सत्ता उसी की होती है जिसके वादों में दम होता है। इस लाइन को सही कर दिखाया दिल्ली में केजरीवाल और देश में मोदी सरकार ने। लेकिन वादों के पूल का अगर दम निकल जाए तो फिर सत्ता की कुर्सी के नीचे से ज़मीन खिसने का भी मौसम बनने लगता है जैसा कि लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में हुए उपचुनाव का नतीजा रहा। साहब ने भी बहुत वादे किए, सपने दिखाए पर बात जब आसमां से उतर कर ज़मीन पर आई तो हक़ीकत में कुछ और ही निकला और वो मोदी लहर का तूफान एक खामोश समंदर की तरह शांत हो गया। अब ना तो लहर है और ना ही सपनें... जो है वो है हक़ीकत।सितंबर-अक्टूबर में बिहार की सत्ता तय होनी है। मोदी की फौज माहौल को बनाने में लगी है वहीं नीतीश अपना माहौल को बचाने में लगे हैं। सत्ता को जाति के समीकरण से बंधने वाले राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमों माननीय लालू प्रसाद यादव अपनी बची हुई साख और जातिगत राजनीति के सहारे सत्ता की दूरी नाप रहे हैं। वहीं मोदी को बिहार में रोकने के लिए समाजवाद के बचे अकेले पुरोधा माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने सभी क्षत्रपों को एक साथ जनता परिवार बनाने का आवाह्न किया हैं। जनता परिवार के आग़ाज होने से पहले ही महत्वकांक्षा ने बीच में लकीर खींच दी और बिहार की सत्ता को अनसुलझी पहेली बना दिया। तभी सीटों और कद की लड़ाई को लेकर बिहार में एक होते क्षत्रप अलग-अलग दिखने लगे। साथ ही एक बार ऐसा लगा कि वर्तमान में सरकार को एक साथ चलाने वाले बिहार के दो महान पुरोधा फिर से बिहार के राजनीति में दो अलग ध्रुव ही बन कर रहेंगे। लेकिन गठबंधन से अब पर्दा हट गया है और नीतीश-लालू एक साथ बिहार का चुनाव लड़ेंगे।
अगर ये गठबंधन होता है और अलग-अलग सीटों के साथ दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ती है तो बिहार का चुनावी समीकरण क्या हो सकता है? जो बिहार लालू प्रसाद यादव के अगुवाई में गर्त में चला गया, प्रशासन और पुलिस की परिभाषा बदल गई, जाति का पिशाच प्रदेश से निकल कर पूरे मुल्क में फैल गया साथ ही राष्ट्रीय पटल पर बिहार के लोगों को 'बिहारी' शब्द से नफरत होने लगी और नीतीश कुमार जिसके खिलाफ हो कर सत्ता का सुख लगातार 10 सालों तक भोगते रहे, उसी बिहार के विकास के 'दुश्मन' को आज नीतीश कुमार ने अपने गले से लगा लिया। अगर बिहार में लालू-नीतीश साथ आते हैं तो लोगों को राजनीति से मोह जरूर भंग होगा। जद-यू के नेताओं में फूट पड़ सकती है। साथ ही सत्ता के आगे जनता और उसकी भावना उपेक्षित हो जाएगी और कई दशकों से विकास के लिए तरसते बिहार का सपना जिंदा होने से पहले ही मर जाएगा....।
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