सईद से मिले तो पत्रकारीता के उसूलों को रसूलों से जोड़े जाने लगा। कहा भी गया
कि आंतकवादी से मिल कर आया है देश से निकाल दो। देश में रहने का कोई अधिकार नहीं
है। कश्मीर पर जब पूछा गया तो कहे कि आजाद कश्मीर होना चाहिए। संसद में बखेरा खड़ा
हो गया तो सड़क भी शांत नहीं रहा नरेबाजी और परंपरागत पुतलों का दहन हो गया। टीवी
पर ब्रेकिंग एक के बाद एक तेजी से वाइप करने लगी। इतिहास खंगालने के लिए गूगल पर
लगातार किल्क कर कई विंडों में वेद प्रताप पर रिसर्च शुरू हो गया। उधर नेतृत्वहीन
विपक्ष भी दबी आवाज में भाजपाई होने और सत्ता पक्ष की समझी बुझी रणनीति का हवाला
देनी लगी।
लेकिन हो क्या जाएगा इन सब से..। 3-4 दिन का ब्रेक..। फिर कोई और....। कश्मीर
भी वहीं है जहां वर्षों से था मुद्दें भी वहीं है जहां सालों से थे...। और उधर
हाफिज सईद भी वहीं से आंख दिखा रहा है जहां से वो हमेशा दिखाता रहा है...। मुंबई
आज भी वहीं सर झुका कर खड़ी है गुनाहों का हिसाब करने वाला आज तक नहीं आया। मातम
भी अब मौन हो गया है कब तक आंसू बहता बेचारा चुप हो गया है। ना आशा है और ना ही
इरादा अगर है तो बस तमाशा।
सुबह से लेकर कर बुझती शाम तक अगर कुछ होता है तो बस एक छलावा। मातम उदासी पर
सियासत। चाहे इसके लिए इन लोगों को सड़क मिले या संसद। हर दिन एक जवान शहीद हो
जाता है ताकि जिंदा रहे हिंदुस्तान पर हिंदुस्तान को पता नहीं की शहीद होने से बस
शहीद को सुकून मिलता है बाकि पीछे छूटी जिंदगी को कोई नहीं देखता, नहीं देखता है
खामोश रात में बेजूबान चीखती आंखों को। तड़पती जिंदगी और काले भविष्य को।
टीवी पर नहीं चलती है ये खबरें क्योंकि कोई देखना नहीं चाहता। क्योंकि इससे
टीआरपी नहीं आती। पेपर के एक छोटे कोने में छपती है खबर जहां तक निगाहें बहुत
मुश्किल से पहुंच पाती है।
हर दिन एक बेटी की आबरू बेआबरू होती है। समाज ट्रेडिशन के नाम पर मोमबत्तियां
जलाते हैं, शोक गीत गाते हैं और घर जा के आराम से सो जाते हैं। लेकिन जलती वो
सैकड़ों मोमबत्तियों की लव उस घर में उजाला नहीं कर पाती जिसकी बेटी की इज्जत लूट
कर उसे पेड़ पर लटाका कर मार दिया जाता है। जहां एक औरत को सरेआम निर्वस्त्र कर
उसके बदन पर सौ कोड़े मारे जाते हैं। समाज तो सो रहा होता है पर उस घर में नींद
कभी नहीं आती जिसकी बेटी को पंचायत 12 लोगों से रेप करवाने का फैसला सूनाता है।
हैं होता है ये सब इस मुल्क में होता रहेगा।
मेरा भारत महान है बहुत बड़ देश हैं यहां इंसान की पहचान नहीं हैं यहां पहचान
है धर्म का, जात की, रंग का। मजहब हम से नहीं है हम मजहब से हैं ये मैं नहीं कहता
हूं ये कहता है इस मुल्क का बदकिस्म हिस्सा गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब,
असम, छत्तीसगढ़ और कितने नाम बताऊं नाम याद नहीं करना चाहता क्योंकि इन सुबों के
दिल में इनता मजहबी दर्द है कि इस दर्द से कई ‘पाकिस्तान’ बन जाएगा। लेकिन हम भी बिजनेस करते
हैं ना पैसा सबसे बड़ा होता है। हम तो बस वही दिखाएंगे वही पढ़एंगे जिसे आप ना
चाहते हुए भी पढ़ने और देखने पर मजबूर हो।
वेद प्रताप वैदिक की कहानी को तो देश न चाहते हुए भी जान गया पर जो जिसे जानने
से रूह कांप जाएगी वो सच्चाई हम नहीं दिखाएंगे क्योंकि इस सच्चाई से हमें टीआरपी
अच्छी नहीं मिलेगी। हम आप को नहीं दिखाएंगे महानगरों में जमिंनदोज होती इमारतों का
सच हम नहीं बताएंगे इमारत के नीचे दब कर मर जाने के बाद मरने वाले लोगों के
परिवारों की जिंदगी। नहीं दिखाएंगे....क्योंकि हमें टीआरपी नहीं मिलेगी और टीआरपी
नहीं मिलेगी तो हम व्यापार नहीं कर पाएगें...। हम पत्रकार हैं इसलिए शर्मशार हैं...।
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