Monday, 29 June 2015

इस ‘प्रदेश’ का ‘उत्तर’ कौन देगा?



समाजवाद के परचम के नीचे सांस ले रहा उत्तर प्रदेश आज राम मनोहर लोहिया से सवाल पूछ रहा है कि मेरे दामन पर लगते इस दाग का गुनहगार कौन है? कोई दिन ऐसा नहीं होता जब उत्तर प्रदेश सुर्खियों में नहीं रहता। बलात्कार जैसा जघन्य अपराध यूपी में कभी भी कहीं भी हो सकता है क्योंकि हाल के 10 दिनों में बिजनौर, नोएडा, बदायूं में ऐसी वारदात को सरेआम अंजाम दिया गया। लूट और मर्डर तो अब यहां आम बात हो गई है। बात-बात पर गोली चलाना कोई बड़ी बात नहीं है। उत्तर प्रदेश का शासन तंत्र इस कदर नकार हो चुका है कि अपराधी पूरे हौसले के साथ वारदात को अंजाम दे कर सीना तान कर समाज में घूम रहे हैं।

बदायूं की जमीं अभी एक घटना से पूरी तरह से उबर भी नहीं पाई थी कि जब दो नबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार कर के पेड़ से लटका कर मार दिया गया था कि फिर से यहां एक बार ऐसी नृसंस घटना को अंजाम दिया गया कि भगवान की रूह भी कांप जाए। बदायूं के सिविल लाइन थाना क्षेत्र में हैवानों ने एक किशोरी के साथ बलात्कार कर उससे प्राइवेट पार्ट में बोतल का ढक्कन, माचिस का कवर, पौलीथिन, और लकड़ी का टुकड़ा डाल दिया। ओहहहहहहहहहहहह...... हम तो ये सुनने मात्र से ही कांप गए लेकिन जिस बच्ची के साथ ऐसी हैवानियत दरिंदों ने किया उसका क्या हुआ होगा। वहीं नोएडा में एक युवती को उसके ही दोस्तों ने कोल ड्रिंक्स में नशीली पदार्थ मिला कर उसके साथ बलात्कार किया। बिजनौर में एक महिला को उसके पड़ोस के तीन लड़को ने गैंगरेप किया और फिर उसे तेजाब से जलाने की कोशिश की।


इतना सब कुछ होने के बाद भी सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। ना तो कोई एक्शन हो रहा है ना ही रिएक्शन। क्योंकि महत्वकांक्षा जब एक सोच से ऊपर बढ़ जाती है तो हर फर्क की लकीर मिट जाती है, और खास कर तब जब सत्ता की कुर्सी की बात हो। इस 'तंत्र' के 'लोक' ऐसे हो चुके जिसे काटो तो खून नहीं। एक बार तो ऐसा लगता है कि क्या इसी आज़ादी के लिए हमारे पुरोधाओं ने अपना ख़ून बहाया था, जहां महिलाओं को लेकर समाज़ इतना कुंठित है। या फिर क्या समाज़वाद की यही परिभाषा दी गई थी जहां समाज़ को एक विकृत मानसिकता की साथ आगे बढ़ना पड़े। अज्ञानता के इस अंधेरे युग की कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी। लेकिन हक़िकत यहीं है कि जहां चांद और दूसरे ग्रह पर जाने की चलन हो वहां ये मुल्क शिक्षा से कोसो दूर जा रहा है। 

Saturday, 13 June 2015

आज़ादी की मौत-3

  
मरता हुआ इंसान झूठ नहीं बोल सकता है...तभी तो जगेंद्र की बात पर आग फिर से सुलग उठी है। जगेंद्र ने अपनी टूटती सांस और इंसाफ की आश में जो बोला उससे सारी तस्वीर साफ हो जाती है।

‘ मुझे मारना था तो मार लेते, गिरफ्तार करना चाहते थे तो गिरफ्तार कर लेते... आग क्यों लगाए दिए...सारे पुलिस वाले राइफल तान के खड़े थे

यही बोल कर मर गया जगेंद्र...लेकिन मरने के कई दिन बाद जब वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया पर छाया तो ठंड पड़ा माहौल फिर से गरमा गया। सवाल उठने लगे तो समाजवादी पार्टी के महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव जी आए और कह दिए कि FIR दर्ज होने से कोई गुनहगार नहीं होता। इस बयान को सुन कर तो जगेंद्र की आत्मा भी मर चुकी होगी। जो अब तक इंसाफ की आश में भटक रही थी।

ये वही उत्तर प्रदेश है जहां समाज़वाद के आने के बाद क्राइम का ग्राफ आसमान छूने लगता है और ये वही समाज़वाद है जिसके सिद्धांत पर यहां का प्रसाशन अपनी पूरी ताकत नेता जी के भैंस को ढूंढने में लगाता हैं और साथ ही मंत्री जी के इशारे पर एक पत्रकार पर पेट्रोल डाल कर आग लगा देता है।

इस प्रदेश में कुछ भी हो सकता है यहां कोई भी महफ़ूज़ नहीं है क्योंकि समाजवाद की कुर्सी पर सरकार आंखों पर चाटूकारों की पट्टी लगा कर बैठे हैं। ये कभी नहीं बोलते हैं चाहे देश के चौराहे पर संविधान की मौलिकता और लोकतंत्र की आबरू क्यों ना लुट जाए।


इतना सब कुछ होने के बाद भी समाजवादी पार्टी का गुंडा मंत्री राममूर्ती सिंह वर्मा फरार है जिसपर पहले से ही बलात्कार का मुकदमा चल रहा है वो इस जघन्य अपराध के बाद भी मंत्री पद पर बना हुआ है। पत्रकार मर गया और उसके घरवाले समाज़वादी गुंडों के गुलाम पुलिस वालों के खिलाफ सज़ा की मांग कर रहे हैं लेकिन अखिलेश जी को फुर्सत नहीं है कि इंसाफ करें। 

Friday, 12 June 2015

आज़ादी की मौत-2

इस मौत पर इतना सन्नाटा क्यों? यहां इतना सन्नाटा क्यों पसर जाता है जब आग अपने ही घर में लगती है। लोकतंत्र में लिखने की कीमत जान से चुकानी पड़ेगी शायद ही कोई पत्रकार जानता होगा। लेकिन जगेंद्र की मौत से तो ये साफ हो गया कि भारत को इसके लोकतंत्रिक इतिहास में सब कुछ मिलेगा जो नहीं मिलना चाहिए। अपने अधिकारों की हत्या के बाद भी चारो दिशा में इतना मौन होगा शायद जगेंद्र भी इससे वाकिफ ना होगा। इसलिए तो वो संविधान के द्वारा दिए गए अधिकार के बिसात पर लिखा और ऐसे लिखा कि पत्रकारिता की मौलिकता को जिंदा कर अपने जिस्म को इस व्यवस्था के लिए हवन कर दिया।

जगेंद्र को मौत के बाद मीडिया के सुर्खियों में बस दो अल्फ़ाज आए कि जगेंद्र को जिंदा जला दिया गया और इतना कह कर मीडिया ने जगेंद्र को श्रद्धांजलि दे दी। दर्द का अहसास तब और गहरा हो जाता है जब धोखा अपनों से मिलता है और जगेंद्र को तो उसके खुदा ने ही धोखा दिया क्योंकि वो पत्रकारिता को ही अपना रब मान चुका था। जगेंद्र की हत्या के बाद ना ही कार्रवाई हुई ना ही इंसाफ। तख्तों पर नारे भी नहीं लगें...मोमबत्ती भी बर्बाद नहीं हुई। बाज़ार में ख़बर बिक भी नहीं सकी। वो जो गुनाहों के शहंशाह है 'समाज का अपवाद' है राम मनोहर के सपनों का हत्यारा है समाज में आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। वहीं जर्नलिज्म मीडिया हाउस के चमक में रो रहा है। और 'संविधान' 'लोहिया' के चरणों में अपने अधिकार पर आंसू बहा रहा है। नेता के भैंसों के लिए ख़ाक छानती पुलिस के पीछे दौड़ता मीडिया के लिए शायद जगेंद्र का मर्डर कोई मायने नहीं रखता है। सोशल मीडिया भी जगेंद्र की हत्या पर दिलचश्पी नहीं लिया। संवेदना को बेचने वाला मीडिया इतना संवेदनहीन हो गया कि पत्रकारिता की मौलिकता को बचाने के लिए अपनी जान की आहूति देने वाला जगेंद्र के लिए एक बूंद आंसू नहीं बचा।



जगेंद्र तो मर गया लेकिन इतिहास का एक पन्ना जरूर लिख गया इस अवसादग्रस्त और मरती हुई पत्रकारिता के नाम। जगेंद्र ये भी बता गया कि अगर पत्रकारिता को फिर से ज़िंदा रखना है तो इसे भी एक क्रांति की जरूरत है जिससे जिंदा रहे कलम की ताकत उसकी इज़्जत ज़िंदा रहे संविधान की मौलिकता और उसका सम्मान।

Wednesday, 10 June 2015

आज़ादी की मौत!

संविधान की धाराओं में उल्लेख अभिव्यक्ति की आज़ादी को युपी के समाजवादी सरकार ने तब जला कर राख कर दिया जब शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत हुई। पत्रकार महोदय का अपराध सिर्फ इतना था कि उसने अखिलेश सरकार के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के काले करतूत के बारे में फेसबुक पर लिख दिया। अब मंत्री जी ठहरे बाहुबली तो कैसे बर्दाश्त करते....तो पत्रकार को जला कर ही मार दिया।

पत्रकार जगेंद्र के ग़ुस्ताख़ी से बौखलाए मंत्री जी ने पहले तो उसके खिलाफ कोतवाली थाना में लूट, अपहरण और हत्या के प्रयासों का मामला दर्ज करा दिया। फिर मंत्री जी के दबाव में कोतवाली थाना के कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने पत्रकार के घर पर दबिश देना शुरू कर दिया। पूछताछ के दौरान कोतवाल ने पत्रकार से मारपीट की और गुस्से में आ कर जगेंद्र के ऊपर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। आग से झुलसने के बाद जब जगेंद्र को अस्पताल ले जाया गया तो अस्पताल ने उसे मृत घोषित कर दिया।

जगेंद्र की मौत के बाद जब मामला सामने आया तो पुलिस पत्रकार को भगोड़ा बता रही है। वहीं एसपी बबलू कुमार बता रहे हैं कि जगेंद्र पर पहले से ही मुकदमा था। इसलिए पुलिस जगेंद्र के घर पर दबिश दे रही थी। जहां पत्रकार ने अपने ऊपर पेट्रोल डाल कर आग लगा ली।

वहीं पत्रकार जगेंद्र की पत्नी शालिनी बताती है कि 'जब वह घर से निकली तो रास्ते में ही पुलिसवालों ने उन्हें गाड़ी में बैठा लिए और बाद में उन्हें जबरदस्ती उनके घर पर ही ले गए जहां दो लोगों ने हम दोनों से मारपीट करना शुरु कर दिया और बाद में हम दोनों पर पेट्रोल डाल दिया....मैं किसी तरह से वहां से भाग निकली लेकिन जगेंद्र को इन लोगों ने आग लगा कर जला दिया।'

महज़ फेसबुक पर लिखने का ऐसा अंजाम हो सकता है कोई सोच भी नहीं सकता था, लेकिन इस घटना को सच कर दिखाया समाजवाद के वीर राममूर्ति सिंह ने। वाह रे! समाजवाद.....अगर लिखने और बोलने पर सज़ा मौत मुकर्रर होती है तो मुल्क की आज़ादी एक छलावा भर ही है। आज समाज़वाद का लिबास पहने ऐसे दरिंदों ने आज़ादी से लेकर इंसानियत तक की परिभाषा को जला कर राख कर दिया। जनता की भावना को ठोकर का पत्थर समझनेवाले 'सफेदपोश गुनहगारों' ने उत्तर प्रदेश के 'इतिहास' को 'संगम' में डुबा कर मार दिया और लोहिया के सिद्धांत को लोहिया के साथ ही पंचभूत में मिला दिया। लोहिया के समाज़वाद को रोते देख हर बार सोचता हूं कि पता नहीं किस समाजवाद की कल्पना कर मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का गठन किया था?

Tuesday, 9 June 2015

कानून के जाल में 'कानून मंत्री'

जिस दिल्ली के कानून पर अधिपत्य जमा कर साहब कानून मंत्री बने थे आज उसी कानून की धाराओं ने उन्हें अपनी जाल में फंसा लिया। साहब पर धारा-420 और धारा-467 के तहत मामला दर्ज किया गया। साथ ही सबसे दिलचस्प बात तो ये हैं कि जिस दिल्ली पुलिस को एक चोर को ढूढ़नें  में पता नहीं कितने दिन लग जाते है वो दिल्ली पुलिस दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर को गिरफ्तार करने में एक पल भी नहीं लगाई और मामला दर्ज होते ही साहब अंदर, तो भाईया अब क्या सोचें। सोचने पर मजबूर भी तो आप ही करते हो ना। खैर, इस पर बाद में बहस कर लेंगे।

तो भईया ये तोमर साहब के साथ कानून ने क्या मजाक किया है। एक तरफ देश के शिक्षा मंत्री पर सवाल उठे लेकिन सवाल की हैसयत इतनी नहीं कि शिक्षा मंत्री को खिलाफ कुछ जांच हो लेकिन यहां तो भाई कानून मंत्री की डिग्री पर बात उठी और दिल्ली पुलिस पहुंच गई मुंगेर जहां से पता जला कि तोमर साहब 1994 से लेकर 1999 तक पढ़ाई का दावा किये हैं पुलिस ने कॉलेज प्रशासन से तोमर के लॉ की मार्कशीट और रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज हासिल किए और जांच के लिए कई दस्तावेज साथ लेकर भागलपुर के तिलका मांझी विश्‍वविद्यालय गई थी।

तिलका मांझी विश्‍वविद्यालय से ही तोमर ने प्रोविजिनल सर्टीफिकेट हासिल किया है। यूनिवर्सिटी ने पुलिस को बताया है कि वहां से तोमर को कोई प्रोविजिनल सर्टीफिकेट नहीं दिया गया है।
दरअसल हाई कोर्ट के आदेश पर दिल्ली की बार काउंसिल ने इस मामले की जांच की और कहा कि तोमर की स्नातक और लॉ की डिग्री फर्जी हैं। बार काउंसिल ने बताया था कि उन्हें उत्तर प्रदेश की डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्‍वविद्यालय से जानकारी मिली है कि तोमर ने वहां से स्नातक नहीं किया है।
वहीं भागलपुर के तिलका मांझी विश्‍वविद्यालय से मिली जानकारी का हवाला देते हुए बार काउंसिल ने कहा था कि तोमर जिस प्रोविजिनल सर्टीफिकेट की बात कर रहे हैं वो प्रोविजिनल सर्टीफिकेट नंबर 3687 संजय कुमार चौधरी के नाम है। संजय ने वहां से बीए किया था।
तो फर्जी डिग्री और धोखाधड़ी के मामले में मंत्री जी हो गए हैं गिरफ्तार। यूं ही पहले से ही केजरीवाल जी जंग लड़-लड़ के थक चुके हैं। अब फिर से नई जंग का एलान हुआ है तो केजरीवाल और उनका कुनावा बखूबी मैदान में डट चुके हैं। देखते हैं अब क्या होता है.............!!!!!!

Sunday, 7 June 2015

इस गठबंधन के मायने...

सत्ता उसी की होती है जिसके वादों में दम होता है। इस लाइन को सही कर दिखाया दिल्ली में केजरीवाल और देश में मोदी सरकार ने। लेकिन वादों के पूल का अगर दम निकल जाए तो फिर सत्ता की कुर्सी के नीचे से ज़मीन खिसने का भी मौसम बनने लगता है जैसा कि लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में हुए उपचुनाव का नतीजा रहा। साहब ने भी बहुत वादे किए, सपने दिखाए पर बात जब आसमां से उतर कर ज़मीन पर आई तो हक़ीकत में कुछ और ही निकला और वो मोदी लहर का तूफान एक खामोश समंदर की तरह शांत हो गया। अब ना तो लहर है और ना ही सपनें... जो है वो है हक़ीकत।

सितंबर-अक्टूबर में बिहार की सत्ता तय होनी है। मोदी की फौज माहौल को बनाने में लगी है वहीं नीतीश अपना माहौल को बचाने में लगे हैं। सत्ता को जाति के समीकरण से बंधने वाले राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमों माननीय लालू प्रसाद यादव अपनी बची हुई साख और जातिगत राजनीति के सहारे सत्ता की दूरी नाप रहे हैं। वहीं मोदी को बिहार में रोकने के लिए समाजवाद के बचे अकेले पुरोधा माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने सभी क्षत्रपों को एक साथ जनता परिवार बनाने का आवाह्न किया हैं। जनता परिवार के आग़ाज होने से पहले ही महत्वकांक्षा ने बीच में लकीर खींच दी और बिहार की सत्ता को अनसुलझी पहेली बना दिया। तभी सीटों और कद की लड़ाई को लेकर बिहार में एक होते क्षत्रप अलग-अलग दिखने लगे। साथ ही एक बार ऐसा लगा कि वर्तमान में सरकार को एक साथ चलाने वाले बिहार के दो महान पुरोधा फिर से बिहार के राजनीति में दो अलग ध्रुव ही बन कर रहेंगे। लेकिन गठबंधन से अब पर्दा हट गया है और नीतीश-लालू एक साथ बिहार का चुनाव लड़ेंगे।

अगर ये गठबंधन होता है और अलग-अलग सीटों के साथ दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ती है तो बिहार का चुनावी समीकरण क्या हो सकता है? जो बिहार लालू प्रसाद यादव के अगुवाई में गर्त में चला गया, प्रशासन और पुलिस की परिभाषा बदल गई, जाति का पिशाच प्रदेश से निकल कर पूरे मुल्क में फैल गया साथ ही राष्ट्रीय पटल पर बिहार के लोगों को 'बिहारी' शब्द से नफरत होने लगी और नीतीश कुमार जिसके खिलाफ हो कर सत्ता का सुख लगातार 10 सालों तक भोगते रहे, उसी बिहार के विकास के 'दुश्मन' को आज नीतीश कुमार ने अपने गले से लगा लिया। अगर बिहार में लालू-नीतीश साथ आते हैं तो लोगों को राजनीति से मोह जरूर भंग होगा। जद-यू के नेताओं में फूट पड़ सकती है। साथ ही सत्ता के आगे जनता और उसकी भावना उपेक्षित हो जाएगी और कई दशकों से विकास के लिए तरसते बिहार का सपना जिंदा होने से पहले ही मर जाएगा....।