दंगा क्या होता है?
दंगा शब्द अपने आप में ही कांपती लब्जों से निकलती एक संप्रदायिक कहानी है।
धर्मअंधता की हद की लकीर के परे एक अंधविश्वास की काली दुनिया है। जहां इंसानियत
मर जाती है और वैहिसियत का परचम लहराता है।
किसी मुल्क में दंगा होने के लिए इंसानी जरूरत से जुड़ी किसी भी चीज की जरूरत
नहीं होती है। लेकिन तब जब हमारे समाज के बीच में कौम नाम के शब्दों से लकीर खींची
जाती है और मजहब को इंसानियत से ऊपर रखा जाता है, तब होता है दंगा। जब खुदा या
भगवान इंसान के अंदर से निकल कर मंदिर और मस्जिद में चले जाते हैं तब होता है
दंगा, जब मजहब पर सियासत हावी हो जाता है और इंसान को तकसीम कर कौम का रूप दिया
जाता है तब होता है दंगा।
जब यूपी के कांठ इलाके के एक मंदिर से लाउडस्पिकर उतार गया तो पुलिस और
स्थानिय लोगों के बीच विवाद हुआ। लेकिन इस छोटे से विवाद को खून खराबे में तबदील
करने के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी बखुबी उपस्थिति दर्ज करबाई और इस मुद्दे पर
महापंचायत की घोषणा कर दी पर जब महापंचायत को रोक दिया गया तो नाराज लोगों की
पुलिस से भिड़ंत हुई और झड़प में जिलाधिकारी की आंख में चोट लग गई।
यूपी के ही सहारनपुर में कुतुबशेर इलाके में गुरुद्वारे की जमीन को लेकर दो
अल्पसंख्यक समुदायों में जमकर खूनी संघर्ष हुआ और इस संघर्ष में दो लोगों की मौत
हो गई।
खैर, हम मौत का हिसाब नहीं करेंगे अगर मौत का हिसाब करने बैठेंगे तो इस मुल्क
में जिंदगी जीने के लिए वक्त नहीं मिलेगा। क्योंकि इस मुल्क कि हर दीवार पर मौत की
इबारत लिखी है और जिंदगी कहीं किसी कोने में खूंटी से टंग रही है।
हिंदुस्तान का इतिहास अगर अपने आप पर कभी रोता है तो वो गोधरा की रेलवे लाइन
पर, रात को भागलपुर में गंगा की छार पर, अयोध्या के भूमि पर, सावन के ठंडक फूहारों
के बीच जलता मुजफ्फरनगर के सीन पर। फेहरिस्त लंबी है याद नहीं करना चाहते नहीं तो
ठठकी आंखों से आंसू नहीं अंगार निकलेंगे।
ऐसा क्यों होता है कि हर बार इंसान की जज्वात को तक्सीम कर खून का नया समंदर
बनाया जाता है और उसी समंदर पर फिर से सियासत का नया ककहरा लिखते हैं। लाशों की
ढ़ेर पर सिंहासन लगाते हैं और भूख की आग से चिता जलाते हैं।
क्या दंगा रुक पाएगा इस मुल्क में?
मैं उत्तर प्रदेश के महामहीम अजीज कुरैशी नहीं हूं कि कहूंगा कि यूपी में अगर
भगवान भी उतर आए तो रेप नहीं रुक सकता लेकिन एक बात हैं कि अगर भगवान उतर कर ये कह
दे कि मेरी कोई जात नहीं और ना ही कोई मजहब तो शायद कोई मंदिर नहीं बनेगा जहां से
लाउडस्पिकर उतार जाए या फिर को किसी मस्जिद को लेकर विवाद होगा और राम रहीम के नाम
पर किसी ट्रेन में आग नहीं लग पाएगी।
जब तक इंसानी धर्म से ऊपर मजहबी धर्म नहीं होगा तब तक दंगा नहीं बंद होगा। जब
तक इस मुल्क का रंग एक नहीं होगा जात एक नहीं होगी तब हिंदुस्तान रोता रहेगा और उसके
आंसू पर सियासतदां सियासत करते रहेंगे।
हम तो आशावादी है आशा करते हैं और करते रहेंगे कि फिर एक सूरज पूरब से निकलेगा
जिसका कोई धर्म नहीं होगा और ना ही कोई मजहब। तब जा के इस धरा पर फिर से सहर होगी
है शांति होगी

No comments:
Post a Comment