हर
बार की तरह फिर एक बार एनसीआर यानि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं की
सुरक्षा को लेकर सवाल गहरा गया जब रात के साढ़े नौ बजे चलती बस में एक महिला के
साथ उसे पुरुष मित्र के सामने ही गैंग रेप की घटना को अंजाम दिया जाता है और उसके
पुरुष मित्र को बुरी तरह से पीट कर दोनों को बस से फेंक दिया जाता है...।
हमारे
समाज को शर्मसार कर देने वाली इस घटना से तथाकथित कई सवाल फिर से उठते है...जो कि
हम सभी बखुबी जानते हैं...इस घटना के बाद प्रशासन पुलिस और सरकार तो सवाल के घेरे
में आते ही है साथ ही हमारी समाजिक सोच और हमारे बदली परिस्थितियां भी घेरे में
आती है..।
आज
शहर में विकास की गति बहुत ही विकसित होती जा रही है...सड़क, बिल्डिंग से लेकर लोग
भी विकास के तेज रफ्तार में हैं...पर इस रफ्तार के साथ जो लोग कदमताल नहीं कर पाते
उनकी जमात भी इस शहर में कम नहीं...ये वो ही तबका है जो अपनी दिन रात की मेहनत से
इस शहर के विकास को रफ्तार देते हैं...और शहर में रहने लायक मूलभूत सुविधा जुटा
पाते हैं....शिक्षित होने बावजूद जब इन लोगों को अपने मानमुताबिक कम नहीं मिलता तो
उन्हें ये अहसास होता है कि अगर हम शिक्षा विहिन होते तो बेहतर था...वो अपनी आमदनी
और बढ़ेते महंगाई के साथ तालमेल नहीं कर पाते हैं....ऐसे युवा और ऐसे लोग दिन रात
चिंताग्रस्त होते हैं और उनका मानिसक संतुलन बिगड़ता जाता है...। और तब ये वर्ग
अपने आपको समाजिक और इंसानी कसौटी पर खुद को नहीं कस पाते...।
देश
में आर्थिक और समाजिक असमानता जिस कदर अपना भीषण रूप ले रहा है उससे ऐसे तबको की
संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है..। तनावग्रस्त होने के कारण ऐसा तबकों का आक्रमक
और हिसंक होना लजमी है...। और मौका मिलते ही ये किसी भी अपराध को बिना सोचे समझे
अंजाम दे सकते हैं...और होता भी ऐसे ही जिसका उदाहरण हमें समय समय पर दिखता रहता
है...।
ऐसे
घटनाओं के पीछे कुछ हद तक हमारे समाजिक सोच भी दोषी है..ये समस्या आज की नहीं है
युगों युगों से चलती आ रही जिसकी गवाही हमें हमारा इतिहास देता है...। क्योंकि अगर
हम प्रकारांतर से देखे तो हमारा समाज हमेंशा से पुरुष प्रधान रहा है और महिलाओं की
भूमिका पर्दे की पीछे का रहा है...पर समय हालात बदतले गए और महिलाएं भी पर्दे के
पीछे से निकलने लगी और आज समाज वो भी पुरुष के साथ कदमताल कर रही है...सब कुछ तो
बदला पर हमारी अबसाद ग्रस्त मानसिकता नहीं बदली...कहने को तो हम महिलाओं को पूरी
आजादी दे चुके है पर हम खुद ही उसके आजादी को लेकर पूरी तरह से आजाद नहीं हुए
है...महिलाएं को तो हम समाजिक स्तर पर आजाद कर दिए पर मानसिक स्तर पर पहले से भी
ज्यादा गुलाम बना रखे हैं..। आज भी जब कोई लड़की अपनी कक्षा में या कहीं भी बेहतर
साबित होती है तो उससे जुड़े पुरुष वर्ग में एक रोस उत्पन होता है और वे अवचेतन मन
से उसे नीचा दिखाने के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं...और ऐसी ही स्थिति में
ये वर्ग अपने आप पर काबू नहीं रख पाते और आपराध की गंभिरता से परे होकर घटना को
अंजाम दे बैठते हैं..।
दिल्ली
और इससे सटे क्षेत्र में ये घटना कोई नई नहीं और ना ही चौकाने वाली बात है...अगर
दिल्ली में पीछले एक साल से इस साल तक का आंकड़े देखे तो चौकाने वाली है 2011 से
2012 तक करीब दुष्कर्म जैसी 1150 से भी धिनौनी घटना को अपराधीयों ने अंजाम दिया..।
ये आंकड़े तो सिर्फ एनसीआर की है ऐसे कितने ही आंकड़े हमारे देश के अन्य भाग में
भी है जिसकी जानकारी से हम तक नहीं पहुंच पाती...। विडंबना ये है कि ये घटनाएं कम
होने की वजय साल दर साल बढ़ती ही जा रही है..। ऐसी स्थिति में हम कैसे नारा बुलंद
कर सकते हैं हमारे देश में महिलाएं सशक्त हो रही है...।
बलात्कार
जैसे जघन्य अपराध जब दिल्ली जैसे हाईटेक शहर में होता है तो हताशा और भी बढ़ जाती
है...क्योंकि जहां कानून व्यवस्था इस तरह चौकस है की एक परिंदा भी पर नहीं मार
सकता तमाम संसाधन आयोग संगठन यहां से ही काम करती है... वहां रात के साढ़े नौ बजे
ही ऐसी शर्मनाक घटना घटती है कि लोग के जेहनियत में खौफ घर कर बैठता है...। तो देश
के अन्य भाग का क्या होगा जहां कानून व्यवस्था का हाल खासता है...।
अब
यहां सवाल यह है कि क्या हम इसी कुंठित मानसिकता के साथ समाज को आगे
बढ़ाएगें...क्या हम महिलाओं की अधिकार के लिए सिर्फ जुबानी जंग ही करते रहेंगे..।
या इसकी शुरूआत के लिए हम जमीनी तैर पर तैयार होंगे...।इस के लिए पहले हमें खुद का
ही आत्म निरक्षण करना होगा...और हम जहां रहते है वहां से ही छोटे से छोटे अपराध को
रोकना होगा...जो हमारे घर में हमारे आस पड़ोस रोज होता है...। जब तक हम महिलाओं की
सुरक्षा के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होंगे तब तक लाख आवाज उठाले जमीनी स्तर
पर कुछ नहीं हो सकता..। लिहाज पुरुष वर्ग को महिला के प्रति अपने नजरिए को बदलने
की जरूरत है और जितनी जल्दी इसकी शुरूआत होगी, हमारे और हमारे समाज के लिए अच्छा
होगा...।
प्रणव झा
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