Thursday, 29 October 2015

बदलती तस्वीरों के बीच नेपाल



नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद विद्या भंडारी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दूसरी और नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति बनाई गई। नेपाल ने इस मंजिल तक का सफर यूं ही नहीं तय किया, इसके पीछे की कहानी जाननी भी जरूरी है...।
जब सवाल अस्तित्व पर हो तो कीमत जान दे कर या फिर जान ले कर भी चुकाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती है। इस सवाल की परिणीती थी कि आंदोलनकारियों ने 37 पुलिसकर्मियों को ज़िंदा जला दिया था। यहां हिंसा आम हो गया है क्योंकि नेपाल बदल रहा है और अपना इतिहास ख़ून से लिख रहा है।

राजशाही के ख़ूनी अंत के बाद नेपाल गणतंत्र का सपना देखने लगा। लेकिन ये सपना इतना भी आसान नहीं था कि बिना कीमत चुकाए साकार हो जाए। आज नेपाल अपने सपने को साकार करने में लगा है और उसकी कीमत भी भरपूर चुका रहा है।

धर्म के बुनियाद पर जिस देश ने अपनी पहचान बनाई थी वो देश आज संविधान को अंगीकृत कर धर्मनिर्पेक्ष बन गया है। हिंदू बहुल इस देश ने दुनिया के सामने एक संवैधानिक होने की तस्वीर प्रस्तूत कर दी है लेकिन नेपाल का ये दौर बहुत ही नाजुक घड़ी से गुज़र रहा है क्योंकि जिस संविधान को दुनिया ने स्वीकार किया उसे नेपाल का एक हिस्सा स्वीकार करने को तैयार नहीं है। नेपाल के इसी हिस्से ने अपने अधिकार की मांग को लेकर अपनी जान तक को दांव पर लगा दिया है। नेपाल के इस दक्षिण भाग को तराई क्षेत्र या मधेश भी कहा जाता है।

मधेश क्या है ?

मधेशी मुख्य रूप से नेपाली निवासी हैं, जो नेपाल के दक्षिणी भाग के मैदानी क्षेत्र में रहते हैं। इस क्षेत्र को 'तराई क्षेत्र' भी कहते हैं। इसी क्षेत्र को मधेशभी कहते हैं। मधेश शब्द 'मध्यदेश' का अपभ्रंश है। यहां की जमीन उपजाऊ है और आबादी भी घनी है। मधेशियों में इस बात का आक्रोश है कि उनकी उपेक्षा की जाती है।नेपाल में मधेशियों की संख्या सवा करोड़ से अधिक है। इनकी बोली मैथिली है। ये हिंदी और नेपाली भी बोलते हैं। भारत के साथ इनका हजारों साल पुराना रोटी-बेटी का संबंध है। लेकिन इनमें से 56 लाख लोगों को अब तक नेपाल की नागरिकता नहीं मिल पाई है। जिन्हें नागरिकता मिली भी है, वह किसी काम की नहीं क्योंकि उन्हें ना ही सरकारी नौकरी में स्थान मिलता है और ना ही संपत्ति में। यानी सिर्फ कहने को नेपाली नागरिक। इसी भेदभाव के खिलाफ मधेशी आंदोलन कर रहे हैं। नेपाल में पहाड़ की महज सात-आठ हजार की आबादी पर एक सांसद है लेकिन तराई में सत्तर से एक लाख की आबादी पर एक सांसद है! मधेशी नेपाल में एक अलग मधेशी राज्य की मांग कर रहे हैं।

अब अगर किसी देश के संविधान में दोहरी नीति के लिए जगह बनती है तो यह संविधान के मूल परिभाषा को बदलने की कोशिश ही होगी और यही नेपाल के साथ हुआ है। इसलिए नेपाल के इस संविधान को लेकर भारत भी अपनी असहमती दिखा रहा है। जिसे लेकर नेपाल भारत का विरोध कर रहा है।

अगर इसी मुद्दे को वैश्विक रूप से देखा जाय तो एक तरह से नेपाल का भारत का इस तरह से विरोध चीनी की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा माने जाने लगा है क्योंकि पाकिस्तान के बाद चीन की नज़र नेपाल पर है क्योंकि नेपाल से भारत की सीमाएं जुड़ी है और इसी का लाभ चीन नेपाल को आर्थिक मदद कर लेना चाहता है।


नेपाल बदल रहा है लेकिन नेपाल के इस राह पर मुश्किलें बहुत ज्यादा है। अगर संभल कर कदम नहीं रखें तो मंज़िल आंखों से ओझल भी हो सकती है। फिर तस्वीर जो बनेगी वो बहुत ही भायवाह होगी।

Tuesday, 20 October 2015

हे 'महादेव', केकरा स करी गुहार...


 हमरा पास तोहरा लोगन के आशीष देवे के सिवा कुछु ना है महादेव ये आशीष125 वैशाली विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार अमीय भूषण और उनके सहयोगियों को दे रहा था, क्योंकि इन लोगों की मदद से उसकी पत्नी सुमित्रा देवी की लाश उसके घर तक पहुंच पाई। हमारा समाज एक दौर में आ कर इस कदर संवेदनहीन हो जाएगा इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। लेकिन जिस प्रकार कि घटना बिहार के वैशाली विधानसभा के भगवानपुर रत्ति गांव के नागरिक महादेव के घर पर घटी उससे तो इंसान और इंसानियत के बीच कोसों का फासला लगने लगा है।

हुआ ये कि रत्ति गांव के रहने वाले महादेव भगत की पत्नी सुमित्रा देवी की तबीयत गर्भवती होने के कारण खराब होती है तो महादेव उसे स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देता है। जहां तबीयत में सुधार नहीं होने की सूरत में उसे पीएमसीच रेफर कर दिया जाता है। लेकिन महादेव इस बीच दलालों के चक्कर में फंस जाता है और दलाल उसे जल्दी तबीयत ठीक होने का झांसा दे कर उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने को तैयार कर लेता है। ये अस्पताल पटना के अगमकुआं में है जिसका नाम शांति केयर क्लिनिक है। यहां भर्ती के समय ही महादेव से 60 हजार रुपये जमा कर लिया जाता है। ये रुपया महादेव अपनी ज़मीन के आखिरी बचे हुए टुकड़े को बेच कर लाया होता है। एडमिट होने के एक घंटे के अंदर ही महादेव की पत्नी अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ दम तोड़ देती है। लेकिन मौत की इस बात को अस्पताल वाले छुपा लेते हैं और महादेव से फिर से 1 लाख 20 हजार रुपये जमा करने की बात करते हैं। जब महादेव अपनी स्थिति बताता है तो अस्पताल वाले उसे मौत से पहले हुए खर्च की जानकारी देते हुए कहता है कि जब तक तू ये पैसा जमा नहीं करेगा तब तक हम तुम्हें लाश अपने साथ नहीं ले जाने देंगे। साथ ही महादेव से उसके सारे काग़ज भी छीन लेते हैं और उसे वहां से भगा देते हैं।

बात अगर यहां तक ही होती तो इमान के बिक जाने का हवाला देकर छोड़ देते लेकिन बात आगे भी बढ़ी। अस्पताल से धमकी मिलने लगी। जिस वज़ह से महादेव ने पुलिस में एफआईआर नहीं किया। क्योंकि उसकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि पुलिस-कोर्ट का चक्कर लगा सके। यही बात जब मीडिया ने पटना के एसएसपी से पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर पुलिस में शिकायत आती है तो इस घटना की जांच की जाएगी।  

बहुत कोशिश के बाद भी जब चार दिन तक महादेव को उसकी पत्नी का शव नहीं मिलता है तो उसने अपने गांव वालों की मदद से अपनी पत्नी की प्रतिकात्मक पुतला बना कर दाह संस्कार करने की तैयारी में लग जाता है। इसी बीच अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार कर रहे अमीय भूषण को इस बात की जानकारी मिलती है। जानकारी मिलते ही भूषण महादेव से भेट करते हैं और पूरी घटना के बारे में जानकारी लेते हैं और एफआईआर करने की बात भी कहते है। वहीं स्वस्थ भारत अभियान वेब-पोर्टल पर खबर छपने के बाद मामले में आई गंभीरता को देखते हुए अस्पताल महादेव को उसकी पत्नी की लाश लौटा देता है।

अब सवाल है कि जिस बिहार में अभी लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है, वहां के लोगों का ये हाल देखकर तो यही लगता है कि ये उत्सव एक छलावा से कम नहीं है। ये बस एक परंपरा है जिसे निभाना है क्योंकि हक़ीकत से किसी का कोई वास्ता ही नहीं है।
इन सब के बीच एक जिंदगी दुनिया का बदरंग तस्वीर देख कर चली जाती है और एक बिना देखे ही दुनिया को महसूस कर चली जाती है। वहीं तीसरी जिंदगी न्याय की आस में मौत को कोसती रह जाती है।