Wednesday, 25 February 2015

सोशल मीडिया के कंधों पर देश की जिम्मेदारी!


यूं तो आज भी इस्तेहार का माध्यम काग़जी अखबार और ख़बरिया चैनल को ही माना जा रहा है लेकिन बदलते दौर और बदलते समाज़ में इसका स्वरूप भी बहुत बदला है, अब इस्तेहार सिर्फ इन अख़बारों का मोहताज़ नहीं रह गया है। सोशल मीडिया ने इसकी तस्वीर को ही बदल कर रख दिया है। सोशल मीडिया का प्रभाव इन सारे माध्यमों से त्वरित है, साथ ही साथ असरदार भी है क्योंकि आज बच्चे से लेकर बुढ़ों तक सोशल मीडिया की पहुंच है। दुनिया भर में मोबाइल क्रांति के बाद सोशल मीडिया का कद बहुत ही व्यापक हो गया।

आज समाज के हर फैसले में सोशल मीडिया का प्रभाव दिखता है। यहां तक कि परिवार के डिनर पर भी सोशल मीडिया छाया दिख रहा है। अब अगर किसी मुल्क के नस में कोई इस कदर घुल रहा है तो उसके क़िस्मत के फैसलों पर इसका कैसे ना प्रभाव दिखेगा, और दिखा भी।

दुनियाभर में होने वाले चुनाव प्रचारों में सोशल मीडिया की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। 2014 का भारत का आम चुनाव हो या फिर 2015 का दिल्ली चुनाव दोनों जगह सोशल मीडिया की भूमिका सबसे ऊपर रही है। देश के लोगों ने इसकी भूमिका को गंभीरता से लिया भी क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने कुल प्रचार अभियान के बजट का 15 फीसदी खर्च सोशल मीडिया पर किया। प्यू रिसर्च के मुताबिक हर चौथा व्यक्ति सोशल मीडिया से अपनी राजनौतकि राय बनाता है। यही कारण रहा है कि ब्रिटेन चुनावों से पहले सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी फेसबुक पर हर महीने 71 लाख रूपये खर्च कर रही है।

प्यू के सर्वे के आधार पर कुछ आंकेड़े आप भी देखें...

26 % मतदाताओं के राजनीति विचार सोशल मीडिया से प्रभावित
04 % में से 1 वोटर टिवटर, फेसबुक, वीडियो आदि से प्रभावित

अब सोशल मीडिया पर राजनैतिक खर्च का आंकड़ा देखें

2009 में चुनाव पर कुल 500 करोड़ खर्च हुए
50 %  प्रिंट माध्यम पर
30 % टेलिविजन पर विज्ञापन
10 % रेडियों के ज़रिए विज्ञापन पर
10 %  विज्ञापन के अन्य प्रकार ( पोस्टर, होल्डिंग, रिक्शा-ठेला)

2014 के आम चुनावों के कुल खर्च का 15 फीसदी हिस्सा ऑन-लाइन माध्यमों पर खर्च किया गया।

50 % चुनावी कैंपन खर्च टेलीविजन विज्ञापनों पर खर्च
25 % रेडियो, होर्डिंग, पोस्टर आदि पर खर्च किया गया
15 % ऑनलाइन माध्यम पर किया गया
10 % चुनावी बजट का खर्च प्रिंट माध्यम पर हुआ

प्यू के सर्वे में एक बात और सामने आई है कि मतदाताओं को सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाले प्रचार ज़्यादा भाता है। अगर मतदाताओं कि माने तो अब अखबार की जगह सोशल मीडिया ही ले लिया है। प्यू ने अमेरिका के चुनावों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार किया जिसमें बताया कि साल 2012 में हुए चुनावों में 47 फीसदी मतदाताओं के लिए ख़बर का नया आधार इंटरनेट है। जबकि साल 2008 के चुनाव में यह 31 फीसदी था और साल 2004 में यह 21 फीसदी था।

सोशल मीडिया पर ख़र्च
अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को राष्ट्रपति बनने में सोशल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। ओबामा ने राष्ट्रपति के चुनाव में तकरीबन 2 अरब रुपये से ज़्यादा खर्च किए थे। वहीं रोमनी ने इस चुनाव में महज़ 30 करोड़ रुपये खर्च किए थे। वहीं 2008 के चुनाव में ओबामा ने 160 डिजिटिल माध्यम पर प्रचार करने के लिए ख़र्च किए थे। वहीं अगर सोशल मीडिया पर ख़र्च के परिपेक्ष में भारत की बात करें तो 450 करोड़ रुपये ख़र्च किए गए। भारत में बीते साल 16वीं लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बड़ी जीत में सोशल मीडिया को अहम कारक माना जा रहा है। पार्टी ने मीडिया के उभरते इस स्वरूप को बखूभी पहचाना और जम कर इसका उपयोग किया।पिछले साल के चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डाले तो भारतीय राजनीतिक पार्टियों ने 2-3 हजार करोड़ ऑनलाइन माध्यम पर प्रचार करने के लिए ख़र्च किए। देश के बड़े मीडिया एजेंसी नेटवर्क, ग्रुप एम ने यह आंकड़ा पेश किया। भारत में हो रहे इंटरनेट विस्तार को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि बहुत ज़ल्द इंटरनेट के उपयोग में भारत अमेरिका को पछाड़ सकता है। अमेरिका में अभी 260 मिलियन लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं वहीं भारत 198.30 लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है। गांवों में भी इंटनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। 

सूचना का अधिकार
सही मायने में अगर देखें तो चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया को सोशल मीडिया के माध्यम से ही सही पहचान मिली है। सोशल मीडिया ने अभिवक्ति की आज़ादी को सही साबित किया। जो लोग लोकतंत्र में जीने का बावज़ूद अपना विचार दूसरों तक नहीं पहुंच पाते थे या फिर सामाजिक, धर्मिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना तर्क नहीं दे पाते थे आज सोशल मीडिया उन लोगों के लिए एक वरदान साबित हुआ है। अब हर कोई अपना विचार आसानी से एक साथ कई जगहों और कई लोगों तक पहुंचा सकते हैं। साथ ही साथ इस माध्यम के चलते कई हमेशा आप एक साथ हजारों, लाखों लोगों से संपर्क में रह सकते हैं। कभी भूले बिसरे लोग जो कई दोनों का कई सालों से संपर्क में नहीं हैं वो भी इस माध्यम से एक दूसरे के संपर्क में आ जाते हैं।


हम आज जिस स्तर तक बदल चुके हैं आने वाले समय में बदलाव का पैमाना और भी बढ़ेगा हमारी निर्भरता इन सब चीजों पर और बढ़ जाएगी। इंटरनेट जिस तरह से अपना पांव फैला रहा है उस से तो अब ये जरूर लगने लगा है कि वो दिन दूर ने जब सच में दुनिया हर किसी के मुट्ठी में होगी और जो जब चाहे तब कहीं भी दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच सकता है।

Pranav Jha

No comments:

Post a Comment