Monday, 24 December 2012

सच का सामना



दिन आज का बड़ा सुहाना
मैसम भी बड़ा रुमानी था
चोरों तरफ धनेरे बादल
आसमां बरसने को बेकाबू था..
घटाओं की ओंट में आज
सूरज चांद सा दिखने वाला था..
कौन जानता है?
किस्मत की लकीरों को
आज ये आसमां तो
कहर बरपाने वाला था
बुझ गया था
सूरज भी अब तो..
ना चांद दिखनेवाला था..
खड़ा था मैं उस रास्ते
की मोड़ पर
जहां कोई नहीं आनेवाला था
अंधेरा था विरानी थी
रात तो नहीं थी
पर रात की रवानी थी
सोच जिसके लम्स मात्र से
रूह खड़ी हो जाती है
उस मोड़ पर आज सच
से सामना होने वाला था
रिश्तों की कच्ची डोर थी
बंधा हर तरफ मैं दिवाला था
देखा नहीं था जिस जगह को
वो आज उसी से वास्ता होने वाला था
टूट गई हर रिश्तों की डोर
मुहब्बत दोस्ती अब अफसाना था
मेरा मुझ में कुछ नहीं था
हर सय आज मिटने वाला था
मुकम्मल वही जो कभी ना हारे
वो भी एक जमाना था
आज खड़ा हूं मुकम्मल जहां में
जब सब कुछ खोने वाला था...।

प्रणव झा

Friday, 21 December 2012

हिन्दी- हमारी पहचान


भारत विविधताओं का देश है...यहां अनेक प्रकार के धर्म, वर्ण, जाति, परंपरा और अनेक संस्कृति का समभाव है...जब यहां रहनेवालों में इतनी विविधता है तो लाजमी है यहां के लोगों की आपसी बोलचाल की भाषाओं में भी विविधता होगी ही...।
और यहां भाषा में ऐसी विविधता है कि हर जिले के हर गांव की बोलचाल की भाषाओं में अंतर हो जाती है...इतनी विविधता के बावजूद हम एक हैं अखंड हैं संप्रभू हैं...इस अखंडता और एकता को जोड़ने का काम हिन्दी करती है जो कि हमारी राष्ट्रभाषा है और इसी से हमारी पहचान भी हैं...। पर विडंवना यह है कि एक अरब से भी ज्यादा लोगों की भाषा होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिन्दी को पहचान नहीं मिल सकी...।
हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है फिर भी ये अभी तक गुमनाम है..क्यों? क्योंकि हमारे देश में ही समय-समय पर हिन्दी को लेकर जो अभिव्यक्ति आती रहती है वो हमें और कुंठित करती है और हिन्दी के अस्मिता को आधात करती है...। अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो कर रहा गई है...और हिन्दी बोलने वाले को हीन दृष्टी से देखा जाता है...देश के कई ऐसे स्कूल कॉलेज हैं जहां हिन्दी बोलने पर पावंधी है और अगर कोई गलती से हिन्दी बोलता है तो बकायदा उसे सजा दी जाती है...।
अगर इसी तरह से हमारे आने वाले भविष्य के सामने हिन्दी की छवि को प्रस्तुत किया जाएगा तो हिन्दी की दशा आने वाले समय में बद से बदत्तर हो जाएगी...और फिरंगियों की बात फिर से सही होगी की एक दिन हिन्दुस्तानी हिन्दी को भूल जाएंगे और हमारी भाषा का फिर से गुलाम हो जाएंगे...।
अगर सही मायने में हमें हिन्दी का विकास के बारे में सोचना है तो सबसे पहले हमें इस तरह की कुंठा से बाहर निकलना पड़गे और नए जोश, उत्साह के साथ हिन्दी के स्वरूप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार करना होगा...।
1975 वर्धा से चल कर 2012 में जोहान्सबर्ग तक का जो हमारा सफर रहा उस सफर में हमारा एक ही लक्ष्य रहा की एक अरबों से भी ज्यादा लोगों द्वारा बोलीजाने वाली भाषा को संयुक्त राष्ट्र संध में आधिकारीक भाषा का दर्जा दिलाना..। इन सैंतीस साल में आठ ऐसे सम्मेलन हो चुके है और इन सम्मलनों में कई अहम फैसले लिए गए पर कभी हमने सोचा है इन सम्मेलनों से हमें क्या लाभ-हानि हुए हैं...उन प्रस्तावों का क्या हुआ जो इन सम्मेलन में पारित किए गए...क्या ये सम्मेलन अपने मूल लक्ष्य पाने में कुछ भी कदम आगे बढ़ पाए या वहीं के वहीं बस खड़े हैं जहां शुरूआत किए थें...। इन तमाम प्रश्नों का उत्तर  हम अपने अंदर झांकते हैं तो पता चलता है...।विडंबना यह है कि हम अपना काम भी अपनी भाषा में नहीं करते हैं तमाम सरकारी काम अंग्रेजी में होता यहां तक की हमारे जो निजाम हैं वो हिन्दी बोल भी नहीं पाते...ज्ञान-विज्ञान की क्षेत्र की तो बात ही नहीं करे यहां लोगों को हिन्दी की बोली ही अज्ञानता का प्रतिक सा लगता है...। स्कूल-कॉलेज में तो इस भाषा को अध्ययन-अध्यापन में अक्षम बताया जाता है...। पर ऐसा नहीं कि लोग इसके प्रति जागृत नहीं हैं जब कभी भी हिन्दी के विकास के लिए ऐसे मंच की बात की जाती है तो हिन्दी के ठेकेदारों की जमात खड़ी हो जाती है और वो इस कार्य को अपने ऊपर उठाने की तैयार रहते हैं...। विदेश मंत्रालय हर साल विश्वविध्यलयों, अकादमियों और राज्य सरकारों से इन सम्मेलन में जाने के लिए अपने प्रतिनिधियों का नाम मांगता है...और काई सारे नाम भी आते है पर इस प्रतिनिधियों में से कौन इस सम्मेलन में भाग लेने के योग्य है कौन नहीं इसके चयन के लिए कोई सर्वमान्य प्रक्रिया नहीं है...इस सम्मेलन के नाम पर कई नेता कई बार विदेशों के सैर करते रहें...।
इन सब के बीच भी यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि अभी तक हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध में औपचारिक रूप से भाष का दर्जा क्यों नहीं दिया गया..जबकि संयुक्त राष्ट्र संध की ओर से ये तर्क दी गई थी कि अगर 22 देशों में 20 करोड़ लोग इस भाषा को बोलते हों तो अगर ऐसा देखा जाइ तो अकेले भारत में ही 35 करोड़ लोग हिन्दी में ही अपन जिंदगी को गति देते हैं...अगर हम विदेशी की बात छोड़ भी दें तो ये अरबी भाषा जिसे संयुक्त राष्ट्र संध में अधिकारिक रूप दी गई है, के मुकाबले में बीस ही पड़ता है...लेकिन हम तो संतोषम परम् सुखम में विश्वास रखते हैं...हमारे प्रधानमंत्री कभी हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र संध की महासभा में भाषण देते हैं और न्यूयार्क में आंठवे विश्व हिन्दी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संध के महासचिव बान की मून संबोधन में नमस्ते कर  देता है और हमें क्या चाहिए...।
पर हमें हकिकत भी जानना बहुत जरूरी है..जिस संयुक्त राष्ट्र संध में अधिकारिक भाषा का दिलने के लिए हम कई दशकों से लड़ाई लड़ रहे हैं उस में विदेश मंत्रालय की क्या कोशिश रही है क्योंकि हम बिना विदेश मंत्रालय की भूमिका के बिना  हिन्दी को अपना हक नहीं मिल सकता..। और वहां की अफसरसाही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है और बची खुची कसर को राजनीति पूरा कर देता है...। हर बार यही बहाना बनाया जाता है कि अगर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध की भाषा बनाया गया तो इसके लिए भारत को भारी रकम देनी होगी...पर जब भारत युरोजोन को आर्थिक संकट से उबरने के लिए दस अरब डॉलर की सहायता दे सकता है और  हाल घपले धोटालों को देखा जाए तो ये दलिल कही पानी भरता नजर आता है...तो अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की संरक्षण को लिए संयुक्त राष्ट्र संध को रकम नहीं दे सकता...जाहिर सी बात है अगर इस सवाल का उत्तर हम देते हैं तभी कहीं इन सम्मेलन का सार्थकता महत्व हो सकता है...।
अगर हम अपना और इस राष्ट्र का विकास जाहते हैं तो हमें अपनी पहचान को बनानी होगी तभी कहीं हम विकास को सही रास्तों परा ला सकते हैं..आज हमारा पड़ोसी देश चीन विकास के मामले में हम से आगे क्यों हैं क्योंकि उसकी अपनी पहचान है उसकी भाषा... चाहे कोई विदेशी कंपनी हो या देसी वहां हर काम चाइनीज भाषा में ही होता है..। अत: हमे भी अपनी पहचान के लिए जागना होगा...जब तक हमारी भाषा को पहचान नहीं मिलेगी तब तक हम विकास नहीं कर पाएंगे...

प्रणव झा

Wednesday, 19 December 2012

शर्मिंदा हैं हम...


                                                  
हर बार की तरह फिर एक बार एनसीआर यानि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल गहरा गया जब रात के साढ़े नौ बजे चलती बस में एक महिला के साथ उसे पुरुष मित्र के सामने ही गैंग रेप की घटना को अंजाम दिया जाता है और उसके पुरुष मित्र को बुरी तरह से पीट कर दोनों को बस से फेंक दिया जाता है...।
हमारे समाज को शर्मसार कर देने वाली इस घटना से तथाकथित कई सवाल फिर से उठते है...जो कि हम सभी बखुबी जानते हैं...इस घटना के बाद प्रशासन पुलिस और सरकार तो सवाल के घेरे में आते ही है साथ ही हमारी समाजिक सोच और हमारे बदली परिस्थितियां भी घेरे में आती है..।
आज शहर में विकास की गति बहुत ही विकसित होती जा रही है...सड़क, बिल्डिंग से लेकर लोग भी विकास के तेज रफ्तार में हैं...पर इस रफ्तार के साथ जो लोग कदमताल नहीं कर पाते उनकी जमात भी इस शहर में कम नहीं...ये वो ही तबका है जो अपनी दिन रात की मेहनत से इस शहर के विकास को रफ्तार देते हैं...और शहर में रहने लायक मूलभूत सुविधा जुटा पाते हैं....शिक्षित होने बावजूद जब इन लोगों को अपने मानमुताबिक कम नहीं मिलता तो उन्हें ये अहसास होता है कि अगर हम शिक्षा विहिन होते तो बेहतर था...वो अपनी आमदनी और बढ़ेते महंगाई के साथ तालमेल नहीं कर पाते हैं....ऐसे युवा और ऐसे लोग दिन रात चिंताग्रस्त होते हैं और उनका मानिसक संतुलन बिगड़ता जाता है...। और तब ये वर्ग अपने आपको समाजिक और इंसानी कसौटी पर खुद को नहीं कस पाते...।
देश में आर्थिक और समाजिक असमानता जिस कदर अपना भीषण रूप ले रहा है उससे ऐसे तबको की संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है..। तनावग्रस्त होने के कारण ऐसा तबकों का आक्रमक और हिसंक होना लजमी है...। और मौका मिलते ही ये किसी भी अपराध को बिना सोचे समझे अंजाम दे सकते हैं...और होता भी ऐसे ही जिसका उदाहरण हमें समय समय पर दिखता रहता है...।
ऐसे घटनाओं के पीछे कुछ हद तक हमारे समाजिक सोच भी दोषी है..ये समस्या आज की नहीं है युगों युगों से चलती आ रही जिसकी गवाही हमें हमारा इतिहास देता है...। क्योंकि अगर हम प्रकारांतर से देखे तो हमारा समाज हमेंशा से पुरुष प्रधान रहा है और महिलाओं की भूमिका पर्दे की पीछे का रहा है...पर समय हालात बदतले गए और महिलाएं भी पर्दे के पीछे से निकलने लगी और आज समाज वो भी पुरुष के साथ कदमताल कर रही है...सब कुछ तो बदला पर हमारी अबसाद ग्रस्त मानसिकता नहीं बदली...कहने को तो हम महिलाओं को पूरी आजादी दे चुके है पर हम खुद ही उसके आजादी को लेकर पूरी तरह से आजाद नहीं हुए है...महिलाएं को तो हम समाजिक स्तर पर आजाद कर दिए पर मानसिक स्तर पर पहले से भी ज्यादा गुलाम बना रखे हैं..। आज भी जब कोई लड़की अपनी कक्षा में या कहीं भी बेहतर साबित होती है तो उससे जुड़े पुरुष वर्ग में एक रोस उत्पन होता है और वे अवचेतन मन से उसे नीचा दिखाने के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं...और ऐसी ही स्थिति में ये वर्ग अपने आप पर काबू नहीं रख पाते और आपराध की गंभिरता से परे होकर घटना को अंजाम दे बैठते हैं..।
दिल्ली और इससे सटे क्षेत्र में ये घटना कोई नई नहीं और ना ही चौकाने वाली बात है...अगर दिल्ली में पीछले एक साल से इस साल तक का आंकड़े देखे तो चौकाने वाली है 2011 से 2012 तक करीब दुष्कर्म जैसी 1150 से भी धिनौनी घटना को अपराधीयों ने अंजाम दिया..। ये आंकड़े तो सिर्फ एनसीआर की है ऐसे कितने ही आंकड़े हमारे देश के अन्य भाग में भी है जिसकी जानकारी से हम तक नहीं पहुंच पाती...। विडंबना ये है कि ये घटनाएं कम होने की वजय साल दर साल बढ़ती ही जा रही है..। ऐसी स्थिति में हम कैसे नारा बुलंद कर सकते हैं हमारे देश में महिलाएं सशक्त हो रही है...।
बलात्कार जैसे जघन्य अपराध जब दिल्ली जैसे हाईटेक शहर में होता है तो हताशा और भी बढ़ जाती है...क्योंकि जहां कानून व्यवस्था इस तरह चौकस है की एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता तमाम संसाधन आयोग संगठन यहां से ही काम करती है... वहां रात के साढ़े नौ बजे ही ऐसी शर्मनाक घटना घटती है कि लोग के जेहनियत में खौफ घर कर बैठता है...। तो देश के अन्य भाग का क्या होगा जहां कानून व्यवस्था का हाल खासता है...।
अब यहां सवाल यह है कि क्या हम इसी कुंठित मानसिकता के साथ समाज को आगे बढ़ाएगें...क्या हम महिलाओं की अधिकार के लिए सिर्फ जुबानी जंग ही करते रहेंगे..। या इसकी शुरूआत के लिए हम जमीनी तैर पर तैयार होंगे...।इस के लिए पहले हमें खुद का ही आत्म निरक्षण करना होगा...और हम जहां रहते है वहां से ही छोटे से छोटे अपराध को रोकना होगा...जो हमारे घर में हमारे आस पड़ोस रोज होता है...। जब तक हम महिलाओं की सुरक्षा के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे तब तक लाख आवाज उठाले जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हो सकता..। लिहाज पुरुष वर्ग को महिला के प्रति अपने नजरिए को बदलने की जरूरत है और जितनी जल्दी इसकी शुरूआत होगी, हमारे और हमारे समाज के लिए अच्छा होगा...।

प्रणव झा