Monday, 24 December 2012

सच का सामना



दिन आज का बड़ा सुहाना
मैसम भी बड़ा रुमानी था
चोरों तरफ धनेरे बादल
आसमां बरसने को बेकाबू था..
घटाओं की ओंट में आज
सूरज चांद सा दिखने वाला था..
कौन जानता है?
किस्मत की लकीरों को
आज ये आसमां तो
कहर बरपाने वाला था
बुझ गया था
सूरज भी अब तो..
ना चांद दिखनेवाला था..
खड़ा था मैं उस रास्ते
की मोड़ पर
जहां कोई नहीं आनेवाला था
अंधेरा था विरानी थी
रात तो नहीं थी
पर रात की रवानी थी
सोच जिसके लम्स मात्र से
रूह खड़ी हो जाती है
उस मोड़ पर आज सच
से सामना होने वाला था
रिश्तों की कच्ची डोर थी
बंधा हर तरफ मैं दिवाला था
देखा नहीं था जिस जगह को
वो आज उसी से वास्ता होने वाला था
टूट गई हर रिश्तों की डोर
मुहब्बत दोस्ती अब अफसाना था
मेरा मुझ में कुछ नहीं था
हर सय आज मिटने वाला था
मुकम्मल वही जो कभी ना हारे
वो भी एक जमाना था
आज खड़ा हूं मुकम्मल जहां में
जब सब कुछ खोने वाला था...।

प्रणव झा

Friday, 21 December 2012

हिन्दी- हमारी पहचान


भारत विविधताओं का देश है...यहां अनेक प्रकार के धर्म, वर्ण, जाति, परंपरा और अनेक संस्कृति का समभाव है...जब यहां रहनेवालों में इतनी विविधता है तो लाजमी है यहां के लोगों की आपसी बोलचाल की भाषाओं में भी विविधता होगी ही...।
और यहां भाषा में ऐसी विविधता है कि हर जिले के हर गांव की बोलचाल की भाषाओं में अंतर हो जाती है...इतनी विविधता के बावजूद हम एक हैं अखंड हैं संप्रभू हैं...इस अखंडता और एकता को जोड़ने का काम हिन्दी करती है जो कि हमारी राष्ट्रभाषा है और इसी से हमारी पहचान भी हैं...। पर विडंवना यह है कि एक अरब से भी ज्यादा लोगों की भाषा होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिन्दी को पहचान नहीं मिल सकी...।
हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है फिर भी ये अभी तक गुमनाम है..क्यों? क्योंकि हमारे देश में ही समय-समय पर हिन्दी को लेकर जो अभिव्यक्ति आती रहती है वो हमें और कुंठित करती है और हिन्दी के अस्मिता को आधात करती है...। अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो कर रहा गई है...और हिन्दी बोलने वाले को हीन दृष्टी से देखा जाता है...देश के कई ऐसे स्कूल कॉलेज हैं जहां हिन्दी बोलने पर पावंधी है और अगर कोई गलती से हिन्दी बोलता है तो बकायदा उसे सजा दी जाती है...।
अगर इसी तरह से हमारे आने वाले भविष्य के सामने हिन्दी की छवि को प्रस्तुत किया जाएगा तो हिन्दी की दशा आने वाले समय में बद से बदत्तर हो जाएगी...और फिरंगियों की बात फिर से सही होगी की एक दिन हिन्दुस्तानी हिन्दी को भूल जाएंगे और हमारी भाषा का फिर से गुलाम हो जाएंगे...।
अगर सही मायने में हमें हिन्दी का विकास के बारे में सोचना है तो सबसे पहले हमें इस तरह की कुंठा से बाहर निकलना पड़गे और नए जोश, उत्साह के साथ हिन्दी के स्वरूप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार करना होगा...।
1975 वर्धा से चल कर 2012 में जोहान्सबर्ग तक का जो हमारा सफर रहा उस सफर में हमारा एक ही लक्ष्य रहा की एक अरबों से भी ज्यादा लोगों द्वारा बोलीजाने वाली भाषा को संयुक्त राष्ट्र संध में आधिकारीक भाषा का दर्जा दिलाना..। इन सैंतीस साल में आठ ऐसे सम्मेलन हो चुके है और इन सम्मलनों में कई अहम फैसले लिए गए पर कभी हमने सोचा है इन सम्मेलनों से हमें क्या लाभ-हानि हुए हैं...उन प्रस्तावों का क्या हुआ जो इन सम्मेलन में पारित किए गए...क्या ये सम्मेलन अपने मूल लक्ष्य पाने में कुछ भी कदम आगे बढ़ पाए या वहीं के वहीं बस खड़े हैं जहां शुरूआत किए थें...। इन तमाम प्रश्नों का उत्तर  हम अपने अंदर झांकते हैं तो पता चलता है...।विडंबना यह है कि हम अपना काम भी अपनी भाषा में नहीं करते हैं तमाम सरकारी काम अंग्रेजी में होता यहां तक की हमारे जो निजाम हैं वो हिन्दी बोल भी नहीं पाते...ज्ञान-विज्ञान की क्षेत्र की तो बात ही नहीं करे यहां लोगों को हिन्दी की बोली ही अज्ञानता का प्रतिक सा लगता है...। स्कूल-कॉलेज में तो इस भाषा को अध्ययन-अध्यापन में अक्षम बताया जाता है...। पर ऐसा नहीं कि लोग इसके प्रति जागृत नहीं हैं जब कभी भी हिन्दी के विकास के लिए ऐसे मंच की बात की जाती है तो हिन्दी के ठेकेदारों की जमात खड़ी हो जाती है और वो इस कार्य को अपने ऊपर उठाने की तैयार रहते हैं...। विदेश मंत्रालय हर साल विश्वविध्यलयों, अकादमियों और राज्य सरकारों से इन सम्मेलन में जाने के लिए अपने प्रतिनिधियों का नाम मांगता है...और काई सारे नाम भी आते है पर इस प्रतिनिधियों में से कौन इस सम्मेलन में भाग लेने के योग्य है कौन नहीं इसके चयन के लिए कोई सर्वमान्य प्रक्रिया नहीं है...इस सम्मेलन के नाम पर कई नेता कई बार विदेशों के सैर करते रहें...।
इन सब के बीच भी यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि अभी तक हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध में औपचारिक रूप से भाष का दर्जा क्यों नहीं दिया गया..जबकि संयुक्त राष्ट्र संध की ओर से ये तर्क दी गई थी कि अगर 22 देशों में 20 करोड़ लोग इस भाषा को बोलते हों तो अगर ऐसा देखा जाइ तो अकेले भारत में ही 35 करोड़ लोग हिन्दी में ही अपन जिंदगी को गति देते हैं...अगर हम विदेशी की बात छोड़ भी दें तो ये अरबी भाषा जिसे संयुक्त राष्ट्र संध में अधिकारिक रूप दी गई है, के मुकाबले में बीस ही पड़ता है...लेकिन हम तो संतोषम परम् सुखम में विश्वास रखते हैं...हमारे प्रधानमंत्री कभी हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र संध की महासभा में भाषण देते हैं और न्यूयार्क में आंठवे विश्व हिन्दी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संध के महासचिव बान की मून संबोधन में नमस्ते कर  देता है और हमें क्या चाहिए...।
पर हमें हकिकत भी जानना बहुत जरूरी है..जिस संयुक्त राष्ट्र संध में अधिकारिक भाषा का दिलने के लिए हम कई दशकों से लड़ाई लड़ रहे हैं उस में विदेश मंत्रालय की क्या कोशिश रही है क्योंकि हम बिना विदेश मंत्रालय की भूमिका के बिना  हिन्दी को अपना हक नहीं मिल सकता..। और वहां की अफसरसाही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है और बची खुची कसर को राजनीति पूरा कर देता है...। हर बार यही बहाना बनाया जाता है कि अगर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध की भाषा बनाया गया तो इसके लिए भारत को भारी रकम देनी होगी...पर जब भारत युरोजोन को आर्थिक संकट से उबरने के लिए दस अरब डॉलर की सहायता दे सकता है और  हाल घपले धोटालों को देखा जाए तो ये दलिल कही पानी भरता नजर आता है...तो अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की संरक्षण को लिए संयुक्त राष्ट्र संध को रकम नहीं दे सकता...जाहिर सी बात है अगर इस सवाल का उत्तर हम देते हैं तभी कहीं इन सम्मेलन का सार्थकता महत्व हो सकता है...।
अगर हम अपना और इस राष्ट्र का विकास जाहते हैं तो हमें अपनी पहचान को बनानी होगी तभी कहीं हम विकास को सही रास्तों परा ला सकते हैं..आज हमारा पड़ोसी देश चीन विकास के मामले में हम से आगे क्यों हैं क्योंकि उसकी अपनी पहचान है उसकी भाषा... चाहे कोई विदेशी कंपनी हो या देसी वहां हर काम चाइनीज भाषा में ही होता है..। अत: हमे भी अपनी पहचान के लिए जागना होगा...जब तक हमारी भाषा को पहचान नहीं मिलेगी तब तक हम विकास नहीं कर पाएंगे...

प्रणव झा

Wednesday, 19 December 2012

शर्मिंदा हैं हम...


                                                  
हर बार की तरह फिर एक बार एनसीआर यानि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल गहरा गया जब रात के साढ़े नौ बजे चलती बस में एक महिला के साथ उसे पुरुष मित्र के सामने ही गैंग रेप की घटना को अंजाम दिया जाता है और उसके पुरुष मित्र को बुरी तरह से पीट कर दोनों को बस से फेंक दिया जाता है...।
हमारे समाज को शर्मसार कर देने वाली इस घटना से तथाकथित कई सवाल फिर से उठते है...जो कि हम सभी बखुबी जानते हैं...इस घटना के बाद प्रशासन पुलिस और सरकार तो सवाल के घेरे में आते ही है साथ ही हमारी समाजिक सोच और हमारे बदली परिस्थितियां भी घेरे में आती है..।
आज शहर में विकास की गति बहुत ही विकसित होती जा रही है...सड़क, बिल्डिंग से लेकर लोग भी विकास के तेज रफ्तार में हैं...पर इस रफ्तार के साथ जो लोग कदमताल नहीं कर पाते उनकी जमात भी इस शहर में कम नहीं...ये वो ही तबका है जो अपनी दिन रात की मेहनत से इस शहर के विकास को रफ्तार देते हैं...और शहर में रहने लायक मूलभूत सुविधा जुटा पाते हैं....शिक्षित होने बावजूद जब इन लोगों को अपने मानमुताबिक कम नहीं मिलता तो उन्हें ये अहसास होता है कि अगर हम शिक्षा विहिन होते तो बेहतर था...वो अपनी आमदनी और बढ़ेते महंगाई के साथ तालमेल नहीं कर पाते हैं....ऐसे युवा और ऐसे लोग दिन रात चिंताग्रस्त होते हैं और उनका मानिसक संतुलन बिगड़ता जाता है...। और तब ये वर्ग अपने आपको समाजिक और इंसानी कसौटी पर खुद को नहीं कस पाते...।
देश में आर्थिक और समाजिक असमानता जिस कदर अपना भीषण रूप ले रहा है उससे ऐसे तबको की संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है..। तनावग्रस्त होने के कारण ऐसा तबकों का आक्रमक और हिसंक होना लजमी है...। और मौका मिलते ही ये किसी भी अपराध को बिना सोचे समझे अंजाम दे सकते हैं...और होता भी ऐसे ही जिसका उदाहरण हमें समय समय पर दिखता रहता है...।
ऐसे घटनाओं के पीछे कुछ हद तक हमारे समाजिक सोच भी दोषी है..ये समस्या आज की नहीं है युगों युगों से चलती आ रही जिसकी गवाही हमें हमारा इतिहास देता है...। क्योंकि अगर हम प्रकारांतर से देखे तो हमारा समाज हमेंशा से पुरुष प्रधान रहा है और महिलाओं की भूमिका पर्दे की पीछे का रहा है...पर समय हालात बदतले गए और महिलाएं भी पर्दे के पीछे से निकलने लगी और आज समाज वो भी पुरुष के साथ कदमताल कर रही है...सब कुछ तो बदला पर हमारी अबसाद ग्रस्त मानसिकता नहीं बदली...कहने को तो हम महिलाओं को पूरी आजादी दे चुके है पर हम खुद ही उसके आजादी को लेकर पूरी तरह से आजाद नहीं हुए है...महिलाएं को तो हम समाजिक स्तर पर आजाद कर दिए पर मानसिक स्तर पर पहले से भी ज्यादा गुलाम बना रखे हैं..। आज भी जब कोई लड़की अपनी कक्षा में या कहीं भी बेहतर साबित होती है तो उससे जुड़े पुरुष वर्ग में एक रोस उत्पन होता है और वे अवचेतन मन से उसे नीचा दिखाने के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं...और ऐसी ही स्थिति में ये वर्ग अपने आप पर काबू नहीं रख पाते और आपराध की गंभिरता से परे होकर घटना को अंजाम दे बैठते हैं..।
दिल्ली और इससे सटे क्षेत्र में ये घटना कोई नई नहीं और ना ही चौकाने वाली बात है...अगर दिल्ली में पीछले एक साल से इस साल तक का आंकड़े देखे तो चौकाने वाली है 2011 से 2012 तक करीब दुष्कर्म जैसी 1150 से भी धिनौनी घटना को अपराधीयों ने अंजाम दिया..। ये आंकड़े तो सिर्फ एनसीआर की है ऐसे कितने ही आंकड़े हमारे देश के अन्य भाग में भी है जिसकी जानकारी से हम तक नहीं पहुंच पाती...। विडंबना ये है कि ये घटनाएं कम होने की वजय साल दर साल बढ़ती ही जा रही है..। ऐसी स्थिति में हम कैसे नारा बुलंद कर सकते हैं हमारे देश में महिलाएं सशक्त हो रही है...।
बलात्कार जैसे जघन्य अपराध जब दिल्ली जैसे हाईटेक शहर में होता है तो हताशा और भी बढ़ जाती है...क्योंकि जहां कानून व्यवस्था इस तरह चौकस है की एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता तमाम संसाधन आयोग संगठन यहां से ही काम करती है... वहां रात के साढ़े नौ बजे ही ऐसी शर्मनाक घटना घटती है कि लोग के जेहनियत में खौफ घर कर बैठता है...। तो देश के अन्य भाग का क्या होगा जहां कानून व्यवस्था का हाल खासता है...।
अब यहां सवाल यह है कि क्या हम इसी कुंठित मानसिकता के साथ समाज को आगे बढ़ाएगें...क्या हम महिलाओं की अधिकार के लिए सिर्फ जुबानी जंग ही करते रहेंगे..। या इसकी शुरूआत के लिए हम जमीनी तैर पर तैयार होंगे...।इस के लिए पहले हमें खुद का ही आत्म निरक्षण करना होगा...और हम जहां रहते है वहां से ही छोटे से छोटे अपराध को रोकना होगा...जो हमारे घर में हमारे आस पड़ोस रोज होता है...। जब तक हम महिलाओं की सुरक्षा के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे तब तक लाख आवाज उठाले जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हो सकता..। लिहाज पुरुष वर्ग को महिला के प्रति अपने नजरिए को बदलने की जरूरत है और जितनी जल्दी इसकी शुरूआत होगी, हमारे और हमारे समाज के लिए अच्छा होगा...।

प्रणव झा

Wednesday, 3 October 2012

मैं हिन्दी हूं....

मैं हिन्दी हूं
तुम्हारी पहचान,  संस्कृति
तुम्हारा संस्कार हूं
मैं हिन्दी हूं

तेरे घर में खाती हूं, खेलती हूं
जीती हूं
मैं ही तेरी सांस हूं
मैं हिन्दी हूं

पर आज मैं बीमार हूं
लाचार हूं
अपने घर में ही गुमनाम हूं
तेरी बेरुखी से. जड़ता से, खोखले पन से
मैं अतिरंजित हूं, विकल हूं
कुंठित हूं
मैं हिन्दी हूं

जिसके पीछे तूं दिवाना है, अंधा है
सब कुछ भूला है
वो तेरा नहीं
बेगाना है
मैं ही तेरी वजूद हूं, जमीर हूं
आधार हूं
मैं हिन्दी हूं...

तेरे इसी व्यवहार से, सोच से
मानसिकता से
मैं हतप्रभ हूं, छुब्द हूं
शर्मसार हूं
मैं हिन्दी हूं...

तूं मुझे पहचान
तुझे दुनिया पहचानेगी
यही श्वाशवत है, यतार्थ है
सर्वभौम है
मैं ही तेरी आन हूं, शान हूं
तुम्हारी पहचान हूं
मैं हिन्दी हूं... हिन्दी....

प्रणव झा

Saturday, 22 September 2012

असम की बिसात पर देश की अस्मिता

  
अगर आप के घर, गांव, शहर, यहां तक की देश में कोई बाहरी मुल्क से घुस जाए और आपके जमीन आपके खेत खलिहान आपके जिविका पर अपना हक जमाने लगे और आपको अपना ही घर शहर और देश बेगाना लगने लगे और आप आपने आप को आपने ही घर मुल्क में असुरक्षा के साए तले अपनी जिंदगी बसर करने को मजबूर हो तो आप क्या करेंगे...? आवाज उठाएंगे..आपनी मांग को सरकार के पास रखेंगे और जब आपकी समस्या का हल इन तरीको से नहीं होगी तो फिर आप मजबूर होकर अपनी समस्या का हल खुद ही सोचेंगे...और सोचना भी चाहिए...क्योंकि जब बात इंसान की जान पर बन जाए तो फिर ना तो उसे मरने का डर होता है और ना ही उसे किसी भी खतरे से...इस स्थिति में इंसान वो कर बैठता जो वो कभी सोच भी नहीं सकता...असम में लगी आग के पीछे की कहानी का भी इतिहास कुछ यही दास्तां बयां करती है...बोडो इलाके में एक दशक में ये चौथी बार ये हिंसात्मक और चिंताजनक वारदत है...पहली बार 1993 में यहां हिंसा भड़की...पर घटना का स्वरूप छोटा था...जिसे जल्दी ही काबू में कर लिया गया...लेकिन समस्या तब भी वही थी जो आज है...यहां के मूल निवासी आज भी अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं..और यही कराण है कि  वहां के लोगों का मन बार बार उद्वलित होता है...और मन में लगी आग की चिंगरा जब बाहर निकती है तो हाल की घटना को बार बार दोहराती है और इसी आग की धधक में वो लोग भी जलते हैं जिनका वस्ता दूर दूर तक इससे नहीं होता...जिसका उदाहरण हमें मुंबई के आजाद मैदान में देखने को मिल चुका है...जहां मीडिया और पुलिस के लोग अकारण ही इस चिंगारी का शिकार हो चुका...।1993 के बाद फिर से एक बार असम के बोडोलैंड के निवासी का गुस्सा 1996 में फूटा जिसका आकार और प्रकार पहले से कुछ ज्यादा ही गंभीर था...इसी तरह फिर से 1998 और 2003 में असम में आग लगी...लगातार घटती इस घटना से एक बात तो साफ हो चुका था कि यहां के लोगों में अब धैर्य खो चुके हैं...और अपनी हक की लड़ाई के लिए यहां के लड़को ने हथियार उठा लिया...और लड़ाई शुरू हो गई...जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा...फिर बोडो और सरकार के बीच एक समझौता हुआ...जिसमें बोडोलैंड को एक स्वायत जिला बनाया गया...तब वहां के लोगों को एक बार ऐसा लगा कि उनका वर्षों का सपना एक बार पूरा हो चुका है अब वो अपनी जमीन और जंगल का हम ही मालिक हैं...पर इनका ये सपना धीरे धीर टूटता गया और बिखर गया...और बेचारा बनने के लिए अभिशप्त हो गया...और यही बेचारगी उनके मन में एक टकराव की भावना को जन्म दिया...।
इस बार जिस तरिके से असम में हिंसा फैली और 70 से ज्यादा लोग मौत के आगोश में समा गये और हजारों लोग घर से बेघर हो कर शरणार्थी शिवर में अपना अश्राय लिए वो किसी सुनियोजित घटना नहीं थी वो उसी बेचारगी और बेगानगी से उपजी शोले की थी...जो पहले से ही सीने में दफन थी...।असम समस्या की बुनायाद में बोडो जनजातिय समुदाय और बंग्लादेश से आए मुस्लमानों के बीच जंगल जमीन पर कब्जे की होड़ है...और इसी टकराव की वजह से असम कई दशकों से जलती आ रही है...। सरकार जितना ही इस समस्या को सुलझाना चाहती उतना ही समस्या विकट होती जा रही है....क्योंकि असम के स्थाई नागरिक और फिरकापरस्त में पहचान करना ही सरकार के लिए समस्या बन गई है...। क्योंकि भारत का पूर्वोत्तर राज्य से जमीनी संबंध केवल असम के कोकराझाड़ जिले से ही है और वो भी पश्चिम बंगाल के बरास्ते बिहार से...। और इस एकमात्र जमीनी रास्ते से ही भारत के राष्ट्रीय एकता को खतरा है...भले ही बंग्लादेश से भारत को कोई ऐसी मानवीय खतरा नहीं है फिर भी असम में जो हाल की स्तिथि बनी है इसका अकेला जिम्मेदार तो सिर्फ यही रास्ता है...जो बंग्लादेश के बनने से पहले ही शुरू हुआ था और आज भी जारी है...।
अब इन तमाम समस्याओं के बीच खोजना ये है कि इन समस्याओं का हल क्या है आखिर क्यों 1993 से लेकर आज तक इस समस्या का अचूक हल नहीं निकाला गया...क्यों सरकार देश की अस्मिता के सवाल पर चुप्पी साधी बैठी है...। अगर सरकार सही मायने में देश को अखंड रखना चाहती है तो फिर इसे वही करना चाहिया जो उसने जम्मू कश्मीर मसले पर की थी राष्ट्रीय एकता परिषद की अपात बैठक...और 1971 के बाद आए घुसपैठियों को पहचाना जाए और उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाए...।
सरकार को राज्य सरकार के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक करनी चाहिए...हर छोटी बड़ी बिंदु पर एक मत होकर उसका हल निकालना चाहिए...। और राज्य सरकार को अपने प्रदेश के लोगों के बीच फिर से विश्वास बहाल करने के लिए बेहतर तरीके अपनाने चाहिए...और उसे आवश्यक सुविधा मुहैया करानी चाहिए...तभी कहीं जा कर असम और पूरे देश में एक शांति की लहर आएगी....।
प्रणव झा

एफडीआई - सही या गलत

               एफडीआई - सही या गलत
संसद में भारी हंगामा और यूपीए के धटक दलों को छोड़ कर करीब करीब हर सियासी दल के भारी विरोध के बाद भी कई सालों से लटका आफडीआई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में लाने का फैसला किया...जो एक साहसी कदम प्रधानमंत्री की ओर से उठाया गया...।
एफडीआई को लाने का फैसले के बाद पूरे देश में ताला लटका दिया गया...विपक्ष एक साथ आए और पूरे देश में बंद का नौटंकिया किया...इससे हासिल क्या हुआ? ये बाद कि बात है पर इस मुद्दे पर देश की सियासत में भारी उथल-पुथल मचा है...यूपीए के ही एक घटक दल तृणमूल कांग्रेस जिसकी अध्याक्षा ममता बनर्जी हैं उन्होंने कांग्रेस को फैसले पर विचार करने के लिए अल्टीमेटम तक दे दी और बाद में सर्त पर खड़े नहीं उतरने पर सरकार से अपनी भागीदारी वापस लेते हुए सरकार को अल्पमत में ला दिया...।
इन सब जिरह के बीच पहले हम ये जानते हैं कि एफडीआई है क्या बला?...आखिर इसके आने से  आम लोग और देश को क्या नफा नुकसान हो सकता है?...इसके नाम मात्र से ही क्यों सियासत के दोस्त दुश्मन की भाषा बोलने लगे? क्यों इस मत पर सभी सियासी दलों का मतभेद है...।
एफडीआई यानि खुदरा व्यापार के क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। जिससे खुदरा व्यापारी, ग्राहक और देश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर लाभ पहुंचेगा...जहां व्यापारियों को माल विक्राय संबंधी मामलों में लाभ होगा वहीं ग्रहकों को गुणवत्ता का लाभ होगा और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलगी...और देश सापिंग हब बन सकता है...खुदरा व्यापार का विस्तार होगा और उत्पादों के लिए उसकी मांग भी बढ़ेगी...बड़े शहरों में मध्य वर्ग के लोगों को खरिददारी का लाभ मिलेगा...ग्रहकों को किफायती कीमत पर बेहतरिन उत्पाद का लाभ मिलेगा... और देश की अर्थव्यवस्था में जान फुंकने वाले किसानों को बिचौलियों से मुक्ती मिलेगी और अपना समान सीधे बाजार तक पहुंचाएंगे और सही कीमत ले पाएंगे...विदेशी कंपनियों को कम से कम 30 फीसदी सामान भारतीए बाजार से ही खरिदना होगा जिससे लोगों को आय की समस्या कुछ हद तक दूर होगी...आज जो अन्न बाजार तक आते आते सड़ गल जाते है एफडीआई के आने से इस समस्या से निजात मिलेगी और सामान की सही कीमत भी मिलेगी...इन सब फायदो के बाद देश के विकास को भी रफ्तार मिलेगा...और विकास दर में भी सुधार होगा... जिसकी एक झलक हम दूरसंचार, वाहन और बीमा के क्षेत्र में हम देख सकते हैं...
इतना सब कुछ फायदे का होने के बाद फिर इस मुद्दे पर भारी असंतोष रहा है इसका मतलब क्या है...आखिर क्या अन्य सियासी दल नहीं चाहते की देश का हित हो क्या उनका इस फैसला का विरोध करना देश प्रेम को ठेंस पहुंचाना है क्या..? तो जानते हैं आखिर आफडीआई को लेकर इतनी मथापच्ची क्यों हैं क्यों इसपर भी सियासत की बिसात बिछाई जा रही है क्यों इस मुद्दे को सकारात्म की वजह नकारात्म लिया जा रहा है...क्यों हर नेता इस पर अपनी वाणी की बाण से एक दूसरे को घायल कर रह हैं...तो हम जानते हैं कि इसके पीछे का रहस्य क्या है...
भारत खुदरा कारोबार का देश रहा है यहां खुदरा बाजार ही बाजार की जान हैं और रोजगार का एक अनोखा साधन है खुदरा करोबार...गांव से लेकर शहर तक खुदरा बाजार एक अलग ही महत्व है...पर एफडीआई के आने के बाद खुदरा बाजार का अस्तित्व संकट में आ सकता है.. और जहां तक एफडीआई के विरोध का सवाल है तो इसके पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं...जो इस प्रकार हैं
एफडीआई का विरोध करने वाले कहते हैं कि खुदरा व्यापार में एफडीआई के आने से नौकरियां खत्म हो जाएगी और बेरोजगारी जो आग की तरह फैल रही है उसमें ये और घी डालने का काम करेगा...
एफडीआई के तहत लगने वाले सूपरमार्केट छोटे दुकान को निगल जाएंगे...जिसका जीता जागता सबूत हम यूरोप और अमेरिका के देशों में देख सकते हैं..
देश के जरूरी समानों पर विदेशी समानों का अकधिकार हो जाएगा..विदेशी कंपनियां सामान की कीमत को कम करके रखेंगे जिसका मुकाबले देसी सामान नहीं कर सकता जिससे देश में व्याप्त बेरोजगारी को एक और बल मिल जाएगा...
विदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार नहीं बल्कि बाजार पर कब्जा कर लेगी...जिसका असर 4 करोड़ लोगों पर पड़ेगा जो खुदरा बाजार से जुड़े हुए हैं...
देश में पहले से ही जिर्ण सिर्ण अवस्था में घरेलू उद्योग का अस्तित्व तक मिटा सकता है...जिससे उन लोगा का जीने का सहारा तक मिट जाएगा जिनका पेशा और रोजी रोटी का साधन भी यही है....
इन सब कारणों को अगर हम देखते हैं तो एफडीआई देश के लिए घातक हो सकता है...पर आज एफडीआई को लेकर कर जो देश में घामासान मचा है वो चिंता जनक ही नहीं बल्कि देश के लिए धातक भी हैं...पहले ही संसद का पूरा मॉनसुन सत्र हंगामें के भेंट चढ़ चुका है जिससे कई करोड़ रुपए का चुना देश को पहले ही लगा...अगर एफडीआई के कारण अगर मध्यविधि चुनाव होता हैं तो देश के खजाने को फिर से एक पलिता लगेगा...।
अगर एक बार हम इन मुद्दों से हट कर देश के बारे में सोचे तो ऐसा लगात है कि देश से तो किसी को मतबल है ही नहीं सबके सब अपनी जमीन को बचाने में लगे हुए हैं...देश का क्या होगा जनता का क्या होगा इसके बारे में किसी को सोच ही नहीं है एक के बाद एक मुद्दा बोतल में छुपे जीन की तरह निकला है और कुछ दिन तक अपना असर दिखा कर फिर से बोतल में बंद हो जाता है...।
अगर देश को बचाना है तो फिर से हमें ही सोचना होगा और पीछे की गई गलतियों से सबक लेना होगा...खुद जागना होगा और दूसरों को जगना होगा... की स्तिथि को बाकई में कैसे बेहतर बनाया जाय जिससे लोकतंत्र की स्मिता और हमारी अस्तित्व बची रहे...।
प्रणव झा

Sunday, 2 September 2012

मेरी मुहब्बत....एक इबादत

नकाम-ए-मोहब्बत /मुकाम-ए-मोहब्बत
बारिश की एक बूंद ने मुझे जला दिया
फिर तेरी याद ने मुझे भिंगा दिया
ये प्यार नहीं तो और क्या है...?
भरी जख्मों के दर्द को फिर से जगा दिया.....

मुहब्बत इंसान की जरूरत है अगर इंसान के अंदर से मुहब्बत मिट जाय तो इंसान का बजूद कुछ भी नहीं रह जाता.......। मुहब्बत के कई रूप होते हैं मुहब्बत इंसान से जानवर से निर्जीव से दरख्तों से जगहों से और हर किसी से भी हो सकता है....। प्यार में वो शक्ती है जो पाषाण को भी इंसान बना दे...। प्यार से दुनिया का हर चीज को जीता जा सकता है.....। प्यार इंसान को सोहब्त सिखाता है जीने का तरिका सिखाता है...प्यार इंसान को इंसान होने का अहसास दिलता है...प्यार तो भगवान का दुसरा रूप होता......। प्यार हर किसी को नसीब भी नहीं होता है.....प्यार तो किस्मत वालो के हाथों की लकीर होता है.............।
पर आज के जमाने जिस तरह से हर चीज का एक अलग मायने हो गया है उसी तरह प्यार को भी लोग को भी लोग एक दायरे में ला कर रख दिया है...और लोग प्यार शब्द को प्रियेसी का पर्यावाची मानने लगे हैं........।और प्यार का जिक्र होते है एक लड़की का खयाल तुरंत मेरे दिमाग में आ जाता है.....।
प्यार जो भी हो पर इतना तो है ही की जबतक इंसान को प्यार नहीं होता तब तक सही मायने में इंसान इंसान ही नहीं होता...इंसान अपना बजूद तभी समझ पाता है जब वो प्यार को समझता है....।प्यार में इतना दम होता है कि इंसान इसके बल पर बुलंदियों को चुम सकता है...पर तभी जब प्यार में निश्छलता हो साफगोई हो..और समर्पण हो...बिना समर्पण प्यार पूरा ही नहीं होता..।
जो लोग कहते है प्यार तो जिंदगी तबाह करता है तो मैं सोचता हूं ये प्यार है ही नहीं क्योंकि प्यार में हिंसा है ही नहीं प्यार तो बनाने के लिए होता है बिगाड़ने के लिए नहीं....।अगर प्यार में दिल टूटता भी है तो वो बर्बाद नहीं करता वो भी उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित ही करता....।
प्यार तो मैं भी किया.... दिल मेरा भी टूटा.... पर मैं बिगड़ैल और भंयकर आशिक का रूप नहीं ले सका....और तभी महसूस किया की प्यार तो सिर्फ समर्पण की वस्तु है......और आज भी मैं प्यार करता हूं उसी से जो मेरे सपनों को पहली बार रंगीन किया था.....उसी से जो पहली बार मेरे धड़कन की रफ्तार को तेज की थी..उसी से जो पहली बार मेरे दिलो दिमाग पर छा कर मेरे जीन का अंदाज बदली...उसी से जो पहली बार मुझे मुझे से मिलाया.....उसी से जो पहली बार मेरी आंखों को मंजील से दिदार करबाया....उसी से जिसकी इबादत मैं आज भी करता हूं...।
उसी प्यार के लिए दिल से कुछ आवाज निकली जो मैं लिख कर बयां कर दिया..........................।।।।।।।।।।।।।।।।।।।




मुहब्बत में ऐसा मुकाम आया
हाथ में राख दिल जला अया
जब मैने पूछा उस बेवफा से उसकी रजा,
उसने कहा मैं तो तेरे मोहब्बत को कब्र में दफना आया
मजबूर मैं, लाजार मैं
मैं भी उसकी दुनिया उसकी महफिल छोड़ा आया
उसकी दुनिया उसे मुबारक, मैं तो अपनी दुनिया ही उसे दे आया
लोग कहते थे मोहब्बत मत करना, पर मैं तो यह गुनाह कर आया
जब मैं यह सोचने बैठा कि मैं यह सब मैं क्या कर आया?
देखा जब मुड़कर पीछे
मेरे सारे अपने मुझ से दूर नजर आया
दिल जल रहा था आग की लपेट में जिंदगी थी...
पर एक खलिश थी अभी भी बाकी
जला दिल के कतरों में एक हिस्सा अभी भी था बाकी...
वक्त हर जख्म पर मरहम लगाता.....
समय ने अपना रुख बदला...
बचे दिल के हिस्से से एक आवाज आई
ऐ दिल-ए-नादान तेरा कुछ भी नहीं बिगड़ा
तूं फिजुल में अपने आंखों में आंसु लाया
और फिर
मेरी जिंदगी ने फिर एक नई करवट ली
फिर से ये दुनिया रंगीन दिखने लगी
हर चीज में फिर से एक चमक आने लगी
पैदा हुआ था जो करने को,
मेरी आंखों को उसकी बेवफाई ने मंजिल दिखाई
शुरू हुआ सफर मंजिल के लिए...
और
एक ठोकर में मंजिल पा लिया
फिर एक बार देखा मुड़कर पीछे
तो याद आया
मुहब्बत में ऐसा मुकाम आया
हर सांस में जिंदगी
और                                     
दिल से सारा जहां को पाया........................................।

अगर इंसान सोच ले तो क्या नहीं कर सकता...इस दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं ...लेकिन इंसान अपने फितरत के आगे मजबूर है वो हमेशा ही अपनी मजबूती को कमजोरी बनाया है....पाक मुहब्बत हमेशा ही हमें आगे बढ़ने कुछ करने के लिए प्रेरित करता है....किसी के दूर जाना या संपर्क में नहीं रहाना या उसका हमशे नहीं बोलना ही दिल टूटना नहीं है.....प्यार में दिल कभी टूट ही सकता....प्यार तो पूजा है और अगर पूजा निहस्वर्थ हो फिर परमात्मा की प्रप्ती होती हैं हम दुख तब पाते हैं जब हम कामना रखते हैं अगर कामना रहित प्यार हो तो फिर दिल तो कभी टूट ही नहीं सकता...।
प्यार करने के लिए होता है ना कि हम किसी पर हम थोपें...प्यार में ये नहीं हो सकता कि अगर हम किसी से प्यार करते हैं तो वो भी मुझ से प्यार करे...प्यार तो प्यार है थोपने के बाद यही दुख का कारण बनता है और इंसान अपनी दुनिया को तबाह कर लेता है....इस इस पवित्र शब्द पर एक काली स्याही लगता है और फिर वो सबसे कहता है...प्यार मत करना प्यार जिंदगी तबाह करता है...जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है...प्यार तो बस प्यार जो हमने किया बस प्यार किया प्यार किया....और प्यार किया....।

प्रणव झा

Tuesday, 14 August 2012

इस आज़ादी का मतलब क्या है?


आंखे सनी है लहू रंग में
रूह बदन की कांपी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..

तब था मुल्क में सोना चांदी
अब तो भ्रष्टाचारी हैं
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..

जब देश अंग्रेजों की पाश में
बंधा चीख चिल्लाता था
तब खून बहा मां के बेटों ने
पाश मुक्त करवाया था
कुछ भी याद नहीं इस मुल्क को
भूल गए वो यादें सारी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..
शहिदों की शहादत को भूला
सब, जगजाहिर है
आतंक भूख की साए में
सोती जनता सारी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..

क्या यही स्वाधिन हुए थे हम?
क्या यही हमारी आजादी है?
20 रुपए में चलती
हमारी दिन रात की पारी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..

सूख गए खेतों के पानी
सूखे वृक्षों की डाली है
तू भूल सिंहसन पर बैठो हो
ये तुम्हरी नहीं हमरी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..

शंख नाद समय का फिर से सुनो
भूडोल बवंडर उठने वाला है
होगा फिर से राजतिलक
जागी अबाम अब सारी है
इस आजादी का मतलब क्या है?
जो सांस पे भी भारी है..
जो सांस पे भी भारी है..