वो आधा चांद जब-जब उफक कर फलक पर आता है
मेर जिस्म का रूह-रूह सिहर जाता है
उस चांदनी के रोशनी में नहाता है ये शहर
पर मुझे उस गांव की बेबसी कोस जाता है
पर मुझे उस गांव की बेबसी कोस जाता है
मैं वहां खड़ा चलता रहा अकेला
वो छूटता हुआ हाथ आज भी छूट जाता है
वो छूटता हुआ हाथ आज भी छूट जाता है
बंद निगाहों से तुझे ढूंढ़ता हूं जब भी
आंखों के पलकों से एक याद ठपक जाता है................।
आंखों के पलकों से एक याद ठपक जाता है................।

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