वोट बैंक का बड़ा हिस्सा कश्मीर को माना जाता है। पाकिस्तान अपने जन्म से आज तक अपना भविष्य कभी भी कश्मीर से आगे नहीं देखता है वहीं भारत के ध्यान को भी अपने नापाक हरकतों से भटकाता रहता है।

तो क्या अमन के लिए तरसती कश्मीर की धरती की किस्मत कभी नहीं बदलेगी। आज तक के हालत को देखते हुए कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। पर अगर ये कयास लगाया जाता है कि इस मुद्दे का हल युद्ध से ही हो सकता है तो हम ये कहेंगे कि युद्ध से कभी शांति नहीं मिलसकती मिलेगी युद्ध बस एक गहरी खामोशी देगा और युद्ध से उठे धूल के काले बादल के साए में इंसान मिट्टी में मिल जाएगा। तो जब तक युद्ध टल रहा है टलने दो युद्ध के बाद कोई भी विकल्प सही हो सकता जो दोनों मुल्क और मानवता के लिए उचित होगा। 

Sunday, 14 September 2014

जन्नत बनाम दोजख



दीदार-ए-जन्नत की चाह में ऐ खुदातुने जन्नत ही मुकम्मल कर दिया.........

जिस जन्नत की चाह के लिए हम खुदा से हर वक्त दुआ करते हैं वो खुदा आज इतना बेरहम हो गया कि जन्नत को दोजख में तबदील कर दिया...।

खूबसूरती खतरनाक होती है सुनते आ रहे थे पर इस कदर खतरनाक होगी सोचा नहीं था। हंसी वादियों की दिदार के चाहत में निकले हिंदुस्तान के हजारों परिवारों के घर आसूं का सैलाब निकल रहा है, गुनाह इतना है कि उन्होंने जमीं पर जन्नत कश्मीर  को देखना की जहमत की।

उस दिन सहर तो वहां भी हुई थी लेकिन उस जमीं पर जन्नत का एहसास कराने वाले इस शहर की तस्वीर दुनिया ने कुछ और देखी...हर तरफ चीख थी, पुकार था, दर्द ऐसा ता की उसके बारे में सोचने मात्र से रूह खड़ा हो जाए।

जिस डल झील को पर कल तक सिकारों में लोग स्वर्ग की अनुभूति लेते थे वो झील लोगों से इस कदर रूठा कि अपने सैलाब में लोगों को ही डुबोने लगा। तबी नदी इतना बैखला गई की शहर के हर घर में घुस गई। देखेत ही देखते पूरा कश्मीर घाटी एक पानी के समंदर में तब्दील हो गया और हर तरफ बस एक ही आवाज सुनाई दे रही थी किसी भी तरह जान बचा लो।

सैलाब में बहती लाशों और टूटती आशों के बीच आसमान के काले बदलों को रौंदता हुआ जब सेना के हेलिकॉपटरों की आवाज जब यहां घरों में फंसे बेजान हो रहे इंसानों के कानों में पड़ी तो जैसे लगा कि खुदा सीधे आसमां से उतर कर जमीं पर आ गया हो और देखते ही देखते सेना के वीर जवानों में लाखों लोगों को सही ठिकाने पर पहुंचा दिया।

केंद्र सरकार ने फुर्ती दिखाई और सहायता तेज करने की मुहिम में लगी तो राज्य सरकार भी उसके साथ कदमताल करती दिखी। फंसे हुए लोगों को घर तक खानापूर्ति से लेकर अन्य सहायक चीजों की आपूर्ति  होने लगी।

पर जो इस वादी के दीदार का ख्याल लिए अपने घर से निकले थे उसमें से बहुत सारे लोग घर नहीं लौट पाए। उनके परिवार के आंखू के उस आंसू की कीमत ना तो सरकार के पास है और ना ही भगवान के पास...।

आखिर इस हादसे का गुनहगार कौन है? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर हर शक्स के जेहन पर है पर जुवान इस बाहर निकालने के कतराता है। लेकिन सच को कब तक हाशिए पर रखेंगे वो आप के सामने ऐसे ही कभी उत्तराखंड के रूप में सामने आएगा तो कभी कश्मीर घाटी की तरह।
प्रकृति ने हम सब को अपने गोद में जगह दिया है वो हमें पाल रहा है लेकिन हम हैं कि जिस डाल पर बैठे हैं उसी डाल को काट रहे हैं। विकास के नाम पर अंधे हो चुके हम आज के दौर में उस 
प्रकृति के साथ लागातार खिलवाड़ कर रहे हैं और जिसका नतीजा भी हम भुगत रहे हैं। फिर भी हमारी नींद ऐसी है कि खुलती नहीं। जिस जन्नत को हम कुरानों में गीता में वेद में बाइबल में पढ़ते आ रहे हैं वो जन्नत कहां है?  हमें नहीं मालूम, लेकिन जिस जन्नत को आंखों से दीदार करते हैं, उसी को अपने हाथों मिटा भी रहे हैं। 

प्रकृति ने इस कायनात को बहुत शिद्दत से खुबसूरत बनाया है और इसी कायनात में वो सारी चीजें हैं, जो हमें इन पाक किताबों में लिखा गया इसे देखने के बाद कुछ भी नहीं, जो अनदेखा हो लेकिन ख्वाब की धरा पर हम हकिकत से इस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं कि हर सहर में एक विरान शहर हो रहा मिट रहा है खुदा की नेमत, बर्बाद हो रहा है ईश्वर का वरदान..।


जागो कि अब देर हो रही है। 

Pranav Jha

Thursday, 7 August 2014

घर-घर घूम रहा है रावण





घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बाचाएगा
राम नहीं है इस जंगल में
लक्ष्मण भी ना आ पाएगा
वही द्रौपदी वहीं दुशासन
पर वो कृष्ण नहीं आएगा
चीर पड़ा है बदन से नीचे
उसको कौन उठागा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...

चीख टकरा कर मर जाती है
बहरे इन दीवारों में...
मुर्दा जिस्म लटक जाता है
जब भारत के इन गांवों में
उठो सीता की अब खुद लड़ो
ना तुम्हें कोई बचाएगा
पुरूषोत्म के देश में अब ना
कोई पुरुष यहां आएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...।

बिन जुए के दाव पर लगती
हर दिन अब यहां द्रौपदी है
सिंहासन पर बैठा है अंधा
उसे ना चिंता तुम्हारी है...
उठो दौपदी अब खुद लड़ो
अब ना माधव यहां पर आएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा...।

उठो की तुम को उठना होगा
अपना चीर संभालना होगा
दु:शासन को ललकारना होगा
अंधों को भगाना होगा
उठा सीता की लंका दहन करो
क्योंकि यहां ना हनुमान आएगा
जो तुम्हें बचा ले जाएगा
घर-घर घूम रहा है रावण
सीता को कौन बचाएगा....।

Monday, 4 August 2014

बिना पानी भी यहां आती है बाढ़!




सावन का महीना जब भी आता है तो पूरे देश में भक्तिमय माहौल बन जाता है। बोल बम के नारे के साथ देश में भोले के भक्त कांवर ले कर घूमने लगते हैं लेकिन इसी बीच सावन का डर भी पैदा होने लगता है सबसे पहले डरता है बिहार। बिहार में हर साल बाढ़ आती है लाखों घर उजड़ जाते हैं। कोशी, कमला, बगमती अपने सबाब पर आती है तो मातम ही मातम हर जगह दिखती है। बिहार बाढ़ से हर साल बर्बाद होता रहा है बाढ़ बिहार को हर साल अपने सैलाबों के साथ कई साल पीछे लेकर कर चली जाती है।

कोशी नदी को बिहार का शोक कहा जाता है। कोशी हर बार अपने इलाके में तांडव करती है। लेकिन इस बार सब कुछ उलटा है। कोशी नदी में हर साल की तरह पानी नहीं है। और ना ही वो उफान की किसी को नुकसान पहुंच सके। फिर भी मीडिया के हर शाख पर एक नयमित त्योहार की तरह बाढ़ को मनाना शुरू हो गया है, हर चैनल, हर अखबार में यही दिखाया जा रहा है कि किस तरह से कोशी, कमला अपना रौद्र रूप दिखा रही है। जबकि आप देखेंगे कि नदियों का जलस्तर क्या है तो आप अपने टीवी सेट पर चल रहे चैनल को देख कर ही पता लगा सकते हैं हकिकत क्या है। इन नदियों में इतना पानी भी नहीं है कि जिससे वो अपने पूरे जमीन को भिंगा सके जो जमीन वो अपने विशाल धार के लिए पहले से बना ली है।

जब इस तस्वीर को थोड़ा उलटा पुलटा कर देखते हैं तो कुछ और ही तस्वीर हमें नजर आती है। बाढ़ से जितना नुकसान सूबे को होता है उतना ही फायदा जनप्रतिनिधि को होता है। इस बार फिर से जबकि बाढ़ का कोई नामोनिशान नहीं है बिहार में सरकारी स्तर पर पूरा माहौल बना दाया गया है कि कोशी में भयंकर बाढ़ आ गई है। और राहत कार्य के लिए राज्य सरकार पूरे जोर-शोर से लगी हुई है इससे पूरा करने के लिए केंद्र से भी मदद की गुहार लगाई जा चुकी है। ठीक है ये तो हो गई वो बातें जो मीडिया में अखबार में छपी या चली है। अब जब हम थोड़ा और अंदर झांक कर देखते हैं तो पता चलता है कि अंदर तो और अंधेरा है।

कोशी के किनारे बसे जितने भी गांव हैं वहां बाढ़ के नाम पर जबरदस्त कंपेनिंग की जा रही है। लोगों को राहत शिविर में ले जाया जा रहा है। राहत शिविर के नाम पर एक मुश्त राशि राज्य सरकार से अनुमोदित किया गया है। और जो लोग उस इलाके में बसे हैं उसे वहां से निकाल कर राहत शिविर में रखा जा रहा है जो नहीं आना चाहते उसे डरा-धमका कर वहां लाया जा रहा है। इस संदर्भ में जब वहां के एक स्थानिय निवासी से बात हुई तो उसने कहां कि ये लोग आते हैं और कहते हैं अपना घर खाली कर के यहां से निकल जाओ। जब हम जाने के लिए नहीं तैयार होते हैं तो हमें धमकी दी जाती है। हमें डरा धमका कर अपने घर से निकाल दिया जाता है और जब हम लोग उस राहत शिविर में चले जाते हैं तो हमारे घर में लूट पाट की जाती है।

आज जब मीडिया बाढ़ पर अपना पूरा फोकस कर रहा है तो लाजमी है कि लोग सच्चाई से दूर हो जाएंगे। लेकिन जिस बाढ़ के आने से खतरा पहले हुआ करता था वो खतरा आज भी बाढ़ के नहीं आने से भी है क्योंकि वहां के लोगों को दोनों ही सूरत में अपना सब कुछ गवाना ही है। चाहे उसे बाढ़ ले जाए या फिर बाढ़ के नाम पर लूटेरे ले जाए।  

जो मीडिया सच्चाई दिखाने के लिए अपने आप को समाज का दर्पण कह रहा है उसे यहां क्यों नहीं सच्चाई दिख रही है क्यों हवा में उड़ती बातों को जमीनी हकीकत मान रहा है मीडिया।