आदरणीय नेताजी, (मुलायम
सिंह)
आपसे गुजारिश है
कि याकूब मेमन को फांसी देने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल खड़े हुए हैं जो आपको
लिख रहा हूं। याकूब मेमन के साथ उनकी पत्नी राहीन याकूब मेमन भी गिरफ्तार हुई थी
याकूब को सज़ा हुई और श्रीमती राहीन को बरी कर दिया गया और वह भी कई सालों तक जेल
में रही। कितनी तकलीफ रही होगी और हम समाजवादियों की एक खूबी है कि मन में जो बात
रहे उसे कहना जरूरी है।
समाजवादी मजलूम और
असहाय लोगों का हमेशा साथ दिया है। आज मुझे राहीन याकूब असहाय लग रही है और
मुसलमान भी आज अपने आप को असहाय समझ रहा है। हमें साथ देना चाहिए और श्रीमती राहीन
याकूब को संसद सदस्य बनाकर मजलूम व असहाय लोगों की आवाज़ बनने देना
चाहिए................।
आपका साथी
मोहम्मद फारुक
घोसी
प्रदेश उपाध्यक्ष, मुंबई
इस चिट्ठी को
पढ़ने के बाद तत्काल चल रही तर्क-वितर्क की शीशे की दीवार खत्म हो जाती है कि
देशद्रोही आतंकी याकूब के जिस्म का खून किस मजहब का था। लोहिया के समाजवाद के
काफिले का ये रहनुमा आज बहुत द्रवित है क्योंकि वो सच्चा समाजवादी है और सच्चे
समाजवादी होने का दावा ठोकते हुए फारुक घोसी के दिल में एक आतंकवादी के बेवा को
लेकर अचानक भावुकता का तूफान आ गया।
बेगुनाहों के
लाशों के चिथड़े बना कर मुल्कपरस्त देशद्रोही आतंकवादी टाइगर मेमन का भाई आतंकी
याकूब मेमन की बेवा समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद फारुक घोसी को असहाय और मज़लूम
दिखती है। मोहम्मद फारुकी घोसी ने उस आतंकी की बीवी के दर्द को अपने सीने में
एहसास कर अनंत पीर के साथ ये चिट्ठी अपने सरपरस्त को लिखी है। साथ ही यह भी कहा है
उस देशद्रोही आतंकी की फांसी के बाद पूरा मुसलमान आज अपने आप को असहाय समझ रहा है।
माननीय के इस तर्क के बाद एक बात तो पूरी तरह साफ हो गयी है कि इस मुल्क के
मुसलमानों का रहनुमा एक देशद्रोही आतंकवादी था जिसके फांसी हो जाने के बाद ये कौम
अपने आप को मज़लूम समझ रहा है।
मोहम्मद फारुक
घोसी आपका दर्द भी कौमी है क्या...क्या आपका एहसास भी मज़हबी है....। जो भी हो
लेकिन इस चिट्ठी ने ये साबित कर दिया है कि आपका ये दर्द....ये आंसू.....ये एहसास
ना तो कौमी है ना ही मज़हबी....ये सिर्फ और सिर्फ सियासी है। फारुक घोसी आपकी जबान
से उस वक्त एक हर्फ क्यों नहीं निकला जब एक वीर अपने ज़मीं की आन-शान पर बलिदानी
हो गया। क्या आपको उसका परिवार मज़लूम नहीं दिखा रहा.... क्या आपको उसके बच्चे
अनाथ नहीं दिखे रहे। क्या गुरदासपुर में मारे गए जवान के परिवार असहाय नहीं
दिखें....। उस विधवा के लिए तो आपने कभी पैरवी नहीं की? उसके दर्द
को कभी आत्मसात नहीं किया.... क्या उसका दर्द समाजवाद के पैमाने पर खड़ा नहीं
उतरता है।क्या लोहिया के सपनों का समाजवाद आज के दौर में अपना धर्म तय कर चुका
है....।
क्या समाजवाद एक
देशद्रोही की बेवा को उसके दर्द के हर्जाना के रूप में रियाया की अपेक्षा (सांसद
बनाने की वकालत) देने की वकालत कर रही है। माननीय जब आप के दिल में एक आतंकी के
लिए इतनी शिद्दत है तो अपनी नेमत क्यों नहीं बरसा देते उस देशद्रोही की बेवा पर।
वो मुल्क कितना
बदकिस्मत होता है जहां एक राष्ट्रद्रोही की मौत पर इस कदर राजनीति होती है। माननीय
का यही बयान अगर गुरदासपुर के आतंकी हमले में शहीद एसपी बलजीत सिंह के परिवार के
लिए आता तो तस्वीर ही कुछ और होती।
जिस हिंदुस्ताना
ने अपना धर्म आज तक तय नहीं किया उसके लोग धर्म के नाम पर मर मिटने के लिए तैयार
हैं तो ये देश का ही दुर्भाग्य है और इस दुर्भाग्य को विनाश में बदलने का काम
फारुक घोसी जैसे लोग करते हैं। खैर, मामले की गंभीरता को देखते हुए मोहम्मद फारूक
घोसी को अपदस्त कर दिया गया फिर भी जो भी है.............बहुत शर्मनाक है......।


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