मजहब को जब सियासी रंग में रंगा जाता है तो मौलिकता
की बात गौण हो जाती है। फिर धर्म के आगे सब कुछ अदृष्य दिखने लगता है। जिहाद, आतंकवाद,
नक्सलवाद, उग्रवाद के बाद लव जिहाद और अब ‘घर
वापसी’ इसी का नतीजा है।
क्या है ‘धर्मांतरण’
या ‘घर वापसी’?
वैसे तो सामान्य रूप से धर्मांतरण का मतलब ही एक धर्म
को बदल कर दूसरे धर्म को धारण करना होता है लेकिन अब इस शब्द का मतलब इतना सामान्य
नहीं रहा, क्योंकि पूरे देश में इस शब्द का मतलब वृहद रूप में
सामने आ रहा है। वैसे तो ‘घर वापसी’, धर्मांतरण का पर्यायवाची
शब्द है लेकिन दोनों में अब अंतर हो गया है। ‘घर
वापसी’ का मतलब अब ये नहीं रहा कि जो घर से निकल गए थे या फिर
घर छोड़ कर दूसरे के यहां चले गए थे या उनका फिर से घर को लौट जाना। ‘घर वापसी’ अब सियासी डिक्शनरी का शब्द बन गया है। धर्मांतरण के
इस पर्यायवाची शब्द ‘घर वापसी’ का मतलब अब ये है कि जो
हिंदू भाई कभी गलती कर के अपना धर्म बदल लिए थे या दूसरे धर्म को अपनी पहचान
बना लिए थे उन्हें फिर से अपने धर्म में वापस लाना ही इसका मूल भावार्थ हो गया है।
आगरा में ‘घर
वापसी’ कार्यक्रम के बाद जिस तरह पूरे देश की सियासी फिजा बदली
उसके बाद धर्मांतरण और ‘घर वापसी’ ने एक बड़ी बहस को जन्म
दिया।
अभी हाल में जब पूरे देश में चुनावी मौसम था उस वक्त
बीजेपी के ‘धर्म’ पर सवाल उस तरह नहीं उठाए
जा रहे थे क्योंकि बीजेपी के घोषणा पत्र में ‘धर्म’ की जगह जनता के सर्वाँगीन विकास की बात कही गई थी। लेकिन सत्ता में आने के
6 महीने बाद ही बीजेपी इस बात को भूल गई और फिर से रंग और धर्म की सियायत में जा उलझी।
इसी कड़ी में भगवा ब्रिगेड की नयी मुहिम ‘घर
वापसी’ को तरजीह ज़ोर-शोर से दी जाने लगी।
कौन है राजेश्वर सिंह?
राजेश्वर सिंह का मानना है कि उन्होंने अलीगढ़ को इसलिए
चुना क्योंकि अलीगढ़ में सबसे ज्यादा मुसलमान और इसाई की संख्या है। यहां 60 फीसदी
मुसलमान राजपूत हैं जिन्होंने धर्म बदल लिया था, इसलिए
जब उन्होने दोबारा से धर्म बदलने के लिए सोचा तो वे लोग विरोध में आ गए।
राजेश्वर सिंह वही है जो उत्तर प्रदेश में 'धर्मांतरण' या 'घर वापसी' की कमान संभाल रहा है। राजेश्वर सिंह समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद
विस्फोट के मास्टरमाइंड असीमानंद और सुनील जोशी के साथ कई अन्य लोगों को भी जानता है
जो ऐसे षड्यंत्र में शामिल रहा था। राजेश्वर सिंह धर्म जागरण समन्वय समिति के संयोजक
रह चुका है साथ ही राजेश्वर सिंह के नेतृत्व में आगरा घर वापसी कार्यक्रम को अंतिम
रूप दिया गया था। फिलहाल राजेश्वर सिंह को छुट्टी पर भेज दिया गया है।
धर्मांतरण के लिए कानून पर
बहस
वक्त के पन्नों को पीछे पलट
कर देखा जा सकता है कि हिंदुस्तान की आजादी से पहले कई रियासतों ने धर्मांतरण विरोधी
कानून तैयार किया था। रायगढ़ राज्य
धर्मांतरण विधेयक 1936, पटना धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 1942, सरगुजा राज्य धर्मत्याग
अधिनियम 1945। ये सारे आजादी से पहले राज्यों के द्वारा बनाए गए धर्मांतरण के विरोधी
कानून है। लेकिन भारतीय दंड संहिता भाग-3 के अनुच्छेद 25-28 के अंतर्गत भारतीय नागरिक
को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि कोई भी
नागरिक अपने मन से किसी भी धर्म को स्वीकार कर सकता है। कोई भी धार्मिक कार्य कर सकता
है और किसी भी धार्मिक संस्थान से जुड़ कर उस धर्म के विस्तार के लिए कार्य कर सकता
है।
लेकिन स्वतंत्रता का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी भी
धर्म को मनवाने के लिए किसी भी व्यक्ति को जबरन या धोखे से या फिर प्रलोभन दे कर उसका
धर्मांतरण करवा दें, पर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए देश के कई हिस्सों में
इस कार्य को अंजाम दिया गया तब 1968 में मध्य प्रदेश सबसे पहला राज्य बना जहां धर्म
परिवर्तन को नियमित करने के लिए कानून बनाया गया। फिर 2013 में इस कानून में संसोधन
किया गया। जिसके तहत पहले धर्म परिवर्तन के लिए मंजूरी लेना अनिवार्य हो गया और जबरन
धर्म परिवर्तन करवाने पर कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया।
इसके बाद इस कानून को लेकर देश के कई अन्य हिस्सों में
बहस चलती रही। लेकिन हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के आगरा में धर्म जागरण मंच ने
जो हालात पैदा किए हैं, उससे कई लोग संघ द्वारा बीजेपी को एक केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी
विधेयक पारित करवाने में मदद करने के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। पूर्व गृह सचिव
जी.के पिल्लै कहते हैं कि अगले 12 महीने में इस आशय का
कानून अस्तित्व में आ सकता है, लेकिन जब कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून है
और समय-समय पर विभिन्न अदालतों ने उन्हें मान्यता दी है तो राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कानून
की जरूरत पर भी कई लोग सवाल उठा रहे हैं।
सियासत के तराजू में धर्म का पलड़ा हमेशा ही भारी रहा
है। चाहे वो संप्रग, कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर बीजेपी या एनडीए की, धर्म की
भूमिका हमेशा ही व्यापक रही है। किसी ने मुस्लिम राग अलापा तो किसी ने हिंदू कार्ड
खेला। लेकिन विकास के क्षितिज पर दोनों समुदाय उपेक्षित ही रहे हैं। भगवा ब्रिगेड के
इस ‘घर वापसी’ के मुद्दे को सियासत में
कौन सा पड़ाव मिलेगा ये तो देखने वाली बात होगी। लेकिन आगे के दिनों में हिंदुस्तान
के हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले चुनाव पर इसका रंग जरूर दिखेगा।
Pranav Jha


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