Thursday, 17 September 2015

बिहार से 'बिहारी' तक.....

गौरवमयी  बिहार की कहानी
पार्ट-1

बिहार चुनाव पर बिहार को खोजने की कोशिश

हर कोशिश में मैं बदला हूं...हर सांचे में मैं ढला हूं...हर जुबान में, हर इंसान में मैं मिला हूं.......  हर बार मिल जाता हूं, ढल जाता हूं और बदल जाता हूं क्योंकि समय का मैं सवारी हूं....मैं बिहारी हूं।

गाली की मौलिकता आवाज़ की ऊंचाई में होती है लेकिन एक गाली ऐसी है जिसे धीमी आवाज़ में भी बोली जाए तो भी उतना ही काम करती है जितना की अन्य गालियां अपनी चरम ऊंचाई से करती है।



एक गौरवशाली मिट्टी कैसे गाली बन जाती है, वो बिहार के बिहारीयों से अच्छा कोई नहीं जान सकता है। बिहार के बासिंदे को अगर बिहारी नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ! लेकिन, आज वक्त इस कदर बदल चुका है कि मां-बहन की गाली से भी अगर कोई उत्तेजक गाली है तो वो है किसी को बिहारी कहना। बिहार के बाहर कहीं भी किसी शहर में, किसी भी व्यक्ति का अगर घोर अपमान करना हो तो आप उसे बिहारी कह दें, वो आपको अपनी क्षमता का सबसे उच्य स्तरीय प्रक्रिया जरूर देगा।
आज शहर में रिक्शा या ठेला खीचने वालों का कोई अलग-अलग नाम नहीं होता। उन समुदाय का एक ही नाम होता है बिहारी। कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को भी उसके ऑरिज़नल नाम से नहीं बुलाया जाता, उन्हें भी बिहारी कह कर ही बुलाया जाता... ऐ बिहारी ठीक से काम कर। शहर के मलीन बस्तियों में रहने वाले लोग चाहे जहां से भी आये हों, उन्हें बिहारी के श्रेणी में ही रखा जाता है। ऑफिस हो या कोई कंपनी किसी भी आदमी को नीचा दिखाने के लिए बिहारी शब्द का उपयोग किया जाता है, और जैसे ही उसे बिहारी की उपाधि दी जाती है उसके रगों में जमा खून खौल उठता है।

आखिर ऐसा क्यों?

ऐसा कैसे हो गया कि जिस प्रांत में ज्ञान की गंगा बहती हो, राजनीति जहां खेल हो, मेहनत जहां की ईमान हो और परिस्थितियां जहां कपड़े समान हो कि जब जैसा हो वैसा ही पहनो, उस प्रांत का नाम पूरे राष्ट्र में गाली बन गई हो, आखिर कैसे...?

इस वज़ह के पीछे एक पूरा सफर है, जो पाटलिपुत्र से बिहार तक तय किया गया है।
इसके पीछे एक ज्ञान की मौत है, एक अहिंसा की मौत, एक क्रांति की मौत है, एक सभ्यता कि मौत है, एक धर्म की मौत है, मौत है एक सम्राट के पहचान की, मौत है इतिहास की। साथ ही मारता है हर रोज बिहार जब कोई बिहारी अपने आपको ऊंचा दिखाने के लिए बोलता कि मैं बिहारी नहीं हूं।

बिहार की पहचान को धूमिल करने में यहां के राजनेता, यहां के समाज के रहनुमा और जाति के भेदभाव का बड़ा हाथ रहा है। आज दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई अन्य शहर हो, हर जगह आपको बिहार के लोग मिल जाएंगे। बिहारी सिर्फ मजदूर वर्ग में ही नहीं होते, बिहारी हर वर्ग में होते हैं। जैसे की किसी कंपनी का मालिक बिहारी है तो उसके साथ कंपनी में काम कर रहे  कर्मचारी भी बिहारी होते हैं। इससे आप अंदाज़ा लगा सकता हैं कि बिहारी के पास ना तो दिमाग की कमी है और ना ही प्रतिभा की, अगर कमी है तो वो है अवसर की।
जिस प्रांत में ये पैदा होते हैंं उस प्रांत में इनके पास रहने के लिए ज़मीन, घर, कपड़ा तो होता है लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं होती क्योंकि उस प्रांत में रोजगार का कोई उचित साधन नहीं है। इसलिए ये लोग बिहार से बाहर जा कर बिहारी बन जाते हैं।

क्रमश:

Friday, 11 September 2015

‘हत्यारिन मां का टीआरपी शो’



ग्लैमर, चकाचौंध और शहर को इस शोरशराबों से दूर 46 साल पहले एक ऐसी रहस्यमयी कहानी की बुनियाद पड़ती है जिसे सुन कर पूरा मुल्क सकते में आ जाता है कि रिश्तों की ऐसी मकड़जाल.....कैसे हो सकता है ! मुंबई शहर से बहुत दूर असम के दिसपुर में ये कहानी शुरू होती है । साल 1969 था जब उपेंद्र कुमार बोरा के छोटे भाई की पत्नी दुर्गा रानी दास एक बेटी को जन्म देती है और जन्म देने के कुछ दिन बाद उसके पिता यानि उपेंद्र कुमार बोरा का छोटा भाई दुर्गा रानी को छोड़ देता है। बाद में उपेंद्र, दुर्गा रानी से शादी कर लेता है।

जन्म लेते ही रिश्तों को पलट कर रख देने वाली दुर्गा रानी की बेटी का नाम इंद्राणी ने अभी तक रिश्तों का ऐसा मकड़जाल बुना जिसमें कोई मकड़ी भी उलझ कर दम तोड़ दे। साल 1975 में इंद्राणी दिसपुर के सेंटमेरी स्कूल में दाखिला ली। उसके बाद वो शिलांग चली गई। जहां उसकी मुलकात सिद्धार्थ दास से होती है और वहीं कुछ दिनों के बाद वे दोनों शादी कर लेते हैं। इस शादी से दो बच्चे होते हैं जिसका नाम शिना और मिखाइल होता है। कुछ वक्त के बाद इंद्राणी सिद्धार्थ को तलाक दे कर 1990 में कोलकाता पहुंचती है। जहां संजीव खन्ना से शादी करती है और उससे एक बेटी होती है जिसका नाम होता है विधि। अपने मुकाम की तलाश में इंद्राणी फिर से अपनी जिंदगी में रिश्तों के इस पैराहन को उतार कर फेकते हुए संजीव खन्ना से 1998 में तलाक ले लेती है और 1999 में पहुंच जाती है मायानगरी मुंबई। मुंबई पहुंच कर इंद्राणी स्टार इंडिया के एचआर मैनेजर बन जाती है जिसके सीईओ रहते हैं मीडिया मुगल पीटर मुखर्जी जिन्हें निजी चैनलों को कामयाब बनाने वाले सीईओ के तौर पर भी देखा जाता है। इंद्राणी और पहले से तलाकशुदा पीटर मुखर्जी के बीच एक बार फिर से प्यार परवान चढ़ता है और 2002 में दोनों शादी कर लेते हैं। इंद्राणी से शादी से पहले पीटर मुखर्जी को पूर्व पत्नी शबनम से दो बच्चा होता है राहुल और रॉबिन, जो कि अपने मां के साथ देहरादून में रहता था।

इंद्राणी पीटर को अपनी तलाकशुदा पति संजीव खन्ना और बेटी के बारे में बताती है। वहीं शिना और मिखाइल को अपने भाई और बहन के रूप में पीटर के सामने पेश करती है। इधर पीटर का स्टार इंडिया से कांट्रौक्ट खत्म होने के कगार पर था। कुछ बिजनेस शर्तों के आधार पर पीटर मुखर्जी इंद्राणी के नाम से एक कंपनी खोलता है जिसका चेयरमैन खुद और सीईओ इंद्राणी को बनाता है।
इंद्राणी की बहन की पहचान रखने वाली शीना बोरा मुंबई पहुंचती है। जहां इंद्राणी के जरिए वह सौतेले पिता पीटर मुखर्जी से साली के तौर पर मिलती है। शीना को मुंबई मेट्रो में नौकरी मिलती है, जहां उसकी मुलाकात पीटर के पूर्व पत्नी शबनम के बेटे राहुल से होती है और दोनों में नजदीकियां बढ़ने लगने लगती है और वे दोनों शादी करने का फैसला करते है जो ना तो पीटर को मंजूर था और ना ही इंद्राणी को। इस बीच 24 अप्रैल 2012 को शीना का मर्डर हो जाता है जिसके रहस्य से पर्दा मुंबुई पुलिस के सामने इंद्राणी का ड्राइवर के साथ एक गुमनाम कॉल उठाता है और फिर शुरू होता है लाइव क्राइम थ्रीलर शो जो लगातार चले ही जा रहा है।

इस अंतहीन रहस्यमय क्रिमनल कथा में ग्लैमर है, बेसुमार पैसा है, ताकत, नशा, सेक्स और एक लंबा धोखा है। इस कथा में सच सौतेला है, अपना खून झूठा है, सौतेले रिश्तों में अपना प्यार है। महत्वकांक्षा के चादर पर जिंदगी लिव-इन में है।

सेल वैल्यू के जब सारे कंटेंट एक साथ एक कथा में समाहित हो तो मीडिया इस अवसर को भुनाने से कहां चुकता है। चाहे उसके सामने जंतर-मंतर पर वन रैंक’ ‘वन पेंशन के लिए कोई आंदोलनकारी अपनी जान देने को तैयार हो या फिर आरक्षण की  ने आग किसी प्रदेश में विकट रूप ले लिया हो....कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इंद्राणी कथा में रोज एक नया खुलासा हो रहा है।
इंद्राणी का तिलिस्म हर दिन एक नया डेली शॉप बनाता जा रहा है और सनसनी फैलाने वाला मीडिया उसे टीआरपी के रूप में खरीदता जा रहा है।

यह एक अनंत कथा है जिसके कहने वाले अनेक है। कभी इस कथा को अपराधी बाचता है तो कभी पुलिस जो बच जाता है उसे तो मीडिया कइयो एंगल बना कर कई तरीके से बाचता है। ये कथा इस लिए भी रोचक है क्योंकि इस कथा में एक हत्यारिन मां के कई तरह के इफैक्ट्स हैं जो बहुत जहग असर छोड़ते हैं। माता सुनी ना कुमाता ये संस्कृत का श्लोक है। जो संस्कृत की तरह ही किसी सदी में छूट गया है। अब यहां सब कुछ संभव है। यहां माता भी कुमाता होती है।

लेकिन सवाल इंद्राणी का नहीं है यहां अपराधबोध का है कहीं मीडिया अपराधबोध करवाते करवाते खुद ही ना अपराधी हो जाए। क्योंकि जहां एक तरफ देश में वारदतों और सनसनी से इतर कई मुद्दे सामने आने के लिए बेताब हैं वहां इस हत्यारिन मां का टीआरपी शो दिखा कर मीडिया भी एक अपराध कथा का हिस्सा ही तो बन रहा है। 

यादों के बादल....


आंखों के ऊपर यादों का बादल जब छाता है
दिल में अश्क का तुफान उठ आता है

वो आधा चांद जब-जब उफक कर फलक पर आता है
मेर जिस्म का रूह-रूह सिहर जाता है
उस चांदनी के रोशनी में नहाता है ये शहर
पर मुझे उस गांव की बेबसी कोस जाता है
मैं वहां खड़ा चलता रहा अकेला
वो छूटता हुआ हाथ आज भी छूट जाता है
बंद निगाहों से तुझे ढूंढ़ता हूं जब भी
आंखों के पलकों से एक याद ठपक जाता है................।