Monday, 28 July 2014

हमने रोते देखा है...





कौन कहता है कि आसमां ही रोता है जमीं के लिए
हमने तो इतिहास के बिसात पर वक्त को रोते देखा है

तुम तो तोड़ देते हो उस फूल को जो तुम्हें सुकूं देता है
हमने उस फूल के साथ शाखों को रोते देखा है

कौन कहता है कि पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
हमने उस स्याह रात में पहाड़ों को रोते देखा है         (उत्तराखंड की वो आफत की रात)

मजहब के अंध में जब जब काफूर होता रहा है जज्बात
वक्त की सौगंध हमने इस मुल्क को बहुत रोते देखा है

रिश्तों की डोर पर कई बार जख्मी हुआ दिल
कटी डोर में हाथ लिए हमने मांझी को रोते देखा है

जिस्म के चीथड़ों को बेबसी ही सिलती रहेगी
आबरू के दामन में हमने रूह को रोते देखा है

लाशों का भी कलेजा फट जाए तेरी हैबानियत देख कर
खुदा कसम तेरी इस करतूत पर हमने भगवान को भी रोते देखा है

Pranav jha

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