Monday, 21 April 2014

तुम फिर मिलोगी

















तुम मुझे फिर मिलोगे
हां, मिलोगे जरूर मिलोगे
जब आंखों का सैलाब सूख जाएगा
जब सांसों की डोर टूट जाएगी
और यादों के आंगन में जिस्म पिघल जाएगा
तब तुम मुझे मिलोगी
हां मिलोगी जरूर मिलोगो...

मेरे जिस्म के हर रूह पे
तेरे यादों का लिवास चस्पा है
मैं सोता हूं तो तेरा अक्स
मुझ में जगता है
मेरे वजूद के हर नक्स पे
तेरा साया सा दिखता है
अब तो देख ले मेरी वफा मुझे
तेरे बिन तेरा ये जिस्म कितना अधूरा दिखता है

तेरे पैरों के निशां के पीछे
मेरा तकदीर चलता है
मंजिल की सोच के
मेरा ये दिल मचलता है
तू रोक सके तो रोक ले
मेरे तस्बूर की नूराई
जो आंख खुले तो तेरा ही नूर दिखता है

जब पीर पर्वत सी लगेगी
तेरी कजरी आंखों से रात नहीं दिन होगा
जब ये कायनात खत्म होगा
और तेरी यादों की डोर से
मेरी नींद उड़ जाएगी
आंख खुलेगी और सांसें बंद होगी
तब तुम मुझे मिलोगी
हां तभी तुम मिलोगी
तुम जरूर मिलोगी जरूर मिलोगी