Sunday, 26 May 2013

आखिर कब तक?

धूंए के साथ सोना
धूंए के साथ उठना
और फिर धूंए बन उड़ जान
आखिर कब तक...?

आंख मीचते ब्रश के साथ
साबून की खुशबू को चुमना
ना शर्ट को इज्जत देना
ना जूते को रस्सी से आजाद करना
आखिर कब तक...?

खाने की जिद्द में
खाने को ही भूल जाना
रीत-रिवाज घर की परंपरा को ठेंगा दिखान
आखिर कब तक....?

हेलमेट की मुलायम फोम से
बालों को रैंदना
नुकिली लोहे की छड़ को
बाइक में चुभाना
फिर उसकी कान मड़ोड़
उसके धूंए के साथ उड़ जाना
आखिर कब तक....?

पहुंच सपनों की दुनिया में
अपने ख्वाबों को टूटते देखना
वीओसी आईड़ी के चक्कर में
की बोर्ड पर यूं ही ऊंगली को चकराना
आखिर कब तक...?

पश्चिमी डेस्क से आती आवाजों पर
बिना रंज हुए तेबर दिखाना
बिना काम भी काम दिखाना
और आवाजों की ऊंचाई से
खुद को सबसे अहम बनाना
आखिर कब तक...?

आपस में हुई बातों को
प्यार इश्क मुलाकातों को
बॉस से लेकर इंटरन तक फैलाना
आखिर कब तक...?

थक हार कर छोड़ दफ्तर को
शाम जले घर आना
सूबह से लेकर शाम तक कि
हर सीन को रिवर्स कर देखना
फिर वहीं रोज का झंझट खाने की जुगत
और तलब की आग में रोटी जले खुद पक जाना
आखिर कब तक...?????

प्रणव झा

मेरा बचपन बिक रहा है...

जाओ तुम भी
अपनी किस्मत आजमाओ...
लगा सकते हो तो
कीमत लगाओ...
वो घर नहीं
मेरा बचपन बिक रहा है...

हर सांस हर लम्हा
जिंदगी बिक रही है...
पर तुम तो जा रहे हो
मेरे हाथों की लकीर बेच कर...
हर पल हर सांस को छीन कर
तो जाओ...
जाओ तुम भी
अपनी किस्मत आजमाओ...
लगा सको तो
कीमत लगाओ...

(27-11-2012 को नेहा द्वारा लिखी ये कविता)


रिपोर्ट कार्ड या तस्सली

यूपीए-2 ने अपने दोनों पारी को मिला कर 9 साल पूरे करने पर जब जनता के सामने अपने रिपोर्ट कार्ड पेश किए तो तमाम उपलब्धियों की छड़ी लगा दी और देश के विकास संबंधी हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को दर्ज करवा....और देश के अवाम को खुशहाल बनाने के लिए हर काम किए...ऐसा यूपीए के रिपोर्ट कार्ड में दर्ज है...।

पर मामला यहीं आ के खत्म नहीं होता...अगले साल चुनाव है और विपक्षी पार्टी भी किसी भी मोर्चे पर सरकार को बकसने की मूड में नहीं दिख रही...रिपोर्ट के अनुसार तो यूपीए ने देश के विकास के हर क्षितिज को छूआ है...पर जब हम जमीनी तौर पर देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग ही बनती दिख रही है....पिछले 9 साल में देश की जनता टीवी और अखबार में तमाम घपले-घोटाले और इंसानियत को तार तार करने वाली ब्रेकिंग और हेडलाइन देख देख कर थक चुकी है...तस्वीर बदलने के लिए हाथ में मसाल मोमबत्ती और जब्जों पर इंकलाब भी आए पर इस सबका रिपोर्ट देखे तो ढाक के तीन पात ही हैं...क्योंकि जनता के द्वरा चुनी ये सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा जनाता चीख चीख कर चुप हो गई सरकार चीख सुन सुन कर भी चुप बैठी रही...।

रेल से लेकर खेल तक जो खेल खेला जा रहा है उसे भी जनता कान और आंख खोल कर देख सुन रही है...वो दौर खत्म हो गया जब नेता पूरे कार्यकाल के दौरन सिर्फ चुनाव के दिन अपने आकर्षक और लोक लुभवनी भाषण दे कर और जाती धर्म के नाम पर जनता को बांट कर अपनी जीत चुनाव से पहले ही पक्की कर लेते थे...समय के बिसात पर परिस्थियां अब और ही कुछ ही...लोग जागरुक हुए है...वो अब जनने लगे हैं और सही गलत में अंतर करना समझ चुके हैं...।

यूपीए सरकार अपनी उपलब्धियों का चाहे जितना भी पुल बांध ले...लेकिन वो जमीनी हकिकत को नहीं बदल सकती...और जमीनी हिकिकत क्या है वो 2014 के आम चुनाव में सबके सामने आ जाएगा..।
प्रणव झा