Monday, 28 July 2014

हमने रोते देखा है...





कौन कहता है कि आसमां ही रोता है जमीं के लिए
हमने तो इतिहास के बिसात पर वक्त को रोते देखा है

तुम तो तोड़ देते हो उस फूल को जो तुम्हें सुकूं देता है
हमने उस फूल के साथ शाखों को रोते देखा है

कौन कहता है कि पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
हमने उस स्याह रात में पहाड़ों को रोते देखा है         (उत्तराखंड की वो आफत की रात)

मजहब के अंध में जब जब काफूर होता रहा है जज्बात
वक्त की सौगंध हमने इस मुल्क को बहुत रोते देखा है

रिश्तों की डोर पर कई बार जख्मी हुआ दिल
कटी डोर में हाथ लिए हमने मांझी को रोते देखा है

जिस्म के चीथड़ों को बेबसी ही सिलती रहेगी
आबरू के दामन में हमने रूह को रोते देखा है

लाशों का भी कलेजा फट जाए तेरी हैबानियत देख कर
खुदा कसम तेरी इस करतूत पर हमने भगवान को भी रोते देखा है

Pranav jha

Saturday, 26 July 2014

दंगा क्या होता है?





दंगा क्या होता है?
दंगा शब्द अपने आप में ही कांपती लब्जों से निकलती एक संप्रदायिक कहानी है। धर्मअंधता की हद की लकीर के परे एक अंधविश्वास की काली दुनिया है। जहां इंसानियत मर जाती है और वैहिसियत का परचम लहराता है।

किसी मुल्क में दंगा क्यों होता है?
किसी मुल्क में दंगा होने के लिए इंसानी जरूरत से जुड़ी किसी भी चीज की जरूरत नहीं होती है। लेकिन तब जब हमारे समाज के बीच में कौम नाम के शब्दों से लकीर खींची जाती है और मजहब को इंसानियत से ऊपर रखा जाता है, तब होता है दंगा। जब खुदा या भगवान इंसान के अंदर से निकल कर मंदिर और मस्जिद में चले जाते हैं तब होता है दंगा, जब मजहब पर सियासत हावी हो जाता है और इंसान को तकसीम कर कौम का रूप दिया जाता है तब होता है दंगा।

जब यूपी के कांठ इलाके के एक मंदिर से लाउडस्पिकर उतार गया तो पुलिस और स्थानिय लोगों के बीच विवाद हुआ। लेकिन इस छोटे से विवाद को खून खराबे में तबदील करने के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी बखुबी उपस्थिति दर्ज करबाई और इस मुद्दे पर महापंचायत की घोषणा कर दी पर जब महापंचायत को रोक दिया गया तो नाराज लोगों की पुलिस से भिड़ंत हुई और झड़प में जिलाधिकारी की आंख में चोट लग गई।

यूपी के ही सहारनपुर में कुतुबशेर इलाके में गुरुद्वारे की जमीन को लेकर दो अल्पसंख्यक समुदायों में जमकर खूनी संघर्ष हुआ और इस संघर्ष में दो लोगों की मौत हो गई।

खैर, हम मौत का हिसाब नहीं करेंगे अगर मौत का हिसाब करने बैठेंगे तो इस मुल्क में जिंदगी जीने के लिए वक्त नहीं मिलेगा। क्योंकि इस मुल्क कि हर दीवार पर मौत की इबारत लिखी है और जिंदगी कहीं किसी कोने में खूंटी से टंग रही है।
हिंदुस्तान का इतिहास अगर अपने आप पर कभी रोता है तो वो गोधरा की रेलवे लाइन पर, रात को भागलपुर में गंगा की छार पर, अयोध्या के भूमि पर, सावन के ठंडक फूहारों के बीच जलता मुजफ्फरनगर के सीन पर। फेहरिस्त लंबी है याद नहीं करना चाहते नहीं तो ठठकी आंखों से आंसू नहीं अंगार निकलेंगे।
ऐसा क्यों होता है कि हर बार इंसान की जज्वात को तक्सीम कर खून का नया समंदर बनाया जाता है और उसी समंदर पर फिर से सियासत का नया ककहरा लिखते हैं। लाशों की ढ़ेर पर सिंहासन लगाते हैं और भूख की आग से चिता जलाते हैं।

क्या दंगा रुक पाएगा इस मुल्क में?
मैं उत्तर प्रदेश के महामहीम अजीज कुरैशी नहीं हूं कि कहूंगा कि यूपी में अगर भगवान भी उतर आए तो रेप नहीं रुक सकता लेकिन एक बात हैं कि अगर भगवान उतर कर ये कह दे कि मेरी कोई जात नहीं और ना ही कोई मजहब तो शायद कोई मंदिर नहीं बनेगा जहां से लाउडस्पिकर उतार जाए या फिर को किसी मस्जिद को लेकर विवाद होगा और राम रहीम के नाम पर किसी ट्रेन में आग नहीं लग पाएगी।

जब तक इंसानी धर्म से ऊपर मजहबी धर्म नहीं होगा तब तक दंगा नहीं बंद होगा। जब तक इस मुल्क का रंग एक नहीं होगा जात एक नहीं होगी तब हिंदुस्तान रोता रहेगा और उसके आंसू पर सियासतदां सियासत करते रहेंगे।

हम तो आशावादी है आशा करते हैं और करते रहेंगे कि फिर एक सूरज पूरब से निकलेगा जिसका कोई धर्म नहीं होगा और ना ही कोई मजहब। तब जा के इस धरा पर फिर से सहर होगी है शांति होगी

Monday, 21 July 2014

हिंदुस्तान तेरे सीने में कितना दर्द है!





पता चला कि लखनऊ के मोहनलालगंज के इंस्पेक्टर कमरुद्दीन खान सस्पेंड कर दिए गए और साथ में एसआई मुन्नीलाल को भी अपदस्त कर दिया गया। सही मायनो में काबिलेतारीफ हैं। अखिलेश यादव, इतना क्वीक एक्शन!

शायद आप भी सोच रहे होंगे कि ये सब क्या है? जी, क्या करें अब तो बस ऐसा ही है, क्योंकि अब मन में भवनाओं के लिए जगह नहीं है मर चुकी संवेदना पूरी तरह से। हां, मरे भी क्यों नहीं इलाज नहीं होगी तो असमय मौत तो आती ही है ना।

अब आंख में आंसू भी नहीं है कि आंसू बहा कर दिल हल्का कर लेते। क्योंकि लखनऊ के मोहनलालगंज में जिस वारदात को अमानुषों ने मुक्मल किया है उसे देखने और सुनने के बाद शून्य की स्थिति में चला गया हूं।

हम पूजा इबादत और विश इस लिए करते हैं क्योंकि अदृष्य शक्तियों से हम बच सके जिसका समाना हम नहीं कर सकते क्योंकि वो दिखाई नहीं देती है। पर अब ऐसा नहीं है हमारे समाज में ही इतने असूर पैदा ले लिए की अब किसी की पूजा इबादत की जरूरत ही नहीं, वो अब हमारे आंखों के सामने आकर हमारी आत्मा पर वार कर के हमें मरने से पहले सौ बार मार कर जिंदा हमारी आंखों के सामने रहते हैं फिर भी हम गूंगे बहरे और अपाहिज कि तरह बस मन मसोस कर जिंदा लाश बन सिसकते रहते हैं।

बदायूं का पेड़ आज भी अपना सीना फाड़े चितकार कर ही रहा है कि लखनऊ के एक विद्या का मंदिर का आबरू बेआबरू हो गया। जहां 4-5 वहशियों ने गैंगरेप के दौरान युवती को डंडे से जमकर पीटा। गैंगरेप के बाद डंडे को उसके प्राइवेट पार्ट्स में डालकर घुमा दिया। युवती के सिर, गर्दन, पीठ और चेहरे पर 12 चोटें मिली हैं और अत्याधिक खून बहजाने से उसकी मौत हो गई। साथ ही उसकी निर्वस्त्र लाश को झाड़ी में फेंक दिया।

अखिलेश जी पता तो चला ही होगा, हां तभी तो दो लोग सस्पेंड कर दिए गए। हो गया आपका काम, अब आप रात में आराम से सो जाइएगा। हिसाब तो कर दिए आप!

उस स्कूल की सरस्वती भी मूंह छुपा कर भाग गई और वहां कि धरती भी उस युवती के जिस्म से निकले खून को अपने कोख के अंदर ले ली। वो सूख गया अब। पर वो जमीन खामोश है क्योंकि वो रो नहीं सकती वो चीख नहीं सकती और ना ही अपने सीने की फाड़ को दिखा सकती है। अपनी बेटी की साथ तो वो भी मर गई क्योंकि जिस मां के सीने पर उसकी बेटी के साथ हैवानियत का नंगा नाच हुआ हो वो मां कैसे जिंदा रह सकती है?

ऐसा क्यों हो रहा है अखिलेश जी आप के रियासत में? क्यों नहीं छोड़ देते आप सियासत जहां आप अपने रियाया की जान की छोड़िए आन की भी रक्षा नहीं कर सकते। जहां इज्जत बाजारू और सिसायत शान समझी जाती है क्यों नहीं आप को शर्म आती है।
दिक्कार है,

आज हिंदुस्तान के इतिहास की आंखे कभी नहीं सूखती होगी जहां सभ्यता पहचान और मानवता धर्म हुआ करता था। आज कहां जा के छिप गए हैं संस्कृति के ठेकेदार? कहां जिंदा लाश बन कर घूम रहे हैं समाजवादी। वाह रे समाजवाद...!

ये वहीं हिंदुस्तान है ना, जहां दुर्गा को पूजते हैं, लक्ष्मी की अरधाना करते हैं, जहां सरस्वती को देवी कहते हैं और औरत को शक्ति। शर्म आती है हिंदुस्तान के इस बदकिस्मत हकीकत पर!  धिक्कार है ऐसे समाजवाद पर, धिक्कार है ऐसी संस्कृति पर.....।

Thursday, 17 July 2014

हम पत्रकार हैं इसलिए शर्मशार हैं...।




सईद से मिले तो पत्रकारीता के उसूलों को रसूलों से जोड़े जाने लगा। कहा भी गया कि आंतकवादी से मिल कर आया है देश से निकाल दो। देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। कश्मीर पर जब पूछा गया तो कहे कि आजाद कश्मीर होना चाहिए। संसद में बखेरा खड़ा हो गया तो सड़क भी शांत नहीं रहा नरेबाजी और परंपरागत पुतलों का दहन हो गया। टीवी पर ब्रेकिंग एक के बाद एक तेजी से वाइप करने लगी। इतिहास खंगालने के लिए गूगल पर लगातार किल्क कर कई विंडों में वेद प्रताप पर रिसर्च शुरू हो गया। उधर नेतृत्वहीन विपक्ष भी दबी आवाज में भाजपाई होने और सत्ता पक्ष की समझी बुझी रणनीति का हवाला देनी लगी। 

लेकिन हो क्या जाएगा इन सब से..। 3-4 दिन का ब्रेक..। फिर कोई और....। कश्मीर भी वहीं है जहां वर्षों से था मुद्दें भी वहीं है जहां सालों से थे...। और उधर हाफिज सईद भी वहीं से आंख दिखा रहा है जहां से वो हमेशा दिखाता रहा है...। मुंबई आज भी वहीं सर झुका कर खड़ी है गुनाहों का हिसाब करने वाला आज तक नहीं आया। मातम भी अब मौन हो गया है कब तक आंसू बहता बेचारा चुप हो गया है। ना आशा है और ना ही इरादा अगर है तो बस तमाशा।

सुबह से लेकर कर बुझती शाम तक अगर कुछ होता है तो बस एक छलावा। मातम उदासी पर सियासत। चाहे इसके लिए इन लोगों को सड़क मिले या संसद। हर दिन एक जवान शहीद हो जाता है ताकि जिंदा रहे हिंदुस्तान पर हिंदुस्तान को पता नहीं की शहीद होने से बस शहीद को सुकून मिलता है बाकि पीछे छूटी जिंदगी को कोई नहीं देखता, नहीं देखता है खामोश रात में बेजूबान चीखती आंखों को। तड़पती जिंदगी और काले भविष्य को।

टीवी पर नहीं चलती है ये खबरें क्योंकि कोई देखना नहीं चाहता। क्योंकि इससे टीआरपी नहीं आती। पेपर के एक छोटे कोने में छपती है खबर जहां तक निगाहें बहुत मुश्किल से पहुंच पाती है।
हर दिन एक बेटी की आबरू बेआबरू होती है। समाज ट्रेडिशन के नाम पर मोमबत्तियां जलाते हैं, शोक गीत गाते हैं और घर जा के आराम से सो जाते हैं। लेकिन जलती वो सैकड़ों मोमबत्तियों की लव उस घर में उजाला नहीं कर पाती जिसकी बेटी की इज्जत लूट कर उसे पेड़ पर लटाका कर मार दिया जाता है। जहां एक औरत को सरेआम निर्वस्त्र कर उसके बदन पर सौ कोड़े मारे जाते हैं। समाज तो सो रहा होता है पर उस घर में नींद कभी नहीं आती जिसकी बेटी को पंचायत 12 लोगों से रेप करवाने का फैसला सूनाता है। हैं होता है ये सब इस मुल्क में होता रहेगा।

मेरा भारत महान है बहुत बड़ देश हैं यहां इंसान की पहचान नहीं हैं यहां पहचान है धर्म का, जात की, रंग का। मजहब हम से नहीं है हम मजहब से हैं ये मैं नहीं कहता हूं ये कहता है इस मुल्क का बदकिस्म हिस्सा गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, असम, छत्तीसगढ़ और कितने नाम बताऊं नाम याद नहीं करना चाहता क्योंकि इन सुबों के दिल में इनता मजहबी दर्द है कि इस दर्द से कई पाकिस्तान बन जाएगा। लेकिन हम भी बिजनेस करते हैं ना पैसा सबसे बड़ा होता है। हम तो बस वही दिखाएंगे वही पढ़एंगे जिसे आप ना चाहते हुए भी पढ़ने और देखने पर मजबूर हो।

वेद प्रताप वैदिक की कहानी को तो देश न चाहते हुए भी जान गया पर जो जिसे जानने से रूह कांप जाएगी वो सच्चाई हम नहीं दिखाएंगे क्योंकि इस सच्चाई से हमें टीआरपी अच्छी नहीं मिलेगी। हम आप को नहीं दिखाएंगे महानगरों में जमिंनदोज होती इमारतों का सच हम नहीं बताएंगे इमारत के नीचे दब कर मर जाने के बाद मरने वाले लोगों के परिवारों की जिंदगी। नहीं दिखाएंगे....क्योंकि हमें टीआरपी नहीं मिलेगी और टीआरपी नहीं मिलेगी तो हम व्यापार नहीं कर पाएगें...।  हम पत्रकार हैं इसलिए शर्मशार हैं...।