Friday, 23 January 2015

इस शहर में नींद आती नहीं

  
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
गोद में आंचल के नीचे
सो कर बचपन में लौट जाते हैं

यहां सुकूं के पेड़ उगते नहीं
इस रोशनी में मुझे कुछ दिखता नहीं
यहां हर तरफ एक शोर है
और हर आदमी खामोश है

रंग बिरंगे जिस्म है
पर पैराहन पर दाग है
धुंधले चेहरे को दिखा
हर आइना बदनाम है

चलो कि परियों की दुनिया से
फिर एक बार घूम कर आते हैं
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
उंचे इमारतों के नीचे
दबती कई जान है
तेरे सपनों के ख़ातिर
वो देता अपना बलिदान है

प्यार शब्द भर ही रहा
ना इसका कोई शब्दार्थ है
रिश्ते यहां कोई नहीं
पर रिश्तों का बड़ा बाज़ार है

ये हक़ीकत है तो छोड़ो
हम फिर सपनों में ही जी आते हैं....
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं...।


Pranav jha

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