जहां हर-हर गंगे की जयघोष से आसमां भी भक्ति रस में डूब
जाता है और जहां का हर कदम एतिहासिक और हर पद्चिन्ह इतिहास हो वो प्रदेश उत्तर
प्रदेश कहलाता है।
अगर आज भी हिंदुस्तान अपनी ऐतिहासिक पहचान को बताने के लिए
अपने तन के किसी एक हिस्से को चुनेगा तो वो है उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश का
जर्रा-जर्रा ऐतिहासिक हिदुस्तान को अपनी पहचान से नवाज रहा है।
जब यहां दक्षिण पंथ या वाम पंथ या फिर समाजवाद, सेकुलरवाद,
हिंदु राष्ट्रवाद नहीं था उस वक्त गंगा-जमुना तहजीब की संस्कृति थी। जिसकी पहचान
खान-पान, नाच-गाना, शायरी-कव्वाली, धर्म-दर्शन था।
संगम की धरती उत्तर प्रदेश यूं ही नहीं संगम की धरती है
यहां सिर्फ नदियों का ही संगम नहीं होता यहां संस्कृति का, भाषा का, धर्म का,
संप्रदाय का और इंसानियत का भी संगम होता रहा है। उदाहरण के लिए इतिहास में जाए तो
मुसलमान बादशाहों के दरबार में हिंदु दरबारी हुआ करते थे और हिंदू राजाओं के दरबार
में मुसलमान, तुर्क और अफगानी। कोई भी एक दूसरे के रास्ते में नहीं आते थे। हर कोई
एक दूसरे के मजहब को इज्जत देते थे। उत्तर प्रदेश की धरती ने महापुरषों और
बादशाहों को जन्म दिया है।
हिंदू-मुस्लिम के तहजीब के लिए उत्तर प्रदेश की धरती को लोग
उदाहरण मानते थे। पर दौर बदल चुका है तस्वीर बिलकुल ही उलट हो गई है। अब ना तो
तहजीब बची और ना वो संस्कृति। पता नहीं किसकी नजर लग गई इस पाक भूमि को। आज यहां
का इतिहास जले मकानों और उजड़े गांव में अपना मूंह छिपता फिर रहा है। यहां कि
पहचान अब इंसानी खूनी रंगोँ में रंग चुका है वो अपना भूत भूल चुका है और वर्तमान
को स्वीकार कर चुका है क्योंकि यहां कि संस्कृति तकसीम हो चुकी है। हर-हर गंगे का
जयघोष तो होता है पर हर जयघोष के साथ भक्ति नहीं नफरत का गुबार निकलता है और आसमां
लाल हो जाता है। इस सुबे का एक हिस्सा चुप नहीं होता कि दूसरा हिस्सा गला फाड़ कर
रोने लगता है।
जिस समाजवाद के आइने में लोहिया ने भारत का भविष्य देखा था
उसी आइने के समाने उत्तर प्रदेश अपना निरुत्तर चेहरा लेकर खड़ा है। इस प्रदेश के
जिस्म पर इतने जख्म हैं कि आज अगर लोहिया आए तो भी इसके हर जख्म पर मरहम नहीं लगा
पाएंगे।
वैसे तो आजादी से पहले ही तहजीब को मजहब की लकीरों से दो
फाड़ कर दिया गया था पर समाजवाद, हिंदुवाद और राष्ट्रवादों ने इस लकीर को मिटाने
के लिए बहुत कोशिश की पर आज की तस्वीर देख कर तो ऐसा ही लगता है कि ये लकीर इतनी
आसानी से नहीं मिटेगी। इसके लिए फिर से भगवान को इंसान बन कर पैदा लेना होगा और
यहां पर मुर्दे इंसानों को इंसानियत का पाठ पढ़ाना होगा।
जो प्रदेश 14वीं सदी में शांति का पैगाम देने वाले सूफी संत
हारुन चिश्ती का ठिकाना था आज उसी प्रदेश की शांति गंगा के तट पर जा कर अशांत बैठी
है और प्रदेश में कौमी दंगे और अराजकता का नंगा नाच हो रहा है।
हिंदुस्तान को हमेशा से दिशा दिखाने वाला यह प्रदेश आज किस
दिशा में जा रहा है किसी को नहीं पता। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि यहां पर रहने
वाले लोगों को ये नहीं पता कि अगली ईद या दिवाली वो माना पाएंगे भी या नहीं। इस
प्रदेश में सूरज भी रोज सहमा-सहमा निकलता है और हर शाम मौत के साए में ढलता है।
रात इतनी काली होती है कि कोई अपने आप को भी नहीं पहचान पाए।
आखिर क्या हो गया है इस प्रदेश को। किसकी नजर लग गई इसके
तहजीब को। सियासत की ऐसी कौन सी भूख ने यहां की भाईचारे को खा लिया। आखिर वो कौन
सा सिंहासन है जो लाशों की ढेर से ही बनता है। आखिर वो कैसा समाजवाद है जहां महजब
की दीवार में इंसान को चुन दिया जाता है।
मुझे याद नहीं है, क्या ये वहीं हिंदुस्तान है जहां अकबर
अपनी बादशाहत से ‘अकबर’ बने थे और क्या यह
वही प्रदेश है जहां तुलसीदास रसखान, कबीर और न जाने कई हस्तियां इस धरती पर पैदा
हुए थे। लेकिन आज अपनी जन्मभूमि की ऐसी हालत को देख कर वो भी शर्मिंदा होंगे।
Pranav jha

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