Tuesday, 25 August 2015

वन रैंक वन पेंशन क्या है?



अपना मेडल लौटाते सेवानिवृत सैनिक
आजादी के 26 साल तक यानि सन् 1973 तक सेना में वन रैंक वन पेंशन योजना लागू थी लेकिन 1973 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की अध्यक्षता में ने तीसरे वेतन आयोग लागू करने के साथ ही वन रैंक वन पेंशन योजना को खत्म कर दिया गया और सहस्त्र बलों की तनख्वाह आम लोगों की तनख़्वाह के बराबर कर दिया, साथ ही जो सैनिक जिस वक्त रिटायर्ड होगा उसे उस वक्त के हिसाब से पेंशन दिया जाएगा को लागू कर दिया गया। इस फैसले के बाद पूर्व सैनिकों ने विरोध करना शुरू कर दिया जो अभी तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर रिटायर्ड कर्नल पुष्पिंदर सिंह के अगुवाई में जारी है।

सितंबर 2013 में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए भाजपा के तात्कालिक और आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि अगर केंद्र में उनकी सरकार बनती है तो वो वन रैंक वन पेंशन योजना को लागू करेंगे। इससे पहले सितंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट और मई 2010 में इस योजना पर बने स्थायी समिति इसे लागू करने की सिफारिश की थी।

क्या है वन रैंक वन पेंशन योजना ?

वन रैंक वन पेंशन का मतलब है कि अलग-अलग समय में रिटायर हुए एक ही रैंक के दो फौजियों की पेंशन की राशि में बड़े अंतर को खत्म करना। उदाहरण के रूप में जैसे कोई एक ही पद के दो सैनिक रिटायर हुए हैं, एक 25 साल पहले हुआ और एक आज के वक्त में हुआ है तो एक का पेंशन जहां 30 रुपया है वहीं दूसरे का 1000 रुपया। इसी अंतर को ख़त्म करने के लिए इस योजना की मांग की जा रही है।
सर्विसमैन का कहना है कि सवाल पैसों का नहीं है सवाल जीवनयापन का है। उस समय के हिसाब से दिए जा रहे पेंशन में गुजारा कैसे चलेगा। वहीं इस बात को लेकर तर्क दिया जा रहा है कि भत्ता भी तो मिलता है और वो समय-समय पर बढ़ता रहता है तो यहां बात पेंशन की है जो तब की और अब में बहुत अंतर है।

इतिहास

आज से करीब 30 साल पहले रिटायर्ड फौजियों ने एक एसोसिएशन बनाई थी जिसका नाम था एक्स सर्विसमेन एसोसिएशन। जिसका मकसद था एक समान पेंशन इस योजना से उस वक्त करीब 25 लाख सेवानिवृत सैनिकों को फायदा होता। केंद्र सरकार सैनिकों की इस मांग को लगातार टाल रही थी। इससे तंग आकर 2008 में सेवानृवित सैनिकों ने (ISM) इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमेंट नामक संगठन बनाई गई और अपने संघर्ष को और तेज कर दिया। 2009 में फौजियो ने लगातार हड़ताल को जारी रखते हुए तात्कालीन राष्ट्रपती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को हज़ारों मैडल वापिस किया इतना ही नहीं फौजियों ने अपने खून से हस्ताक्षर वाला ज्ञापन भी सौंपा। उस वक्त पंजाव और हिमाचल की सरकारें इस प्रस्ताव को पारित कर वन रैंक वन पेंशन की मांग का समर्थन भी की।

वन रैंक वन पेंशन की राजनीति

जब तक कांग्रेस की सरकार रही इस योजना को लागू करने के लिए कोशिश जारी रही लेकिन लागू नहीं हो पाई। सरकार में आने से पहले भाजपा की ओर से कहा गया कि सरकार बनने पर हम इस योजना को लागू करेंगे लेकिन सरकार बनने के बाद लाल किले की प्रचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपने पहले भाषण में इस योजना की घोषणा नहीं की तो पूर्व सैनिक और ज्यादा निराश हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने उस वक्त बस इतना कहा कि इस योजना पर सरकार सैद्धांतिक तौर पर सहमत है और सभी पक्षों को लेकर बातचीत चल रही है। सरकार में आने के बाद पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर ये भी कहा कि ये मामला इतना आसान नहीं है जितना वो पहले इसे समझ रहे थे।

वन रैंक वन पेंशन पेंशन योजना का रोड़ा कौन है?

पूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन योजना को रोकने में ब्यूरोक्रेसी का ही हाथ है जो ये शक पैदा कर रहे हैं कि अगर ये योजना सैनिकों के लिए लागू हो जाती है तो फिर दूसरी सेवा में भी इसके लिए मांग की जाएगी, तो सरकार इतने संसाधन कहां से लाएगी। ये भी मुद्दा है कि सरकार इसे कब और कैसे लागू करें और लागू करने के बाद इस पर होने वाले खर्च कहां से निकाला जाय। सरकारी सुत्रों के हवाले से ये भी कहा जा रहा है कि इसे लागू करने से सरकारी ख़जाने पर 20,000 करोड़ का बोझ पड़ेगा। वहीं एक आंकड़े के हिसाब से पूर्व सैनिकों का कहना है कि ये बोझ केबल 8,300 करोड़ ही होगा। लेकिन इस योजना के लागू हो जाने से 22 लाख पूर्व सैनिक और 6 लाख युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की पत्नियों को तत्काल फायदा होगा। एक अनुमान के मुताबिक देश में हर साल 65,000 फौजी रिटायर होते हैं और 25 लाख एक्स सर्विसमैन हैं।
वक्त के साथ ये योजना भी सियासत की धुरी पर घुमता रहा है और अब इस मसौदे पर यह भी तर्क सामने आ रहा है कि सेना के लिए दूसरे सेवाओं से अलग प्रवाधान क्यों होना चाहिए? अगर ऐसा तर्क दिया जा रहा है तो ये एक बचकानी हरकत मात्र हैं क्योंकि सेना कि तुलना हम दूसरे सेवाओं से कभी नहीं कर सकते हैं। दूसरे सेवाओं में हम बंद ऑफिस में गर्मी के दिनों में एसी में बैठ कर काम करते हैं वहीं सेना के जवान तपती धूप में रेगिस्तान में सीमा की रक्षा में तैनात रहते हैं। ज्यादातर सैनिक 35 से 37 साल में रिटायर हो जाते हैं। ब्रिगेडियर रैंक के नीचे के ऑफसर 56 साल में रिटायर हो जाते हैं वहीं आम तौर पर रिटारमेंट की उम्र 60 साल है। रिटायर सैनिकों के लिए दोबारा रोजगार पाने की संभावना भी कम होता है।
अगर हम नीचे के कुछ आंकडों पर ध्यान दें तो ये आंकड़े यही बताते हैं कि ये भारतीय फौजियों के लिए अन्याय ही है।

कई मुल्क अपने सैनिकों को आम लोगों की तुलना में ज़्यादा तनख़्वाह देते हैं जैसे-
अमेरिका     -15-20 %
ब्रिटेन               -10 %
फ्रांस                 -15 %
पाकिस्तान      -10-15 %
जापान              -19-29 %
भारत        -0 %

बदलाव के इस रफ्तार में बदले हैं तो सिर्फ आंकड़ें, सचाई नहीं और जो आपके सामने है वहीं सच्चाई है तो अब आप ही इन तमाम आंकड़ों और चीजों के देखते हुए तय कीजिए क्या ये उचित हैं?


Friday, 14 August 2015

जिन्हें नाज़ था हिंद पर वो कहां हैं


वो बागों के फूलें वो खेतों की फसलें
वो हरियाली डालें वो शाखों के पत्तें
कहां हैं कहां हैं कहां हैं?....

वो अमन की अजानों से सूरज का उगना
मद खुशियों की आंखों से आसुंओं का निकलना
नहीं है नहीं है नहीं है.....

बनी राख में है अब सपनों का डेरा
चांद से आगे पहुंचा है अपना सवेरा
जलते हुए आशियानों की चीखें
लाशों से लटकी वो पेडों की शाखें
यहीं हैं यहीं हैं यहीं है......

बुलाओ ज़रा उन रहबरों को यहां पे
दिखाओं ये ज़ख़्म जो लगा है सीने पे
रंगों में बंटते मुल्क को तुम बुलाओ
सड़कों पर भूखे सोये भविष्य को बैठाओ
ये बेटियों की अस्मतों से ज़रा पूछो
पूछो ज़रा खेत के हलधरों से
वो सोने की मिट्टी वो अमन के कबूतर
उड़ गए है उड़ गए हैं उड़ गए हैं....

आंखों की ठिठकी आंसूओं को गिराओ
लाशों पर बैठे रहनुमा को बताओ
आओ ज़रा देख लो अब इन्हें भी
ये कुचें ये निलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहां हैं कहां हैं मुहाफिज़ ख़ुदी के
जिन्हें नाज़ था हिंद पर वो कहां हैं.....कहां हैं.....कहां हैं.......



Saturday, 1 August 2015

फारुक घोसी का 'समाजवाद'

आदरणीय नेताजी, (मुलायम सिंह)
आपसे गुजारिश है कि याकूब मेमन को फांसी देने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल खड़े हुए हैं जो आपको लिख रहा हूं। याकूब मेमन के साथ उनकी पत्नी राहीन याकूब मेमन भी गिरफ्तार हुई थी याकूब को सज़ा हुई और श्रीमती राहीन को बरी कर दिया गया और वह भी कई सालों तक जेल में रही। कितनी तकलीफ रही होगी और हम समाजवादियों की एक खूबी है कि मन में जो बात रहे उसे कहना जरूरी है।
समाजवादी मजलूम और असहाय लोगों का हमेशा साथ दिया है। आज मुझे राहीन याकूब असहाय लग रही है और मुसलमान भी आज अपने आप को असहाय समझ रहा है। हमें साथ देना चाहिए और श्रीमती राहीन याकूब को संसद सदस्य बनाकर मजलूम व असहाय लोगों की आवाज़ बनने देना चाहिए................।
आपका साथी
मोहम्मद फारुक घोसी
प्रदेश उपाध्यक्ष, मुंबई

इस चिट्ठी को पढ़ने के बाद तत्काल चल रही तर्क-वितर्क की शीशे की दीवार खत्म हो जाती है कि देशद्रोही आतंकी याकूब के जिस्म का खून किस मजहब का था। लोहिया के समाजवाद के काफिले का ये रहनुमा आज बहुत द्रवित है क्योंकि वो सच्चा समाजवादी है और सच्चे समाजवादी होने का दावा ठोकते हुए फारुक घोसी के दिल में एक आतंकवादी के बेवा को लेकर अचानक भावुकता का तूफान आ गया।

बेगुनाहों के लाशों के चिथड़े बना कर मुल्कपरस्त देशद्रोही आतंकवादी टाइगर मेमन का भाई आतंकी याकूब मेमन की बेवा समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद फारुक घोसी को असहाय और मज़लूम दिखती है। मोहम्मद फारुकी घोसी ने उस आतंकी की बीवी के दर्द को अपने सीने में एहसास कर अनंत पीर के साथ ये चिट्ठी अपने सरपरस्त को लिखी है। साथ ही यह भी कहा है उस देशद्रोही आतंकी की फांसी के बाद पूरा मुसलमान आज अपने आप को असहाय समझ रहा है। माननीय के इस तर्क के बाद एक बात तो पूरी तरह साफ हो गयी है कि इस मुल्क के मुसलमानों का रहनुमा एक देशद्रोही आतंकवादी था जिसके फांसी हो जाने के बाद ये कौम अपने आप को मज़लूम समझ रहा है।

मोहम्मद फारुक घोसी आपका दर्द भी कौमी है क्या...क्या आपका एहसास भी मज़हबी है....। जो भी हो लेकिन इस चिट्ठी ने ये साबित कर दिया है कि आपका ये दर्द....ये आंसू.....ये एहसास ना तो कौमी है ना ही मज़हबी....ये सिर्फ और सिर्फ सियासी है। फारुक घोसी आपकी जबान से उस वक्त एक हर्फ क्यों नहीं निकला जब एक वीर अपने ज़मीं की आन-शान पर बलिदानी हो गया। क्या आपको उसका परिवार मज़लूम नहीं दिखा रहा.... क्या आपको उसके बच्चे अनाथ नहीं दिखे रहे। क्या गुरदासपुर में मारे गए जवान के परिवार असहाय नहीं दिखें....। उस विधवा के लिए तो आपने कभी पैरवी नहीं की? उसके दर्द को कभी आत्मसात नहीं किया.... क्या उसका दर्द समाजवाद के पैमाने पर खड़ा नहीं उतरता है।क्या लोहिया के सपनों का समाजवाद आज के दौर में अपना धर्म तय कर चुका है....।
क्या समाजवाद एक देशद्रोही की बेवा को उसके दर्द के हर्जाना के रूप में रियाया की अपेक्षा (सांसद बनाने की वकालत) देने की वकालत कर रही है। माननीय जब आप के दिल में एक आतंकी के लिए इतनी शिद्दत है तो अपनी नेमत क्यों नहीं बरसा देते उस देशद्रोही की बेवा पर।

वो मुल्क कितना बदकिस्मत होता है जहां एक राष्ट्रद्रोही की मौत पर इस कदर राजनीति होती है। माननीय का यही बयान अगर गुरदासपुर के आतंकी हमले में शहीद एसपी बलजीत सिंह के परिवार के लिए आता तो तस्वीर ही कुछ और होती।


जिस हिंदुस्ताना ने अपना धर्म आज तक तय नहीं किया उसके लोग धर्म के नाम पर मर मिटने के लिए तैयार हैं तो ये देश का ही दुर्भाग्य है और इस दुर्भाग्य को विनाश में बदलने का काम फारुक घोसी जैसे लोग करते हैं। खैर, मामले की गंभीरता को देखते हुए मोहम्मद फारूक घोसी को अपदस्त कर दिया गया फिर भी जो भी है.............बहुत शर्मनाक है......।