Friday, 12 June 2015

आज़ादी की मौत-2

इस मौत पर इतना सन्नाटा क्यों? यहां इतना सन्नाटा क्यों पसर जाता है जब आग अपने ही घर में लगती है। लोकतंत्र में लिखने की कीमत जान से चुकानी पड़ेगी शायद ही कोई पत्रकार जानता होगा। लेकिन जगेंद्र की मौत से तो ये साफ हो गया कि भारत को इसके लोकतंत्रिक इतिहास में सब कुछ मिलेगा जो नहीं मिलना चाहिए। अपने अधिकारों की हत्या के बाद भी चारो दिशा में इतना मौन होगा शायद जगेंद्र भी इससे वाकिफ ना होगा। इसलिए तो वो संविधान के द्वारा दिए गए अधिकार के बिसात पर लिखा और ऐसे लिखा कि पत्रकारिता की मौलिकता को जिंदा कर अपने जिस्म को इस व्यवस्था के लिए हवन कर दिया।

जगेंद्र को मौत के बाद मीडिया के सुर्खियों में बस दो अल्फ़ाज आए कि जगेंद्र को जिंदा जला दिया गया और इतना कह कर मीडिया ने जगेंद्र को श्रद्धांजलि दे दी। दर्द का अहसास तब और गहरा हो जाता है जब धोखा अपनों से मिलता है और जगेंद्र को तो उसके खुदा ने ही धोखा दिया क्योंकि वो पत्रकारिता को ही अपना रब मान चुका था। जगेंद्र की हत्या के बाद ना ही कार्रवाई हुई ना ही इंसाफ। तख्तों पर नारे भी नहीं लगें...मोमबत्ती भी बर्बाद नहीं हुई। बाज़ार में ख़बर बिक भी नहीं सकी। वो जो गुनाहों के शहंशाह है 'समाज का अपवाद' है राम मनोहर के सपनों का हत्यारा है समाज में आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। वहीं जर्नलिज्म मीडिया हाउस के चमक में रो रहा है। और 'संविधान' 'लोहिया' के चरणों में अपने अधिकार पर आंसू बहा रहा है। नेता के भैंसों के लिए ख़ाक छानती पुलिस के पीछे दौड़ता मीडिया के लिए शायद जगेंद्र का मर्डर कोई मायने नहीं रखता है। सोशल मीडिया भी जगेंद्र की हत्या पर दिलचश्पी नहीं लिया। संवेदना को बेचने वाला मीडिया इतना संवेदनहीन हो गया कि पत्रकारिता की मौलिकता को बचाने के लिए अपनी जान की आहूति देने वाला जगेंद्र के लिए एक बूंद आंसू नहीं बचा।



जगेंद्र तो मर गया लेकिन इतिहास का एक पन्ना जरूर लिख गया इस अवसादग्रस्त और मरती हुई पत्रकारिता के नाम। जगेंद्र ये भी बता गया कि अगर पत्रकारिता को फिर से ज़िंदा रखना है तो इसे भी एक क्रांति की जरूरत है जिससे जिंदा रहे कलम की ताकत उसकी इज़्जत ज़िंदा रहे संविधान की मौलिकता और उसका सम्मान।

No comments:

Post a Comment