सूरज की रौशनी से तिमिर चुरा कर लाएंगे
तेरे माथे के बीच में हम माहताब लगाएंगे
छत के दरीचे में रातों में चांद को बुलाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे
उम्र के इस पड़ाव पर एक बुढ़े पेड़ से मिलाएंगे
एक ठहरी यादों की कहानी नई कर सुनाएंगे
वो बचपन, वो यौवन, वो बुढ़़ापा
उस बुढ़े बरगद के नीचे से सब को बुलाबा भिजवाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे
एक खाली बर्तन होगा एक होगा रोता बच्चा
एक बेबस मां होगी और एक लंगड़े बाप से मिलाएंगे
इस शहर से दूर जब एक गांव तुमको ले जाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे
मिटती वजूदों पर एक नव अंकुर खिलाएंगे
टोपी-तिलक के बीच से वो पतली लकीर मिटाएंगे
तीन रंगों के बीच ही हम अपना मुल्क बनाएंगे
इसके शानो शौकत पर हम कुर्बां हो जाएंगे
एक रोज़ हम तुमको ऐसा ख़्वाब दिखाएंगे
Pranav Jha
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