Sunday, 12 July 2015

मैं झंझारपुर हूं....


यह कहानी है कई सदियों के दर्द की, छटपाटाहट की, छलावा की और एक अंतहीन आश की....ये कहानी है झंझारपुर की.....।
कोशी और कमला के गोद में उपेक्षा, अपेक्षा में वक्त के साथ विकास के नाम पर छलाता रहा हूं..। शहर की तो बात ही नहीं पर गांव भी नहीं हूं… मैं झंझारपुर हूं
चारो तरफ गांवों के बोझ से लदा जब मैं शाम को अपने आप को देखता हूं तो लगता हैं मुझमें और मेरे चारों तरफ के फैले गांवों में कोई अंतर नहीं है। मेरे पास सब कुछ है बिजली, पानी, स्वस्थ्य सेवा, अस्पताल और तमाम बुनायादी चीजें जो एक शहर में होती है वो तमाम सुविधाएं मेरे पास है इसलिए आस-पास के गांव मुझे शहर की सुंदर उपमा से भी अलंकित करते हैं तब मैं गर्व से अपना सर ऊपर कर लेता हूं लेकिन फिर जब खुद को देखता हूं तो उदासी के समंदर में डूब जाता हूं।


कैसे मैं अपनी कहानी सुनाऊ, मेरे बदन के ज़ख़्म मेरी बदनसीबी की कहानी सुनाती हैं कि जब मैं कमला पुल से गुजर कर अपने आंगन की तरफ बढ़ता हूं तो पुल पर चलते हुए मेरे पैरों में अनगिनत कील चुभते हैं और मैं दर्द चीखता हुआ पगडंडी बने मुख्य सड़क से अपने अस्पताल जाता हूं जहां कहने को तो सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन मेरे मर्ज़ का इलाज नहीं होता। लंगड़ाता और कराहता जब मैं अस्पताल के प्रचीर से देखता हूं तो बिहार के पुरोधा ललित और कर्पूरी बाबू के नाम पर एक छोटा सा स्टेडियम दिखता है। सोचता हूं वहां जा कर अपने जख्मों को थोड़ा कम कर लूं...पर सियासत की रोटी अपने कलेजे पर सेक चुका ये स्टेडियम मुझसे ज्यादा जोर से रोता दिखता है। जब मैं उसके पास गया तो वो अपने दर्द की दास्तां सुनाने लगा कि लोग अब यहां खेलने नहीं आते, यहां पर मल-मूत्र का त्याग करने और नशापान करने के लिए आते हैं। देखो, इन दीवारों को, अंदर बने कमरों को ये शौचालय है जहां ना तो अब दरवाजा है और ना ही शौच के लिए पानी, लोग इसके आस पास ही गंदा करते हैं। रात के अंधेरे में नशेड़ियों की चौकड़ी जमती है...।


अपनी दास्तां सुनाते सुनाते स्टेडियम ललित और कर्पुरी बाबू को याद करता हुआ घुट-घुट कर रोने लगता है। फिर, मैं उसकी इस हालत का एक और जख्म अपने सीने पर लेकर पगडंडी में तबदील सड़कों से आगे जाता हूं। जब मैं पुरानी बाजार के दहलीज पर कदम रखता हूं तो वहां वर्षों से खड़ी फ्लड लाइट अपनी हिचकियों से मुझे रोक लेती है और अपनी फूटी किस्मत को कोसने लगती है और कहती है मैं अपने मुर्दा शरीर में प्राण डालने के लिए कब से बाबुओं का चारों दिशा से बाट जोह रही हूं पर आज भी मैं प्राणहीन हूं। इस ठठरी के गोलांबर पर खड़ा देख मेरे सीने में एक और कील छुभता है। इस नासूर को लिए जब मैं आगे बढ़ता हूं तो मुझे मनोरंजन के नाम पर अवैध तरीके से चल रहे बांस और चचरी के बने पूर्ण रूप से गैर कानूनी सिनेमाघर को देखता हूं, जिसकी आवाज़ सड़क पर आते जाते लोगों के कानों में साफ-साफ सुनाई दे रही होती है मैं इस दाग को समेटते हुए आगे बढ़ता हूं।

कुछ कदम चलते ही खुब सारी लाइटों से सजा बाज़ार दिखता है। बाज़ार की कुछ दुकाने मेरे सीने पर उभरे ज़ख़्मों को राहत देती है। लेकिन कुछ दूरी पर ही ऐसी दुकाने दिखती है जो अंतिम सांस की आश में कब से पलके बिछाए हुए है। ना कोई तरीका ना कोई सलीका और 3 फीट चौड़ी सड़क के दोनों किनारे एक दुकान दूसरे को मूंह चिढ़ाती दिखती है। जब मेरी सांसें उन गलियों में घुटने लगी तो हवा कि तलाश में मैंने ऊपर की तरफ देखा, लेकिन मेरी आंखों को नीले आकाश नहीं दिख पाएं क्योंकि बिजली के तारों की उलझनों में निगाह ऐसी उलझी की आंखों में नया दर्द सा होने लगा और मैं अपनी आंखों को मीच कर फिर से आगे देखने लगा। आगे हजारों लोगों का नरमुंड आगे पीछे होने के आपाधापी में गुम होता दिख रहा था। उस संकरी सड़क से जब मैं आगे बढ़ता थाने के पास पहुंचा। वहां एक मुर्दा शांति मुझे अपनी ओर खीचने लगा। मैं हल्के कदमों से उस तरफ बढ़ा तो वहां कुछ सौदा हो रहा था सौदा करने वाला रो-रो कर अपनी गुनाहों को छुपाने के लिए पैसों के साथ अनगिनत संवेदना का वास्ता देते प्रार्थना की मुद्रा में था और कुर्सी पर बैठा वर्दी में वो शख्स अपनी ताकत के गुमान में धौंस के साथ उस पर हावी हो रहा था। कुछ देर के बाद सब कुछ ठीक हो गया संवेदना तो कुछ नहीं कर पाई पर पैसों ने अपनी ताक़त दिखाई और मामले को रफा-दफा कर दिया


मैं मौन था... दर्द और खामोशी के साथ आगे बढ़ता चला गया और पहुंचा अनुमंडल के ब्लॉक पर। वहां कुछ लोग एक साथ बैठ कर नारा लगा रहे थे देश भक्ति के गानों से फिजा बलिदानी सा हो रहा था। शरीर के अंदर का जमा ख़ून फिर से धमनियों में बहने के लिए बेताब होने लगा। कांटों की चुभन और अनगिनत असहाय दुख सपने बुनने लगे और अपने वज़ूद को तलाशने में मैं भी उन लोगों के साथ बैठ गया और नारा लगाने लगा। भूख हड़ताल में सरीक हो गया, ये भूख हड़ताल और नारे मुझे मेरा अधिकार दिलाने के लिए हो रहा था। मुझे ज़िला का दर्जा देने के लिए हो रहा था। ज़िला के लिए जब-जब ऐसी चर्चाएं होती थी मैं हर जगह छुप-छुप कर सबकी बातें सुनता रहता था और बातें सुन कर मेरे चेहरे पर एक कांति सी आ जाती थी। लेकिन होता तो वहीं है जो वक्त को मंज़ूर हो। और आज तक वक्त ने वो करवट नहीं ली कि मेरे दर्द के आंसू खुशी में बदल जाएं।

जब भी कोई बड़ा नेता मेरे पास आता तो ऐसा लगता था इस बार ये मुझे मेरी पहचान दिलाएगा। मेरी किस्मत बदल जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया मेरी ये आशा निराशा में बदलती रही। सालों दशकों से मेरे सीने पर सियासी बिसात बिछा कर सूबे की हर सियासी पार्टी ने अपनी गोटी लाल किया पर किसी ने भी मेरे लहूलुहान सीने पर मरहम नहीं लगाया। चुनावी मौसम खत्म होने के बाद सब ने मेरा उपेझा ही किया।

खैर, ये तो मेरे सम्मान की बात है जो आज तक नहीं मिला मुझे पर जो चीजें मुझे पहले ही मिल जानी चाहिए थी, वो भी अभी तक नहीं मिली। मैं जब कमला नदी से समकक्ष रेलवे का वो पुल देखता हूं तो मेरा कलेजा दर्द से फट जाता है। मैं नदी पर निर्माणाधीन उस पुल को कब से देख रहा हूं पर आज तक वो निर्माणाधीन ही है। सरकार आई चली गई पुल और विकास के नाम पर मुझे लूटा भी गया। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।
आज भारत चांद पर चला गया। लेकिन कमला नदी में एक पिलर नहीं बना पया जो अभी तक अधूरा है। इस पिलर के नाम पर अंधविश्वास का नंगा नाच नचाया गया कि यहां कुछ दैवीशक्ति है जो पिलर नहीं बनने दे रही है। और लाश में तब्दील होता वो निर्माणाधीन पुल वहां खड़ा होकर मेरे आंसू के साथ अपना आंसू भी कमला नदी में बहा रहा है।
दर्द इतना है कि सहा नहीं जा रहा है। लेकिन मैं जिंदा हूं और रहूंगा अपने वज़ूद के लिए चाहे इस के लिए मुझे जितना भी सफर करना पड़े।

खैर, शाम हो रही है और मैं फिर जा रहा हूं अपने आंगन जहां रात अपनी चादर फैलाती है तो सब कुछ एक सा दिखता है काला। और मैं चुपचाप दौड़ता हुआ शांतिनाथ चौराहे पर बना ललित बाबू की प्रतिमा के पास पहुंच जाता हूं और बैठ कर ललित बाबू से यही पूछता हूं कि क्या आपने यही सपना देखा था, क्या आप अपने अगुओं को यही संदेश दे कर गए थे, ललित बाबू क्या आपके बाद मेरे आंगन में कोई नहीं जो मुझे मेरा वज़ूद दिला सके? क्या सभी लोग मेरे सम्मान के साथ सिर्फ राजनीति का गंदा खेल ही खेलेेंगे? क्या मेरे ज्जबातों के लाव पर सब अपने सियासी चूल्हा गरम करेंगे? क्या कोई नहीं पैदा होगा जो मेरे हक़ की बात करेगा? क्या मैं कभी जिला नहीं बनुंगा? क्या मेरे आहाते से बड़ी लाइन की गाड़ियां नहीं चलेंगी? क्या मैं हमेशा गाड़ी गुजरने के इंतजार में ऐसे ही गुमतियों पर रुका रहूंगा?

तलवार की धार से भी ज़्यादा तेज मेरे सवाल को सुनकर ललित बाबू भी कर्पूरी ठाकुर को आवाज देकर फफक-फफक कर रोने लगते हैं और हम तीनों के आंसू बह-बह कर कमला की धार में मिलती रहती है और कमला नदी कभी सूखती है तो कभी क्रोध में उबलने लगती है।
मैं बहुत बदनसीब हूं.......... मैं झंझारपुर हूं







Friday, 3 July 2015

भूख और भविष्य

तू बला की भूख देख
मेरी पैराहन न देख

धूप पड़ी इस जिस्म पर
कालिख में लिपटी है रोआं

आंख की तू तेज देख
धूप की पपड़ी ना देख


बदहवास ये रूप मेरा
बदनुमा हर अंग है

मेरे माथे की चमक से
सूरज भी अब दंग है

बस तू मेरी चाल देख
बदहवासी ना देख