दिल्ली इस बार एक ऐसे चुनावी दौर में है जहां से राजनीति का
इतिहास बदलने वाला वर्ष 2014 को विस्तार मिलेगा या फिर रचे इतिहास को बदल देगा।
दिल्ली के चुनावी मैदान में इस बार दो ऐसे उम्मीदवार हैं जो राजनीति को कभी एक ही
चश्में से देखा करते थे, लेकिन अब वो एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। इस बार
केजरी और किरण के बीच कुर्सी का ‘वॉर’ ठना है।
दिल्ली का चुनाव मोदी के साथ या बेदी के साथ
मोदी की बिसात पर जहां पूरे देश में बीजेपी ने इतिहास को
बदल कर रख दिया वहीं दिल्ली के सियासी मैदान में मोदी के बदले बीजेपी बेदी के
अगुवाई में चुनाव लड़ने जा रही है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस मोदी के रंग से
बीजेपी ने पूरे देश को एक रंग में रंग दिया, वहीं दिल्ली आ कर वो रंग उतर गया और
दिल्ली में कमल खिलाने का ज़िम्मा बेदी के कंधों पर आ गया। इसे समझने के लिए हमें
कुछ पहलूओं पर गौर करने की ज़रूरत है। दिल्ली में पिछली बार चुनाव लड़ने का जो
आधार था उसमें स्वच्छ प्रशासन और ईमानदार सरकार मुख्य मुद्दों में से एक था,
बीजेपी इस बात को बारिकी से जानती है। साल 2011 में जिस आंदोलन ने पूरे देश में एक
क्रांति का माहौल बना दिया उसी क्रांति का हिस्सा अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी है।
अन्ना के अंदोलन ने देश की सोच को बदल कर रख दिया और देश के हर हिस्से से स्वच्छ
और ईमानदार सरकार की मांग होने लगी। देश के इस नब्ज़ को पकड़ कर अरविंद केजरीवाल
ने आम आदमी पार्टी का गठन किया। जिसका विरोध उस समय की पूर्व आईपीएसी, समाजसेवी और
अन्ना टीम के सदस्य रह चुकी किरण बेदी ने किया साथ में अन्ना हजारे ने भी किसी
राजनीतिक पार्टी से जुड़ने में आपत्ति जाताई। साथ ही साथ अन्ना ने राजनीति को कीचड़
भी कह दिया, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने इस कीचड़ को साफ करने का ज़िम्मा लिया और
अपनी पार्टी बना कर अन्ना के आंदोलन से अपना अलग रास्ता बनाया। इस दौरान किरण बेदी
और पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह अन्ना के साथ रहे, लेकिन लोकसभा 2014 के चुनाव में
वीके सिंह ने बीजेपी का दामन थाम लिया और गाज़ियाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और
जीते भी। इसी दौरन ये कयास लगाए जाने लगे कि अब किरण बेदी भी बीजेपी के साथ आ सकती
है। इन सब के बीच जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो दिल्ली के विकास के मुद्दों
को दूसरी स्थान पर रख कर भ्रष्टाचार और ईमानदार छवि वाले नेता को ज़्यादा तरजीह दी
जाने लगी। केजरीवाल को इसका फायदा भी मिला और 70 विधानसभा सीटों में से 28 सीटें
जीत कर आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही वहीं भाजपा 31 सीट जीत कर पहले स्थान पर
रही, सबसे बुरा हाल कांग्रेस का रहा जो 70 में से सिर्फ 8 सीटें ही बचा पाई। ये
केजरीवाल का ही जादू था जो दिल्ली में ‘झाड़ू’ अस्तित्व पा सकी।
2013 के इस चुनाव में किसी को भी प्रत्यक्ष बहुमत नहीं मिला जिस वज़ह से सरकार का
बनना नामुमकिन हो गया, लेकिन केजरीवाल ने जनता से रायसुमारी कर कांग्रेस के साथ
हाथ मिलाया और शर्त के साथ सरकार बनाया लेकिन ये सरकार 49 दिन से ज़्यादा नहीं चल
पाई। विधानसभा में लोकपाल बिल नहीं पास होने पर केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से
इस्तीफा दे दिया और दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसी बीच पूरे देश
में मोदी की लहर छा गई और केंद्र में ऐतिहासिक जीत के साथ मोदी की सरकार बन गई।
सरकार में आने के बाद से ही बीजेपी की नज़र दिल्ली पर थी
लेकिन टीवी चैनलों और एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वें से बीजेपी एक हद तक सकते
में थी क्योंकि सारे सर्वे में केजरीवाल की लोकप्रियता मोदी पर भारी पड़ रही थी और
दिल्ली की पुकार थी ईमानदार मुख्यमंत्री। बीजेपी ने इस बात को भांप लिया और तुरुप
के इक्के के तौर पर केजरीवाल के सामने उसी के पूर्व साथी किरण बेदी को खड़ा कर
दिया। राजनीति के बिसात पर दोनों ही नए खिलाड़ी हैं पर दोनों की छवि ईमानदार वाली
है और दिल्ली को एक ऐसे ही मुख्यमंत्री की चाहत भी थी।
किरण, केजरी ‘वॉर’
किरण बेदी ने राजनीति में एंट्री करने के साथ ही दिल्ली के
चुनावी फ़िजा को ही बदल कर रख दिया। यूं तो इसका पूर्वाभास था लेकिन ऐसा अचानाक से
हो जाना एक धमाके से कम नहीं था क्योंकि किरण बेदी के आने से बीजेपी और संघ के
नेता पीछे धकेल दिए गए। पार्टी में मनमुटाव का माहौल भी बन गया। सूत्रों के
मुताबिक किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किए जाने से डॉक्टर हर्षवर्धन भी
नाराज़ हुए। लेकिन पार्टी ने जीत को प्रमुखता देते हुए इन सारे जज़्बातों को हाशिए
पर डाल आम आदमी पार्टी के प्रमुख केजरीवाल के लिए किरण बेदी को विकल्प के तौर पर
उतारा जो केजरीवाल को उसके ही भाषा में ही जवाब दे। अब जब किरण दिल्ली में कमल
खिलाने का ज़िम्मा ले चुकी है तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलना लाज़मी था और इसी
क्रम में बेदी और केजरी ‘वॉर’ शुरू हो गया।
जुबानी जंग के इस मैदान में किरण और केजरीवाल के सामने अनेक चुनौतियां आने लगी।
अरविंद केजरीवाल ने तो किरण बेदी को बहस के लिए खुली चुनौती तक दे दी। लेकिन किरण
ने बड़ी सरलता और गंभीरता के साथ इस चुनौती को स्वीकार करते हुए सदन में बहस करने
की बात कह कर टाल दिया। किरण बेदी के इस जवाब को आप राजनीतिक चुप्पी कहें या फिर
एक सेफ ज़ोन में खुद को रखना, पर जो भी हो केजरीवाल का ये ऑफर बुरा नहीं था क्योंकि
खुली बहस की परंपरा अभी तक इस मुल्क में नहीं आया है अगर ऐसा होता है और इस परंपरा
को भारतीय राजनीतिक पार्टीयों द्वारा अमल में लाया जाता है तो ये लोकहित में ही
होगा। पश्चिम के देशों में जहां लोकतांत्रिक सरकार हैं वहां ऐसी परंपरा का चलन है।
खैर, बीजेपी को केजरीवाल का डर तो है और इस बात को तब और मजबूती मिल गई जब बीजेपी
की मुख्यमंत्री उम्मीदवार किरण बेदी को सुरक्षित रखते हुए सीधे तौर पर केजरीवाल के
सामने नहीं उतारा गया। इस मामले में केजरीवाल किरण बेदी पर भारी पड़ते हैं क्योंकि
पिछले दिल्ली के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पंडितों के कहने के बावज़ूद केजरीवाल
अपनी कही बात पर अड़े रहे और शीला दीक्षित के खिलाफ अपना नामांकन करवाया और विजयी बने
साथ ही साथ ये भी दिखा दिया कि कह देने मात्र से 56 इंच का सीना नहीं होता उसके
लिए करना भी होता है। केजरीवाल की इसी अखड़पना की वजह से बीजेपी को एक हद तक भय था,
इसलिए किरण बेदी को बीजेपी ने सुरक्षित सीट से दिल्ली के चुनावी मैदान में उतारा।
दिल्ली चुनाव के बाद बीजेपी
अन्ना के आंदोलन ने पूरे देश को जागृत किया और ईमानदार नियम
कायदे का पाठ सिखाया। केजरीवाल ने इसी को अपना पृष्टभूमि बना कर आम आदमी पार्टी को
सियासी ज़मीं पर उतारा। लेकिन बीजेपी ने इसी में घुसपैठ कर अपनी राजनीति को हाशिये
पर डाल कर जीत के लिए अपने सारे कायदे-कानून को पलटने के लिए तैयार हो गई। 2015 के
चुनाव 2013 के चुनाव से बहुत अलग है क्योंकि यहां अब जीत का पैमाना बदल गया है।
जिस पारंपरिक चुनाव को कांग्रेस ने साधा था उसे 2013 के दिल्ली चुनाव और बाद में
2014 के लोकसभा चुनाव ने बदल कर रख दिया। अबकी बार का चुनावी मुद्दा भ्रष्टाचार और
महंगाई नहीं है अबकी बार कौन ज़्यादा ईमानदार है इसकी लड़ाई लड़ी जा रही है।
अगर बीजेपी दिल्ली को आसानी से फ़तह कर लेती है तो बाकि
राज्यों में होने वाले चुनाव के राह आसान हो जाएंगें और अगर ऐसा नहीं होता है तो
आने वाला वक्त इतिहास को कुछ और ही दे जाएगा। देश की राजनीति को तय करनेवाले राज्य
बिहार और उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव होने वाले हैं जहां अभी से ही मोदी को
घेरने के लिए जनता परिवार का घेरा लगाया जा रहा है। इसलिए बाकि के क्षत्रपों को
साधने के लिए बीजेपी को दिल्ली में भगवा झंडा लहराना ही होगा, ये तो बाद में देखा
जाएगा कि ईमानदार छवि से आगे दिल्ली के ज़मीनी मुद्दों की बात होती है या नहीं। तो
देखते हैं दिल्ली के दिल में कौन जगह बना पाता है।
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