Wednesday, 28 January 2015

केजरी-किरण ‘वॉर’



दिल्ली इस बार एक ऐसे चुनावी दौर में है जहां से राजनीति का इतिहास बदलने वाला वर्ष 2014 को विस्तार मिलेगा या फिर रचे इतिहास को बदल देगा। दिल्ली के चुनावी मैदान में इस बार दो ऐसे उम्मीदवार हैं जो राजनीति को कभी एक ही चश्में से देखा करते थे, लेकिन अब वो एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। इस बार केजरी और किरण के बीच कुर्सी का वॉर ठना है।

सियासत में तस्वीर हमेशा बदलती रहती है, दिल्ली के चुनाव में इस बदलाव को बखुबी देखा जा सकता है। यही कारण रहा है कि दिल्ली को एक प्रयोग के तौर पर बीजेपी देख रही है क्योंकि जिस तरह से मोदी को घेरने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिसा के क्षत्रप एक साथ जनता परिवार में आए हैं उससे बीजेपी के लिए दिल्ली का चुनाव इन तीनों प्रदेश में भविष्य की तस्वीर को बनाने में सहायक साबित होगी।

दिल्ली का चुनाव मोदी के साथ या बेदी के साथ
मोदी की बिसात पर जहां पूरे देश में बीजेपी ने इतिहास को बदल कर रख दिया वहीं दिल्ली के सियासी मैदान में मोदी के बदले बीजेपी बेदी के अगुवाई में चुनाव लड़ने जा रही है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि जिस मोदी के रंग से बीजेपी ने पूरे देश को एक रंग में रंग दिया, वहीं दिल्ली आ कर वो रंग उतर गया और दिल्ली में कमल खिलाने का ज़िम्मा बेदी के कंधों पर आ गया। इसे समझने के लिए हमें कुछ पहलूओं पर गौर करने की ज़रूरत है। दिल्ली में पिछली बार चुनाव लड़ने का जो आधार था उसमें स्वच्छ प्रशासन और ईमानदार सरकार मुख्य मुद्दों में से एक था, बीजेपी इस बात को बारिकी से जानती है। साल 2011 में जिस आंदोलन ने पूरे देश में एक क्रांति का माहौल बना दिया उसी क्रांति का हिस्सा अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी है। अन्ना के अंदोलन ने देश की सोच को बदल कर रख दिया और देश के हर हिस्से से स्वच्छ और ईमानदार सरकार की मांग होने लगी। देश के इस नब्ज़ को पकड़ कर अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का गठन किया। जिसका विरोध उस समय की पूर्व आईपीएसी, समाजसेवी और अन्ना टीम के सदस्य रह चुकी किरण बेदी ने किया साथ में अन्ना हजारे ने भी किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ने में आपत्ति जाताई। साथ ही साथ अन्ना ने राजनीति को कीचड़ भी कह दिया, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने इस कीचड़ को साफ करने का ज़िम्मा लिया और अपनी पार्टी बना कर अन्ना के आंदोलन से अपना अलग रास्ता बनाया। इस दौरान किरण बेदी और पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह अन्ना के साथ रहे, लेकिन लोकसभा 2014 के चुनाव में वीके सिंह ने बीजेपी का दामन थाम लिया और गाज़ियाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़े और जीते भी। इसी दौरन ये कयास लगाए जाने लगे कि अब किरण बेदी भी बीजेपी के साथ आ सकती है। इन सब के बीच जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो दिल्ली के विकास के मुद्दों को दूसरी स्थान पर रख कर भ्रष्टाचार और ईमानदार छवि वाले नेता को ज़्यादा तरजीह दी जाने लगी। केजरीवाल को इसका फायदा भी मिला और 70 विधानसभा सीटों में से 28 सीटें जीत कर आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रही वहीं भाजपा 31 सीट जीत कर पहले स्थान पर रही, सबसे बुरा हाल कांग्रेस का रहा जो 70 में से सिर्फ 8 सीटें ही बचा पाई। ये केजरीवाल का ही जादू था जो दिल्ली में झाड़ूअस्तित्व पा सकी। 2013 के इस चुनाव में किसी को भी प्रत्यक्ष बहुमत नहीं मिला जिस वज़ह से सरकार का बनना नामुमकिन हो गया, लेकिन केजरीवाल ने जनता से रायसुमारी कर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया और शर्त के साथ सरकार बनाया लेकिन ये सरकार 49 दिन से ज़्यादा नहीं चल पाई। विधानसभा में लोकपाल बिल नहीं पास होने पर केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसी बीच पूरे देश में मोदी की लहर छा गई और केंद्र में ऐतिहासिक जीत के साथ मोदी की सरकार बन गई।

सरकार में आने के बाद से ही बीजेपी की नज़र दिल्ली पर थी लेकिन टीवी चैनलों और एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वें से बीजेपी एक हद तक सकते में थी क्योंकि सारे सर्वे में केजरीवाल की लोकप्रियता मोदी पर भारी पड़ रही थी और दिल्ली की पुकार थी ईमानदार मुख्यमंत्री। बीजेपी ने इस बात को भांप लिया और तुरुप के इक्के के तौर पर केजरीवाल के सामने उसी के पूर्व साथी किरण बेदी को खड़ा कर दिया। राजनीति के बिसात पर दोनों ही नए खिलाड़ी हैं पर दोनों की छवि ईमानदार वाली है और दिल्ली को एक ऐसे ही मुख्यमंत्री की चाहत भी थी।

किरण, केजरी वॉर
किरण बेदी ने राजनीति में एंट्री करने के साथ ही दिल्ली के चुनावी फ़िजा को ही बदल कर रख दिया। यूं तो इसका पूर्वाभास था लेकिन ऐसा अचानाक से हो जाना एक धमाके से कम नहीं था क्योंकि किरण बेदी के आने से बीजेपी और संघ के नेता पीछे धकेल दिए गए। पार्टी में मनमुटाव का माहौल भी बन गया। सूत्रों के मुताबिक किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किए जाने से डॉक्टर हर्षवर्धन भी नाराज़ हुए। लेकिन पार्टी ने जीत को प्रमुखता देते हुए इन सारे जज़्बातों को हाशिए पर डाल आम आदमी पार्टी के प्रमुख केजरीवाल के लिए किरण बेदी को विकल्प के तौर पर उतारा जो केजरीवाल को उसके ही भाषा में ही जवाब दे। अब जब किरण दिल्ली में कमल खिलाने का ज़िम्मा ले चुकी है तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलना लाज़मी था और इसी क्रम में बेदी और केजरी वॉर शुरू हो गया। जुबानी जंग के इस मैदान में किरण और केजरीवाल के सामने अनेक चुनौतियां आने लगी। अरविंद केजरीवाल ने तो किरण बेदी को बहस के लिए खुली चुनौती तक दे दी। लेकिन किरण ने बड़ी सरलता और गंभीरता के साथ इस चुनौती को स्वीकार करते हुए सदन में बहस करने की बात कह कर टाल दिया। किरण बेदी के इस जवाब को आप राजनीतिक चुप्पी कहें या फिर एक सेफ ज़ोन में खुद को रखना, पर जो भी हो केजरीवाल का ये ऑफर बुरा नहीं था क्योंकि खुली बहस की परंपरा अभी तक इस मुल्क में नहीं आया है अगर ऐसा होता है और इस परंपरा को भारतीय राजनीतिक पार्टीयों द्वारा अमल में लाया जाता है तो ये लोकहित में ही होगा। पश्चिम के देशों में जहां लोकतांत्रिक सरकार हैं वहां ऐसी परंपरा का चलन है। खैर, बीजेपी को केजरीवाल का डर तो है और इस बात को तब और मजबूती मिल गई जब बीजेपी की मुख्यमंत्री उम्मीदवार किरण बेदी को सुरक्षित रखते हुए सीधे तौर पर केजरीवाल के सामने नहीं उतारा गया। इस मामले में केजरीवाल किरण बेदी पर भारी पड़ते हैं क्योंकि पिछले दिल्ली के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पंडितों के कहने के बावज़ूद केजरीवाल अपनी कही बात पर अड़े रहे और शीला दीक्षित के खिलाफ अपना नामांकन करवाया और विजयी बने साथ ही साथ ये भी दिखा दिया कि कह देने मात्र से 56 इंच का सीना नहीं होता उसके लिए करना भी होता है। केजरीवाल की इसी अखड़पना की वजह से बीजेपी को एक हद तक भय था, इसलिए किरण बेदी को बीजेपी ने सुरक्षित सीट से दिल्ली के चुनावी मैदान में उतारा।


दिल्ली चुनाव के बाद बीजेपी
अन्ना के आंदोलन ने पूरे देश को जागृत किया और ईमानदार नियम कायदे का पाठ सिखाया। केजरीवाल ने इसी को अपना पृष्टभूमि बना कर आम आदमी पार्टी को सियासी ज़मीं पर उतारा। लेकिन बीजेपी ने इसी में घुसपैठ कर अपनी राजनीति को हाशिये पर डाल कर जीत के लिए अपने सारे कायदे-कानून को पलटने के लिए तैयार हो गई। 2015 के चुनाव 2013 के चुनाव से बहुत अलग है क्योंकि यहां अब जीत का पैमाना बदल गया है। जिस पारंपरिक चुनाव को कांग्रेस ने साधा था उसे 2013 के दिल्ली चुनाव और बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव ने बदल कर रख दिया। अबकी बार का चुनावी मुद्दा भ्रष्टाचार और महंगाई नहीं है अबकी बार कौन ज़्यादा ईमानदार है इसकी लड़ाई लड़ी जा रही है।


अगर बीजेपी दिल्ली को आसानी से फ़तह कर लेती है तो बाकि राज्यों में होने वाले चुनाव के राह आसान हो जाएंगें और अगर ऐसा नहीं होता है तो आने वाला वक्त इतिहास को कुछ और ही दे जाएगा। देश की राजनीति को तय करनेवाले राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव होने वाले हैं जहां अभी से ही मोदी को घेरने के लिए जनता परिवार का घेरा लगाया जा रहा है। इसलिए बाकि के क्षत्रपों को साधने के लिए बीजेपी को दिल्ली में भगवा झंडा लहराना ही होगा, ये तो बाद में देखा जाएगा कि ईमानदार छवि से आगे दिल्ली के ज़मीनी मुद्दों की बात होती है या नहीं। तो देखते हैं दिल्ली के दिल में कौन जगह बना पाता है।

Friday, 23 January 2015

इस शहर में नींद आती नहीं

  
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
गोद में आंचल के नीचे
सो कर बचपन में लौट जाते हैं

यहां सुकूं के पेड़ उगते नहीं
इस रोशनी में मुझे कुछ दिखता नहीं
यहां हर तरफ एक शोर है
और हर आदमी खामोश है

रंग बिरंगे जिस्म है
पर पैराहन पर दाग है
धुंधले चेहरे को दिखा
हर आइना बदनाम है

चलो कि परियों की दुनिया से
फिर एक बार घूम कर आते हैं
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं
उंचे इमारतों के नीचे
दबती कई जान है
तेरे सपनों के ख़ातिर
वो देता अपना बलिदान है

प्यार शब्द भर ही रहा
ना इसका कोई शब्दार्थ है
रिश्ते यहां कोई नहीं
पर रिश्तों का बड़ा बाज़ार है

ये हक़ीकत है तो छोड़ो
हम फिर सपनों में ही जी आते हैं....
इस शहर में नींद आती नहीं
चलो चलें मां से लोरी सुन आते हैं...।


Pranav jha

Tuesday, 13 January 2015

‘धर्मांतरण’ या ‘घर वापसी’ क्या होता है?



मजहब को जब सियासी रंग में रंगा जाता है तो मौलिकता की बात गौण हो जाती है। फिर धर्म के आगे सब कुछ अदृष्य दिखने लगता है। जिहाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद के बाद लव जिहाद और अब घर वापसीइसी का नतीजा है।
 
क्या है धर्मांतरणया घर वापसी’?
वैसे तो सामान्य रूप से धर्मांतरण का मतलब ही एक धर्म को बदल कर दूसरे धर्म को धारण करना होता है लेकिन अब इस शब्द का मतलब इतना सामान्य नहीं रहा, क्योंकि पूरे देश में इस शब्द का मतलब वृहद रूप में सामने आ रहा है। वैसे तो घर वापसी, धर्मांतरण का पर्यायवाची शब्द है लेकिन दोनों में अब अंतर हो गया है। घर वापसीका मतलब अब ये नहीं रहा कि जो घर से निकल गए थे या फिर घर छोड़ कर दूसरे के यहां चले गए थे या उनका फिर से घर को लौट जाना। घर वापसीअब सियासी डिक्शनरी का शब्द बन गया है। धर्मांतरण के इस पर्यायवाची शब्द घर वापसीका मतलब अब ये है कि जो हिंदू भाई कभी गलती कर के अपना धर्म बदल लिए थे या दूसरे धर्म को अपनी पहचान बना लिए थे उन्हें फिर से अपने धर्म में वापस लाना ही इसका मूल भावार्थ हो गया है
आगरा में घर वापसीकार्यक्रम के बाद जिस तरह पूरे देश की सियासी फिजा बदली उसके बाद धर्मांतरण और घर वापसीने एक बड़ी बहस को जन्म दिया।
अभी हाल में जब पूरे देश में चुनावी मौसम था उस वक्त बीजेपी के धर्मपर सवाल उस तरह नहीं उठाए जा रहे थे क्योंकि बीजेपी के घोषणा पत्र में धर्मकी जगह जनता के सर्वाँगीन विकास की बात कही गई थी। लेकिन सत्ता में आने के 6 महीने बाद ही बीजेपी इस बात को भूल गई और फिर से रंग और धर्म की सियायत में जा उलझी। इसी कड़ी में भगवा ब्रिगेड की नयी मुहिम घर वापसीको तरजीह ज़ोर-शोर से दी जाने लगी।  

कौन है राजेश्वर सिंह?
राजेश्वर सिंह का मानना है कि उन्होंने अलीगढ़ को इसलिए चुना क्योंकि अलीगढ़ में सबसे ज्यादा मुसलमान और इसाई की संख्या है। यहां 60 फीसदी मुसलमान राजपूत हैं जिन्होंने धर्म बदल लिया था, इसलिए जब उन्होने दोबारा से धर्म बदलने के लिए सोचा तो वे लोग विरोध में आ गए।

राजेश्वर सिंह वही है जो उत्तर प्रदेश में 'धर्मांतरण' या 'घर वापसी' की कमान संभाल रहा है। राजेश्वर सिंह समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट के मास्टरमाइंड असीमानंद और सुनील जोशी के साथ कई अन्य लोगों को भी जानता है जो ऐसे षड्यंत्र में शामिल रहा था। राजेश्वर सिंह धर्म जागरण समन्वय समिति के संयोजक रह चुका है साथ ही राजेश्वर सिंह के नेतृत्व में आगरा घर वापसी कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया गया था। फिलहाल राजेश्वर सिंह को छुट्टी पर भेज दिया गया है।

धर्मांतरण के लिए कानून पर बहस
वक्त के पन्नों को पीछे पलट कर देखा जा सकता है कि हिंदुस्तान की आजादी से पहले कई रियासतों ने धर्मांतरण विरोधी कानून तैयार किया था। रायगढ़ राज्य धर्मांतरण विधेयक 1936, पटना धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 1942, सरगुजा राज्य धर्मत्याग अधिनियम 1945। ये सारे आजादी से पहले राज्यों के द्वारा बनाए गए धर्मांतरण के विरोधी कानून है। लेकिन भारतीय दंड संहिता भाग-3 के अनुच्छेद 25-28 के अंतर्गत भारतीय नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि कोई भी नागरिक अपने मन से किसी भी धर्म को स्वीकार कर सकता है। कोई भी धार्मिक कार्य कर सकता है और किसी भी धार्मिक संस्थान से जुड़ कर उस धर्म के विस्तार के लिए कार्य कर सकता है।
लेकिन स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी भी धर्म को मनवाने के लिए किसी भी व्यक्ति को जबरन या धोखे से या फिर प्रलोभन दे कर उसका धर्मांतरण करवा दें, पर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए देश के कई हिस्सों में इस कार्य को अंजाम दिया गया तब 1968 में मध्य प्रदेश सबसे पहला राज्य बना जहां धर्म परिवर्तन को नियमित करने के लिए कानून बनाया गया। फिर 2013 में इस कानून में संसोधन किया गया। जिसके तहत पहले धर्म परिवर्तन के लिए मंजूरी लेना अनिवार्य हो गया और जबरन धर्म परिवर्तन करवाने पर कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया।
इसके बाद इस कानून को लेकर देश के कई अन्य हिस्सों में बहस चलती रही। लेकिन हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के आगरा में धर्म जागरण मंच ने जो हालात पैदा किए हैं, उससे कई लोग संघ द्वारा बीजेपी को एक केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित करवाने में मदद करने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। पूर्व गृह सचिव जी.के पिल्लै कहते हैं कि अगले 12 महीने में इस आशय का कानून अस्तित्व में आ सकता है, लेकिन जब कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून है और समय-समय पर विभिन्न अदालतों ने उन्हें मान्यता दी है तो राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कानून की जरूरत पर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं।


सियासत के तराजू में धर्म का पलड़ा हमेशा ही भारी रहा है। चाहे वो संप्रग, कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर बीजेपी या एनडीए की, धर्म की भूमिका हमेशा ही व्यापक रही है। किसी ने मुस्लिम राग अलापा तो किसी ने हिंदू कार्ड खेला। लेकिन विकास के क्षितिज पर दोनों समुदाय उपेक्षित ही रहे हैं। भगवा ब्रिगेड के इस घर वापसीके मुद्दे को सियासत में कौन सा पड़ाव मिलेगा ये तो देखने वाली बात होगी। लेकिन आगे के दिनों में हिंदुस्तान के हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले चुनाव पर इसका रंग जरूर दिखेगा। 

Pranav Jha

Sunday, 4 January 2015

संगम का डूबता अस्तित्व

 जहां हर-हर गंगे की जयघोष से आसमां भी भक्ति रस में डूब जाता है और जहां का हर कदम एतिहासिक और हर पद्चिन्ह इतिहास हो वो प्रदेश उत्तर प्रदेश कहलाता है।
अगर आज भी हिंदुस्तान अपनी ऐतिहासिक पहचान को बताने के लिए अपने तन के किसी एक हिस्से को चुनेगा तो वो है उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश का जर्रा-जर्रा ऐतिहासिक हिदुस्तान को अपनी पहचान से नवाज रहा है।

जब यहां दक्षिण पंथ या वाम पंथ या फिर समाजवाद, सेकुलरवाद, हिंदु राष्ट्रवाद नहीं था उस वक्त गंगा-जमुना तहजीब की संस्कृति थी। जिसकी पहचान खान-पान, नाच-गाना, शायरी-कव्वाली, धर्म-दर्शन था।

संगम की धरती उत्तर प्रदेश यूं ही नहीं संगम की धरती है यहां सिर्फ नदियों का ही संगम नहीं होता यहां संस्कृति का, भाषा का, धर्म का, संप्रदाय का और इंसानियत का भी संगम होता रहा है। उदाहरण के लिए इतिहास में जाए तो मुसलमान बादशाहों के दरबार में हिंदु दरबारी हुआ करते थे और हिंदू राजाओं के दरबार में मुसलमान, तुर्क और अफगानी। कोई भी एक दूसरे के रास्ते में नहीं आते थे। हर कोई एक दूसरे के मजहब को इज्जत देते थे। उत्तर प्रदेश की धरती ने महापुरषों और बादशाहों को जन्म दिया है।

हिंदू-मुस्लिम के तहजीब के लिए उत्तर प्रदेश की धरती को लोग उदाहरण मानते थे। पर दौर बदल चुका है तस्वीर बिलकुल ही उलट हो गई है। अब ना तो तहजीब बची और ना वो संस्कृति। पता नहीं किसकी नजर लग गई इस पाक भूमि को। आज यहां का इतिहास जले मकानों और उजड़े गांव में अपना मूंह छिपता फिर रहा है। यहां कि पहचान अब इंसानी खूनी रंगोँ में रंग चुका है वो अपना भूत भूल चुका है और वर्तमान को स्वीकार कर चुका है क्योंकि यहां कि संस्कृति तकसीम हो चुकी है। हर-हर गंगे का जयघोष तो होता है पर हर जयघोष के साथ भक्ति नहीं नफरत का गुबार निकलता है और आसमां लाल हो जाता है। इस सुबे का एक हिस्सा चुप नहीं होता कि दूसरा हिस्सा गला फाड़ कर रोने लगता है।

जिस समाजवाद के आइने में लोहिया ने भारत का भविष्य देखा था उसी आइने के समाने उत्तर प्रदेश अपना निरुत्तर चेहरा लेकर खड़ा है। इस प्रदेश के जिस्म पर इतने जख्म हैं कि आज अगर लोहिया आए तो भी इसके हर जख्म पर मरहम नहीं लगा पाएंगे।
वैसे तो आजादी से पहले ही तहजीब को मजहब की लकीरों से दो फाड़ कर दिया गया था पर समाजवाद, हिंदुवाद और राष्ट्रवादों ने इस लकीर को मिटाने के लिए बहुत कोशिश की पर आज की तस्वीर देख कर तो ऐसा ही लगता है कि ये लकीर इतनी आसानी से नहीं मिटेगी। इसके लिए फिर से भगवान को इंसान बन कर पैदा लेना होगा और यहां पर मुर्दे इंसानों को इंसानियत का पाठ पढ़ाना होगा।         

जो प्रदेश 14वीं सदी में शांति का पैगाम देने वाले सूफी संत हारुन चिश्ती का ठिकाना था आज उसी प्रदेश की शांति गंगा के तट पर जा कर अशांत बैठी है और प्रदेश में कौमी दंगे और अराजकता का नंगा नाच हो रहा है।
हिंदुस्तान को हमेशा से दिशा दिखाने वाला यह प्रदेश आज किस दिशा में जा रहा है किसी को नहीं पता। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि यहां पर रहने वाले लोगों को ये नहीं पता कि अगली ईद या दिवाली वो माना पाएंगे भी या नहीं। इस प्रदेश में सूरज भी रोज सहमा-सहमा निकलता है और हर शाम मौत के साए में ढलता है। रात इतनी काली होती है कि कोई अपने आप को भी नहीं पहचान पाए।

आखिर क्या हो गया है इस प्रदेश को। किसकी नजर लग गई इसके तहजीब को। सियासत की ऐसी कौन सी भूख ने यहां की भाईचारे को खा लिया। आखिर वो कौन सा सिंहासन है जो लाशों की ढेर से ही बनता है। आखिर वो कैसा समाजवाद है जहां महजब की दीवार में इंसान को चुन दिया जाता है।

मुझे याद नहीं है, क्या ये वहीं हिंदुस्तान है जहां अकबर अपनी बादशाहत से अकबर बने थे और क्या यह वही प्रदेश है जहां तुलसीदास रसखान, कबीर और न जाने कई हस्तियां इस धरती पर पैदा हुए थे। लेकिन आज अपनी जन्मभूमि की ऐसी हालत को देख कर वो भी शर्मिंदा होंगे।


Pranav jha