‘हमरा पास तोहरा लोगन के आशीष देवे के सिवा कुछु
ना है’ महादेव ये आशीष125 वैशाली विधानसभा से निर्दलीय
उम्मीदवार अमीय भूषण और उनके सहयोगियों को दे रहा था, क्योंकि इन लोगों की मदद से
उसकी पत्नी सुमित्रा देवी की लाश उसके घर तक पहुंच पाई। हमारा समाज एक दौर में आ
कर इस कदर संवेदनहीन हो जाएगा इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। लेकिन जिस
प्रकार कि घटना बिहार के वैशाली विधानसभा के भगवानपुर रत्ति गांव के नागरिक महादेव
के घर पर घटी उससे तो इंसान और इंसानियत के बीच कोसों का फासला लगने लगा है।
हुआ ये कि रत्ति
गांव के रहने वाले महादेव भगत की पत्नी सुमित्रा देवी की तबीयत गर्भवती होने के
कारण खराब होती है तो महादेव उसे स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देता है।
जहां तबीयत में सुधार नहीं होने की सूरत में उसे पीएमसीच रेफर कर दिया जाता है।
लेकिन महादेव इस बीच दलालों के चक्कर में फंस जाता है और दलाल उसे जल्दी तबीयत ठीक
होने का झांसा दे कर उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने को तैयार कर लेता
है। ये अस्पताल पटना के अगमकुआं में है जिसका नाम शांति केयर क्लिनिक है। यहां
भर्ती के समय ही महादेव से 60 हजार रुपये जमा कर लिया जाता है। ये रुपया महादेव
अपनी ज़मीन के आखिरी बचे हुए टुकड़े को बेच कर लाया होता है। एडमिट होने के एक
घंटे के अंदर ही महादेव की पत्नी अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ दम तोड़ देती
है। लेकिन मौत की इस बात को अस्पताल वाले छुपा लेते हैं और महादेव से फिर से 1 लाख
20 हजार रुपये जमा करने की बात करते हैं। जब महादेव अपनी स्थिति बताता है तो
अस्पताल वाले उसे मौत से पहले हुए खर्च की जानकारी देते हुए कहता है कि जब तक तू
ये पैसा जमा नहीं करेगा तब तक हम तुम्हें लाश अपने साथ नहीं ले जाने देंगे। साथ ही
महादेव से उसके सारे काग़ज भी छीन लेते हैं और उसे वहां से भगा देते हैं।
बात अगर यहां तक ही
होती तो इमान के बिक जाने का हवाला देकर छोड़ देते लेकिन बात आगे भी बढ़ी। अस्पताल
से धमकी मिलने लगी। जिस वज़ह से महादेव ने पुलिस में एफआईआर नहीं किया। क्योंकि
उसकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि पुलिस-कोर्ट का चक्कर लगा सके। यही बात जब मीडिया ने
पटना के एसएसपी से पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर पुलिस में शिकायत आती है तो इस
घटना की जांच की जाएगी।
बहुत कोशिश के बाद
भी जब चार दिन तक महादेव को उसकी पत्नी का शव नहीं मिलता है तो उसने अपने गांव
वालों की मदद से अपनी पत्नी की प्रतिकात्मक पुतला बना कर दाह संस्कार करने की
तैयारी में लग जाता है। इसी बीच अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार कर रहे अमीय भूषण
को इस बात की जानकारी मिलती है। जानकारी मिलते ही भूषण महादेव से भेट करते हैं और
पूरी घटना के बारे में जानकारी लेते हैं और एफआईआर करने की बात भी कहते है। वहीं
स्वस्थ भारत अभियान वेब-पोर्टल पर खबर छपने के बाद मामले में आई गंभीरता को देखते
हुए अस्पताल महादेव को उसकी पत्नी की लाश लौटा देता है।
अब सवाल है कि जिस
बिहार में अभी लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है, वहां के लोगों का ये हाल देखकर
तो यही लगता है कि ये उत्सव एक छलावा से कम नहीं है। ये बस एक परंपरा है जिसे निभाना
है क्योंकि हक़ीकत से किसी का कोई वास्ता ही नहीं है।
इन सब के बीच एक जिंदगी
दुनिया का बदरंग तस्वीर देख कर चली जाती है और एक बिना देखे ही दुनिया को महसूस कर
चली जाती है। वहीं तीसरी जिंदगी न्याय की आस में मौत को कोसती रह जाती है।
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