भारत विविधताओं का
देश है...यहां अनेक प्रकार के धर्म, वर्ण, जाति, परंपरा और अनेक संस्कृति का समभाव
है...जब यहां रहनेवालों में इतनी विविधता है तो लाजमी है यहां के लोगों की आपसी
बोलचाल की भाषाओं में भी विविधता होगी ही...।
और यहां भाषा में
ऐसी विविधता है कि हर जिले के हर गांव की बोलचाल की भाषाओं में अंतर हो जाती
है...इतनी विविधता के बावजूद हम एक हैं अखंड हैं संप्रभू हैं...इस अखंडता और एकता
को जोड़ने का काम हिन्दी करती है जो कि हमारी राष्ट्रभाषा है और इसी से हमारी पहचान
भी हैं...। पर विडंवना यह है कि एक अरब से भी ज्यादा लोगों की भाषा होने के बावजूद
अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिन्दी को पहचान नहीं मिल सकी...।
हिन्दी दुनिया में
सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर है फिर भी ये अभी तक गुमनाम
है..क्यों? क्योंकि हमारे देश में ही समय-समय पर हिन्दी को
लेकर जो अभिव्यक्ति आती रहती है वो हमें और कुंठित करती है और हिन्दी के अस्मिता
को आधात करती है...। अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो कर रहा गई है...और हिन्दी
बोलने वाले को हीन दृष्टी से देखा जाता है...देश के कई ऐसे स्कूल कॉलेज हैं जहां
हिन्दी बोलने पर पावंधी है और अगर कोई गलती से हिन्दी बोलता है तो बकायदा उसे सजा
दी जाती है...।
अगर इसी तरह से
हमारे आने वाले भविष्य के सामने हिन्दी की छवि को प्रस्तुत किया जाएगा तो हिन्दी
की दशा आने वाले समय में बद से बदत्तर हो जाएगी...और फिरंगियों की बात फिर से सही
होगी की एक दिन हिन्दुस्तानी हिन्दी को भूल जाएंगे और हमारी भाषा का फिर से गुलाम
हो जाएंगे...।
अगर सही मायने में
हमें हिन्दी का विकास के बारे में सोचना है तो सबसे पहले हमें इस तरह की कुंठा से
बाहर निकलना पड़गे और नए जोश, उत्साह के साथ हिन्दी के स्वरूप को अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर प्रचार प्रसार करना होगा...।
1975 वर्धा से चल कर
2012 में जोहान्सबर्ग तक का जो हमारा सफर रहा उस सफर में हमारा एक ही लक्ष्य रहा
की एक अरबों से भी ज्यादा लोगों द्वारा बोलीजाने वाली भाषा को संयुक्त राष्ट्र संध
में आधिकारीक भाषा का दर्जा दिलाना..। इन सैंतीस साल में आठ ऐसे सम्मेलन हो चुके
है और इन सम्मलनों में कई अहम फैसले लिए गए पर कभी हमने सोचा है इन सम्मेलनों से
हमें क्या लाभ-हानि हुए हैं...उन प्रस्तावों का क्या हुआ जो इन सम्मेलन में पारित
किए गए...क्या ये सम्मेलन अपने मूल लक्ष्य पाने में कुछ भी कदम आगे बढ़ पाए या
वहीं के वहीं बस खड़े हैं जहां शुरूआत किए थें...। इन तमाम प्रश्नों का उत्तर हम अपने अंदर झांकते हैं तो पता चलता है...।विडंबना
यह है कि हम अपना काम भी अपनी भाषा में नहीं करते हैं तमाम सरकारी काम अंग्रेजी में
होता यहां तक की हमारे जो निजाम हैं वो हिन्दी बोल भी नहीं पाते...ज्ञान-विज्ञान
की क्षेत्र की तो बात ही नहीं करे यहां लोगों को हिन्दी की बोली ही अज्ञानता का
प्रतिक सा लगता है...। स्कूल-कॉलेज में तो इस भाषा को अध्ययन-अध्यापन में अक्षम
बताया जाता है...। पर ऐसा नहीं कि लोग इसके प्रति जागृत नहीं हैं जब कभी भी हिन्दी
के विकास के लिए ऐसे मंच की बात की जाती है तो हिन्दी के ठेकेदारों की जमात खड़ी
हो जाती है और वो इस कार्य को अपने ऊपर उठाने की तैयार रहते हैं...। विदेश
मंत्रालय हर साल विश्वविध्यलयों, अकादमियों और राज्य सरकारों से इन सम्मेलन में
जाने के लिए अपने प्रतिनिधियों का नाम मांगता है...और काई सारे नाम भी आते है पर
इस प्रतिनिधियों में से कौन इस सम्मेलन में भाग लेने के योग्य है कौन नहीं इसके
चयन के लिए कोई सर्वमान्य प्रक्रिया नहीं है...इस सम्मेलन के नाम पर कई नेता कई
बार विदेशों के सैर करते रहें...।
इन सब के बीच भी
यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि अभी तक हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध में औपचारिक
रूप से भाष का दर्जा क्यों नहीं दिया गया..जबकि संयुक्त राष्ट्र संध की ओर से ये
तर्क दी गई थी कि अगर 22 देशों में 20 करोड़ लोग इस भाषा को बोलते हों तो अगर ऐसा
देखा जाइ तो अकेले भारत में ही 35 करोड़ लोग हिन्दी में ही अपन जिंदगी को गति देते
हैं...अगर हम विदेशी की बात छोड़ भी दें तो ये अरबी भाषा जिसे संयुक्त राष्ट्र संध
में अधिकारिक रूप दी गई है, के मुकाबले में बीस ही पड़ता है...लेकिन हम तो संतोषम
परम् सुखम में विश्वास रखते हैं...हमारे प्रधानमंत्री कभी हिन्दी में संयुक्त
राष्ट्र संध की महासभा में भाषण देते हैं और न्यूयार्क में आंठवे विश्व हिन्दी
सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संध के महासचिव बान की मून संबोधन में ‘नमस्ते’ कर देता है
और हमें क्या चाहिए...।
पर हमें हकिकत भी
जानना बहुत जरूरी है..जिस संयुक्त राष्ट्र संध में अधिकारिक भाषा का दिलने के लिए
हम कई दशकों से लड़ाई लड़ रहे हैं उस में विदेश मंत्रालय की क्या कोशिश रही है
क्योंकि हम बिना विदेश मंत्रालय की भूमिका के बिना हिन्दी को अपना हक नहीं मिल सकता..। और वहां की
अफसरसाही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा है और बची खुची कसर को राजनीति पूरा कर देता
है...। हर बार यही बहाना बनाया जाता है कि अगर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संध की
भाषा बनाया गया तो इसके लिए भारत को भारी रकम देनी होगी...पर जब भारत युरोजोन को
आर्थिक संकट से उबरने के लिए दस अरब डॉलर की सहायता दे सकता है और हाल घपले धोटालों को देखा जाए तो ये दलिल कही
पानी भरता नजर आता है...तो अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की संरक्षण को
लिए संयुक्त राष्ट्र संध को रकम नहीं दे सकता...जाहिर सी बात है अगर इस सवाल का
उत्तर हम देते हैं तभी कहीं इन सम्मेलन का सार्थकता महत्व हो सकता है...।
अगर हम अपना और इस
राष्ट्र का विकास जाहते हैं तो हमें अपनी पहचान को बनानी होगी तभी कहीं हम विकास
को सही रास्तों परा ला सकते हैं..आज हमारा पड़ोसी देश चीन विकास के मामले में हम
से आगे क्यों हैं क्योंकि उसकी अपनी पहचान है उसकी भाषा... चाहे कोई विदेशी कंपनी
हो या देसी वहां हर काम चाइनीज भाषा में ही होता है..। अत: हमे भी अपनी पहचान के लिए जागना होगा...जब तक
हमारी भाषा को पहचान नहीं मिलेगी तब तक हम विकास नहीं कर पाएंगे...
प्रणव झा
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