इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
गोद में आंचल के नीचे
सो कर बचपन में लौट जाते हैं
यहां सुकूं के पेड़ उगते नहीं
इस रोशनी में मुझे कुछ दिखता नहीं
यहां हर तरफ एक शोर है
और हर आदमी खामोश है
रंग बिरंगे जिस्म है
पर पैराहन पर दाग है
धुंधले चेहरे को दिखा
हर आइना बदनाम है
चलो कि परियों की दुनिया से
फिर एक बार घूम कर आते हैं
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
दबती कई जान है
तेरे सपनों के ख़ातिर
वो देता अपना बलिदान है
प्यार शब्द भर ही रहा
ना इसका कोई शब्दार्थ है
रिश्ते यहां कोई नहीं
पर रिश्तों का बड़ा बाज़ार है
ये हक़ीकत है तो छोड़ो
हम फिर सपनों में ही जी आते हैं....
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं...।
Pranav
jha

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