Tuesday, 29 December 2015

'कितना बदला भारत'

2014 से 2015 तक का सफर शपथ का ही रहा। 2014 पीएम का तो 2015 सीएम का। जनता ने भी खूब विश्वास दिखाया। 2014 में ये आशा थी कि दिन अब अच्छे आने वाले हैं लेकिन कैलेंडर पर बस पन्ने पलटते गए और अच्छे दिन का सपना टूटता गया। परिणाम ये हुआ कि दिल्ली में केजरीवाल अपने दल बल के साथ आ गए। केजरीवाल मोदी जी से भी ज्यादा सपने दिखा कर कुर्सी पर बैठ गए और फिर जनता की नींद टूट गई। इतिहास के 68 साल में जनता इतनी जल्दी नहीं जागी जितनी जल्दबाजी दिल्ली और बिहार चुनाव में दिखाई। क्योंकि मुल्क का भाग्य ही खराब है जो हमेशा एक ही कहानी दुहराती है।

जिस मंगलराज की कामना में बिहार में जनता ने सुशासन बाबू के हाथ में अपनी किस्मत फिर से दे दी वहां कुशासन का ऐसा नंगा नाच हो रहा है कि जंगलराज की याद फिल्म की तरह रिकैप होने लगी है। दिनदहाड़े किसी को भी गोली से भून दिया जाता है। फिरौती के लिए फोन आता है और ना देने पर गोली मार दिया जाता है। डकैती की घटना आम हो गई है जो बिहार के लिए शुभ संकेत नहीं है।
लेकिन सपनों के सौदागर के तौर पर क्रांति पुरूष ने लोकपाल के चक्कर में जनता को ऐसे उलझाया और सुविधा देने के नाम पर समीकरण का ऐसा जाल बुना की लोग भी थक कर बैठ गए। जहां वाई-फाई के नाम पर नेटवर्क भी ठीक नहीं हुआ, वहीं बिजली पानी का संकट और भी बढ़ गया। सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली पूरे राज्य की तुलना में सबसे असुरक्षित राज्य हो गया।
लेकिन देश आज भी बदलाव का गीत गा रहा है। 16 दिसंबर अब काले दिन के तौर पर याद किया जाता है लेकिन उसके बाद भी 33707 घटनाएं घटित हुई है, जो यहां के लोगों को शर्मसार करने के लिए काफी है। लेकिन इस मुल्क में रह रहे कुछ लोगों को शर्म नहीं आती क्योंकि उसके जेहन में इंसानी खून नहीं बहता, वो वहशी है जो मासूमों को अपना शिकार बनाता है। लेकिन एक वहशी और भी है इस मुल्क में, वो है किसानों की हत्या का जिन्न। इस जिन्न ने कई बेकसूर किसानों को मिट्टी में मिला दिया। सरकार ने इस पर खूब सियासत किया। अंतत: कुछ भी नहीं हुआ ये सिलसिला जारी है आज भी....।
लेकिन फिर भी हौसला है कि बदलाव आएगा। इस देश में जनता की अपेक्षा की हमेशा उपेक्षा होती रही है, और ये अब तो ये आम हो गया है। मोदी के तुफान ने इस देश का इतिहास तो बदला लेकिन भूगोल और रियाया की किस्मत पर आ कर मार खा गई। सिर्फ आंकड़ों के आधार पर ही मुद्रास्फीति कम हुई है बाकि देश में रोटी चावल खान भी मुश्किल हो रहा है। मोदी जी के शासन शैली को लेकर 'मेक इन इंडिया' का रंग भी इंडिया पर नहीं चढ़ रहा है। जहां एक तरफ लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है वहीं दूसरी तरफ उद्योग-धंधे का भी हाल बेहाल है। एक तरफ शहर में इतने लोग माईग्रेट हो रहे हैं जिससे अब किसी भी शहर में रहना गवारा नहीं है वहीं दूसरी तरफ गांव में कोई नहीं है। क्योंकि गांव में न सुविधा है और ना ही रोजगार का कोई साधन है।

जहां तस्वीर नहीं बदल रही है वहीं सियासत की गांठ भी ढिली नहीं पड़ रही, वो बदस्तूर जारी है। सब कुछ अपने हिसाब से चल रहा है। तारीखें तो बदल रही है, लेकिन तस्वीर बदलने का नाम नहीं ले रही क्योंकि सबको अपनी पड़ी है, देश की नहीं। इस सब के बीच जनतंत्र कहां है, आजादी कहां है, देश कहां है और लोगों का विश्वास कहां? अब यहां सब कुछ एक सपना सा लगता है,जो हर एक आहट पर टूट जाता है। 

Sunday, 6 December 2015

20 सितंबर के बाद....नेपाल

एक समान सभ्यता, संस्कृति और परंपरा होने भर से एक लकीर को पाटी नहीं जा सकती है, दो देशों के बीच खींची हुए लकीर, धर्म या साहित्य के एक होने से नहीं खत्म होती। ये इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि भारत और नेपाल दुनिया के पटल पर दो अलग देश हैं और बहुत कुछ समानताओं के बाद भी ये दोनों देश स्वयंभू राष्ट्र हैं और बहुत सारी असमानताएं भी हैं। समय-समय पर दोनों राष्ट्रों के बीच की लकीर भावनात्मक रूप से मिटती रही है लेकिन बदलते वक्त के बिसात पर तस्वीर भी बदलती रही है। और आज जो तस्वीरें हमारे सामने हैं ये उस नेपाल की है जहां राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। वहीं शांतिस्थली के रूप में देखाजाने वाला नेपाल अब खून-खराबे और जंग का मैदान हो गया है। क्योंकि राजतंत्र के अंत के बाद से नेपाल बहुत तेजी से बदलते हुए एक संवैधानिक देश बन गया है। संविधान को अंगीकृत करने से पहले नेपाल की छवि एक हिंदू राष्ट्र के रूप में थी लेकिन अब वो हिंदू राष्ट्र नहीं रहा। यहीं से शुरू हुई दूसरी कहानी जहां मौत आम हो गई है और शांति, सपनों की बातें।

पिछले कुछ दिनों में भारत-नेपाल संबंध में जो भूकंप आया है वो नेपाल भूकंप की त्रासदी से कम नहीं है। आज नेपाल का फ़िजा भारत विरोधी हो गया है। नेपाल में भारतीय मीडिया पर बैन लगा दिया गया, चैनल्स पर बैन लगा दिया गया। नेपाल के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्म पर रोक लगा दिया गया है। कहीं-कहीं भारतीय गाड़ियों के साथ आगजनी भी की गई है। इन सब बातों से जो बात निकल कर आती है वो ये है कि भारत और नेपाल अब ना तो खुले तौर पर दुश्मन है ना ही दोस्त।
भारतीय सीमा से सटे नेपाल के क्षेत्र में नाकेबंदी कर दी गई है जिससे नेपाल की आर्थिक स्थिति बेहाल हो गई है। वहीं नेपाल के उप-प्रधानमंत्री का मानना है कि ये भारत का नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है जो नहीं होना चाहिए। भारत नेपाल से उसके तराई क्षेत्र को अलग करना चाहता है और अपनी सीमा में मिलाना चाहता है जिससे नेपाल की संप्रभुता खत्म हो जाएगी। वहीं इनके दूसरे नेताओं का कहना है कि भारत हमारी रसद, तेल आदि की आपूर्ति को बंद कर रहा है तो हम मोटर साइकिल की जगह साइकिल से चल लेंगे लेकिन भारत के तलवे नहीं चाटेंगे उसकी जी-हुजूरी नहीं करेंगे। ऐसे बयान है तो बहुत तीखे पर राजनीति से प्रेरित हैं जो एक तरह से मान्य है लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखा जाए तो ये मामला बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि भारत और नेपाल के बीच में बन रही इस खाई का फायदा भारत के बाकी पड़ोसी देश जो की दुश्मन के भूमिका में सराहे जाते हैं उनको मिलने लगेगा। क्योंकि अगर नेपाल से भारत की दूरी बनती है तो नेपाल का भी वही हाल हो सकता है जो आज तिब्बत का है क्योंकि अगर नेपाल में चीनी वर्चस्व बढ़ता है तो नेपाल का प्रयोग चीन, भारत के खिलाफ खुले तौर पर भी कर सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल की समस्या उसकी अपनी समस्या है लेकिन जब समस्या घर से निकल कर बाहर आ जाती है तो उसपर सबकी निगाह होती है। भारत के साथ बरसों के पारंपरिक संबंध होने के बावजूद भी आज नेपाल और भारत के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई है कि नेपाल में भारत की छवि नकारात्मक हो गई है जिससे वह चीन के बहुत करीब आ गया।


भारत के तरफ से इस तनाव पर नजर रखी जा रही है लेकिन अगर समय रहते ही इस समस्या का निदान नहीं किया जाता है तो रिश्ते बेहतर होने के बजाय और उलझेगी ही, जो कि ना तो भारत के लिए ठीक होगा और ना ही नेपाल के लिए। 

Sunday, 1 November 2015

धर्मवीर भारती का 'मुनादी'


संपूर्ण क्रांति का आवाह्न कर इंदिरा सरकार की नींव हिला देने वाले लोकनायक जब दिल्ली की तरफ बढ़े तो उन्हें रोकने का हर संभव प्रयास किया गया। यहां तक की 3 दिन तक पटना हवाई अड्डे पर कोई विमान नहीं लैंड किया। फिर जयप्रकाश ने ट्रेन से अपना सफर पूरा कर रामलीला मैदान में ऐतिहासिक रैली की। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए सरकार को बता दिया की ये सत्ता उसकी नहीं जनता की है। उसी दौरान पटना में 4 नवम्बर 1974 को हुए ऐतिहासिक मार्च में लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर पुलिस की लाठीचार्ज के बाद धर्मवीर भारती द्वारा लिखी गयी कविता-

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का....

हर खासो-आम को आगाह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुण्डी चढ़ाकर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के पर्दे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है!

शहर का हर बशर वाकिफ़ है
कि पच्चीस साल से यह मुज़िर है
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाय
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाय
कि मार खाते भले आदमी को
और अस्मत लुटती हुई औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बे अदबी की जाय
जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक़ क्यों नहीं?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है।

बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान-फ़रामोशों! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नज़र आते हैं
और फुटपाथों पर फ़रिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्प-पोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि ज़न्नत तारी हो गयी है ज़मीं पर,
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है?

आख़िर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानसों की तरह अपनी-अपनी कुर्सी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क़ की भलाई के लिये
रात-रात जागते हैं
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयॉर्क, टोकियो, लन्दन की ख़ाक
छानते फ़कीरों की तरह भटकते रहते हैं....

तोड़ दिये जायेंगे पैर
और फोड़ दी जायेंगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चलकर
महलसरा की चहारदिवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की।

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया;
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराईयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी ज़वाँमर्दी की दाद दें।

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरु किया था?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलक़श बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाय!

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं  
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार! यह सारा मुल्क़ तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बग़ावत नहीं बर्दाश्त की जायेगी कि
तुम फ़ासले तय करो और मंज़िल तक पहुँचो।
इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जायेंगी
बैलगाड़ियाँ सड़क के किनारे नीम तले खड़ी कर दी जायेंगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जायेगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप!
क्योंकि याद रखो कि मुल्क़ को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाय!

बेताब मत हो
तुम्हें ज़लसा-ज़लूस, हल्ला-गुल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक़ है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार ज़लूस की शक्ल में निकलेगा-
दर्शन करो!
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ़्त लादकर लायेंगी
बैलगाड़ी वालों को दुहरी बख़्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जायेगा
नुक्कड़-नुक्कड़ पर प्याऊ बिठाया जायेगा
और जो पानी माँगेगा
उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जायेगा!

लाखों की तादाद में शामिल हो इस ज़लूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह ख़ून जो इस बुड्ढे की वज़ह से
बहा, वह पुँछ जाय!
बाश्शा सलामत को ख़ून-ख़राबा पसन्द नहीं!
खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम....

(‘पांचजन्य’ के ‘आपातकाल’ अंक (25 जून 1995) 

Thursday, 29 October 2015

बदलती तस्वीरों के बीच नेपाल



नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद विद्या भंडारी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दूसरी और नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति बनाई गई। नेपाल ने इस मंजिल तक का सफर यूं ही नहीं तय किया, इसके पीछे की कहानी जाननी भी जरूरी है...।
जब सवाल अस्तित्व पर हो तो कीमत जान दे कर या फिर जान ले कर भी चुकाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है। इस सवाल की परिणीती थी कि आंदोलनकारियों ने 37 पुलिसकर्मियों को ज़िंदा जला दिया था। यहां हिंसा आम हो गया है क्योंकि नेपाल बदल रहा है और अपना इतिहास ख़ून से लिख रहा है।

राजशाही के ख़ूनी अंत के बाद नेपाल गणतंत्र का सपना देखने लगा। लेकिन ये सपना इतना भी आसान नहीं था कि बिना कीमत चुकाए साकार हो जाए। आज नेपाल अपने सपने को साकार करने में लगा है और उसकी कीमत भी भरपूर चुका रहा है।

धर्म के बुनियाद पर जिस देश ने अपनी पहचान बनाई थी वो देश आज संविधान को अंगीकृत कर धर्मनिर्पेक्ष बन गया है। हिंदू बहुल इस देश ने दुनिया के सामने एक संवैधानिक होने की तस्वीर प्रस्तूत कर दी है लेकिन नेपाल का ये दौर बहुत ही नाजुक घड़ी से गुज़र रहा है क्योंकि जिस संविधान को दुनिया ने स्वीकार किया उसे नेपाल का एक हिस्सा स्वीकार करने को तैयार नहीं है। नेपाल के इसी हिस्से ने अपने अधिकार की मांग को लेकर अपनी जान तक को दांव पर लगा दिया है। नेपाल के इस दक्षिण भाग को तराई क्षेत्र या मधेश भी कहा जाता है।

मधेश क्या है ?

मधेशी मुख्य रूप से नेपाली निवासी हैं, जो नेपाल के दक्षिणी भाग के मैदानी क्षेत्र में रहते हैं। इस क्षेत्र को 'तराई क्षेत्र' भी कहते हैं। इसी क्षेत्र को मधेशभी कहते हैं। मधेश शब्द 'मध्यदेश' का अपभ्रंश है। यहां की जमीन उपजाऊ है और आबादी भी घनी है। मधेशियों में इस बात का आक्रोश है कि उनकी उपेक्षा की जाती है।नेपाल में मधेशियों की संख्या सवा करोड़ से अधिक है। इनकी बोली मैथिली है। ये हिंदी और नेपाली भी बोलते हैं। भारत के साथ इनका हजारों साल पुराना रोटी-बेटी का संबंध है। लेकिन इनमें से 56 लाख लोगों को अब तक नेपाल की नागरिकता नहीं मिल पाई है। जिन्हें नागरिकता मिली भी है, वह किसी काम की नहीं क्योंकि उन्हें ना ही सरकारी नौकरी में स्थान मिलता है और ना ही संपत्ति में। यानी सिर्फ कहने को नेपाली नागरिक। इसी भेदभाव के खिलाफ मधेशी आंदोलन कर रहे हैं। नेपाल में पहाड़ की महज सात-आठ हजार की आबादी पर एक सांसद है लेकिन तराई में सत्तर से एक लाख की आबादी पर एक सांसद है! मधेशी नेपाल में एक अलग मधेशी राज्य की मांग कर रहे हैं।

अब अगर किसी देश के संविधान में दोहरी नीति के लिए जगह बनती है तो यह संविधान के मूल परिभाषा को बदलने की कोशिश ही होगी और यही नेपाल के साथ हुआ है। इसलिए नेपाल के इस संविधान को लेकर भारत भी अपनी असहमती दिखा रहा है। जिसे लेकर नेपाल भारत का विरोध कर रहा है।

अगर इसी मुद्दे को वैश्विक रूप से देखा जाय तो एक तरह से नेपाल का भारत का इस तरह से विरोध चीनी की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा माने जाने लगा है क्योंकि पाकिस्तान के बाद चीन की नज़र नेपाल पर है क्योंकि नेपाल से भारत की सीमाएं जुड़ी है और इसी का लाभ चीन नेपाल को आर्थिक मदद कर लेना चाहता है।


नेपाल बदल रहा है लेकिन नेपाल के इस राह पर मुश्किलें बहुत ज्यादा है। अगर संभल कर कदम नहीं रखें तो मंज़िल आंखों से ओझल भी हो सकती है। फिर तस्वीर जो बनेगी वो बहुत ही भायवाह होगी।

Tuesday, 20 October 2015

हे 'महादेव', केकरा स करी गुहार...


 हमरा पास तोहरा लोगन के आशीष देवे के सिवा कुछु ना है महादेव ये आशीष125 वैशाली विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार अमीय भूषण और उनके सहयोगियों को दे रहा था, क्योंकि इन लोगों की मदद से उसकी पत्नी सुमित्रा देवी की लाश उसके घर तक पहुंच पाई। हमारा समाज एक दौर में आ कर इस कदर संवेदनहीन हो जाएगा इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। लेकिन जिस प्रकार कि घटना बिहार के वैशाली विधानसभा के भगवानपुर रत्ति गांव के नागरिक महादेव के घर पर घटी उससे तो इंसान और इंसानियत के बीच कोसों का फासला लगने लगा है।

हुआ ये कि रत्ति गांव के रहने वाले महादेव भगत की पत्नी सुमित्रा देवी की तबीयत गर्भवती होने के कारण खराब होती है तो महादेव उसे स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देता है। जहां तबीयत में सुधार नहीं होने की सूरत में उसे पीएमसीच रेफर कर दिया जाता है। लेकिन महादेव इस बीच दलालों के चक्कर में फंस जाता है और दलाल उसे जल्दी तबीयत ठीक होने का झांसा दे कर उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने को तैयार कर लेता है। ये अस्पताल पटना के अगमकुआं में है जिसका नाम शांति केयर क्लिनिक है। यहां भर्ती के समय ही महादेव से 60 हजार रुपये जमा कर लिया जाता है। ये रुपया महादेव अपनी ज़मीन के आखिरी बचे हुए टुकड़े को बेच कर लाया होता है। एडमिट होने के एक घंटे के अंदर ही महादेव की पत्नी अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ दम तोड़ देती है। लेकिन मौत की इस बात को अस्पताल वाले छुपा लेते हैं और महादेव से फिर से 1 लाख 20 हजार रुपये जमा करने की बात करते हैं। जब महादेव अपनी स्थिति बताता है तो अस्पताल वाले उसे मौत से पहले हुए खर्च की जानकारी देते हुए कहता है कि जब तक तू ये पैसा जमा नहीं करेगा तब तक हम तुम्हें लाश अपने साथ नहीं ले जाने देंगे। साथ ही महादेव से उसके सारे काग़ज भी छीन लेते हैं और उसे वहां से भगा देते हैं।

बात अगर यहां तक ही होती तो इमान के बिक जाने का हवाला देकर छोड़ देते लेकिन बात आगे भी बढ़ी। अस्पताल से धमकी मिलने लगी। जिस वज़ह से महादेव ने पुलिस में एफआईआर नहीं किया। क्योंकि उसकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि पुलिस-कोर्ट का चक्कर लगा सके। यही बात जब मीडिया ने पटना के एसएसपी से पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर पुलिस में शिकायत आती है तो इस घटना की जांच की जाएगी।  

बहुत कोशिश के बाद भी जब चार दिन तक महादेव को उसकी पत्नी का शव नहीं मिलता है तो उसने अपने गांव वालों की मदद से अपनी पत्नी की प्रतिकात्मक पुतला बना कर दाह संस्कार करने की तैयारी में लग जाता है। इसी बीच अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार कर रहे अमीय भूषण को इस बात की जानकारी मिलती है। जानकारी मिलते ही भूषण महादेव से भेट करते हैं और पूरी घटना के बारे में जानकारी लेते हैं और एफआईआर करने की बात भी कहते है। वहीं स्वस्थ भारत अभियान वेब-पोर्टल पर खबर छपने के बाद मामले में आई गंभीरता को देखते हुए अस्पताल महादेव को उसकी पत्नी की लाश लौटा देता है।

अब सवाल है कि जिस बिहार में अभी लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है, वहां के लोगों का ये हाल देखकर तो यही लगता है कि ये उत्सव एक छलावा से कम नहीं है। ये बस एक परंपरा है जिसे निभाना है क्योंकि हक़ीकत से किसी का कोई वास्ता ही नहीं है।
इन सब के बीच एक जिंदगी दुनिया का बदरंग तस्वीर देख कर चली जाती है और एक बिना देखे ही दुनिया को महसूस कर चली जाती है। वहीं तीसरी जिंदगी न्याय की आस में मौत को कोसती रह जाती है।


Thursday, 17 September 2015

बिहार से 'बिहारी' तक.....

गौरवमयी  बिहार की कहानी
पार्ट-1

बिहार चुनाव पर बिहार को खोजने की कोशिश

हर कोशिश में मैं बदला हूं...हर सांचे में मैं ढला हूं...हर जुबान में, हर इंसान में मैं मिला हूं.......  हर बार मिल जाता हूं, ढल जाता हूं और बदल जाता हूं क्योंकि समय का मैं सवारी हूं....मैं बिहारी हूं।

गाली की मौलिकता आवाज़ की ऊंचाई में होती है लेकिन एक गाली ऐसी है जिसे धीमी आवाज़ में भी बोली जाए तो भी उतना ही काम करती है जितना की अन्य गालियां अपनी चरम ऊंचाई से करती है।



एक गौरवशाली मिट्टी कैसे गाली बन जाती है, वो बिहार के बिहारीयों से अच्छा कोई नहीं जान सकता है। बिहार के बासिंदे को अगर बिहारी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ! लेकिन, आज वक्त इस कदर बदल चुका है कि मां-बहन की गाली से भी अगर कोई उत्तेजक गाली है तो वो है किसी को बिहारी कहना। बिहार के बाहर कहीं भी किसी शहर में, किसी भी व्यक्ति का अगर घोर अपमान करना हो तो आप उसे बिहारी कह दें, वो आपको अपनी क्षमता का सबसे उच्य स्तरीय प्रक्रिया जरूर देगा।
आज शहर में रिक्शा या ठेला खीचने वालों का कोई अलग-अलग नाम नहीं होता। उन समुदाय का एक ही नाम होता है बिहारी। कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को भी उसके ऑरिज़नल नाम से नहीं बुलाया जाता, उन्हें भी बिहारी कह कर ही बुलाया जाता... ऐ बिहारी ठीक से काम कर। शहर के मलीन बस्तियों में रहने वाले लोग चाहे जहां से भी आये हों, उन्हें बिहारी के श्रेणी में ही रखा जाता है। ऑफिस हो या कोई कंपनी किसी भी आदमी को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का उपयोग किया जाता है, और जैसे ही उसे बिहारी की उपाधि दी जाती है उसके रगों में जमा खून खौल उठता है।

आखिर ऐसा क्यों?

ऐसा कैसे हो गया कि जिस प्रांत में ज्ञान की गंगा बहती हो, राजनीति जहां खेल हो, मेहनत जहां की ईमान हो और परिस्थितियां जहां कपड़े समान हो कि जब जैसा हो वैसा ही पहनो, उस प्रांत का नाम पूरे राष्ट्र में गाली बन गई हो, आखिर कैसे...?

इस वज़ह के पीछे एक पूरा सफर है, जो पाटलिपुत्र से बिहार तक तय किया गया है।
इसके पीछे एक ज्ञान की मौत है, एक अहिंसा की मौत, एक क्रांति की मौत है, एक सभ्यता कि मौत है, एक धर्म की मौत है, मौत है एक सम्राट के पहचान की, मौत है इतिहास की। साथ ही मारता है हर रोज बिहार जब कोई बिहारी अपने आपको ऊंचा दिखाने के लिए बोलता कि मैं बिहारी नहीं हूं।

बिहार की पहचान को धूमिल करने में यहां के राजनेता, यहां के समाज के रहनुमा और जाति के भेदभाव का बड़ा हाथ रहा है। आज दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई अन्य शहर हो, हर जगह आपको बिहार के लोग मिल जाएंगे। बिहारी सिर्फ मजदूर वर्ग में ही नहीं होते, बिहारी हर वर्ग में होते हैं। जैसे की किसी कंपनी का मालिक बिहारी है तो उसके साथ कंपनी में काम कर रहे  कर्मचारी भी बिहारी होते हैं। इससे आप अंदाज़ा लगा सकता हैं कि बिहारी के पास ना तो दिमाग की कमी है और ना ही प्रतिभा की, अगर कमी है तो वो है अवसर की।
जिस प्रांत में ये पैदा होते हैंं उस प्रांत में इनके पास रहने के लिए ज़मीन, घर, कपड़ा तो होता है लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं होती क्योंकि उस प्रांत में रोजगार का कोई उचित साधन नहीं है। इसलिए ये लोग बिहार से बाहर जा कर बिहारी बन जाते हैं।

क्रमश: