मौत की पहलू में सो रही है
हर पल जिंदगी...
कब सहर हुई पता नहीं
बेवक्त ही सही
वो वक्त आ जाए, ये और है
मुकरर्र नहीं है
एक पल भी जिंदगी...
ये तेरा ये मेरा
कर के बिता रहा
शाम हर सवेरा
पर हर सांस
आखिरी है जिंदगी...
समझ नहीं पाते
हम देख कर भी
जब जब मौत की
पहलू में सोती रही है जिंदगी...
महसूस तो करते हैं
अहसास नहीं होता
पर जब अहसास होता है
तो कहां रही है ये
जिंदगी...
वो तो शाश्वत है
आयेगा ही एक दिन
बिना उसके
ना जिएगी ये जिंदगी
क्योंकि मौत की अमानत है ये
जिदंगी...।
प्रणव झा
(20-04-13)