पता चला कि लखनऊ के मोहनलालगंज के इंस्पेक्टर कमरुद्दीन खान सस्पेंड कर
दिए गए और साथ में एसआई मुन्नीलाल को भी अपदस्त कर दिया गया। सही मायनो में
काबिलेतारीफ हैं। अखिलेश यादव, इतना क्वीक एक्शन!
शायद आप भी सोच रहे होंगे कि ये सब क्या है? जी, क्या करें अब तो बस ऐसा ही है, क्योंकि अब मन में भवनाओं
के लिए जगह नहीं है मर चुकी संवेदना पूरी तरह से। हां, मरे भी क्यों नहीं इलाज
नहीं होगी तो असमय मौत तो आती ही है ना।
अब आंख में आंसू भी नहीं है कि आंसू बहा कर दिल हल्का कर लेते। क्योंकि लखनऊ
के मोहनलालगंज में जिस वारदात को अमानुषों ने मुक्मल किया है उसे देखने और सुनने
के बाद शून्य की स्थिति में चला गया हूं।
हम पूजा इबादत और विश इस लिए करते हैं क्योंकि अदृष्य शक्तियों से हम बच सके
जिसका समाना हम नहीं कर सकते क्योंकि वो दिखाई नहीं देती है। पर अब ऐसा नहीं है
हमारे समाज में ही इतने असूर पैदा ले लिए की अब किसी की पूजा इबादत की जरूरत ही
नहीं, वो अब हमारे आंखों के सामने आकर हमारी आत्मा पर वार कर के हमें मरने से पहले
सौ बार मार कर जिंदा हमारी आंखों के सामने रहते हैं फिर भी हम गूंगे बहरे और
अपाहिज कि तरह बस मन मसोस कर जिंदा लाश बन सिसकते रहते हैं।
बदायूं का पेड़ आज भी अपना सीना फाड़े चितकार कर ही रहा है कि लखनऊ के एक
विद्या का मंदिर का आबरू बेआबरू हो गया। जहां 4-5 वहशियों ने
गैंगरेप के दौरान युवती को डंडे से जमकर पीटा। गैंगरेप के बाद
डंडे को उसके प्राइवेट पार्ट्स में डालकर घुमा दिया। युवती के सिर, गर्दन, पीठ और चेहरे पर 12 चोटें मिली हैं
और अत्याधिक खून बहजाने से उसकी मौत हो गई। साथ ही उसकी निर्वस्त्र लाश को झाड़ी
में फेंक दिया।
अखिलेश जी पता तो चला ही होगा, हां तभी तो दो लोग सस्पेंड कर दिए गए। हो गया
आपका काम, अब आप रात में आराम से सो जाइएगा। हिसाब तो कर दिए आप!
उस स्कूल की सरस्वती भी मूंह छुपा कर भाग गई और वहां कि धरती भी उस युवती के
जिस्म से निकले खून को अपने कोख के अंदर ले ली। वो सूख गया अब। पर वो जमीन खामोश
है क्योंकि वो रो नहीं सकती वो चीख नहीं सकती और ना ही अपने सीने की फाड़ को दिखा
सकती है। अपनी बेटी की साथ तो वो भी मर गई क्योंकि जिस मां के सीने पर उसकी बेटी
के साथ हैवानियत का नंगा नाच हुआ हो वो मां कैसे जिंदा रह सकती है?
ऐसा क्यों हो रहा है अखिलेश जी आप के रियासत में? क्यों नहीं छोड़ देते आप
सियासत जहां आप अपने रियाया की जान की छोड़िए आन की भी रक्षा नहीं कर सकते। जहां
इज्जत बाजारू और सिसायत शान समझी जाती है क्यों नहीं आप को शर्म आती है।
दिक्कार है,
आज हिंदुस्तान के इतिहास की आंखे कभी नहीं सूखती होगी जहां सभ्यता पहचान और
मानवता धर्म हुआ करता था। आज कहां जा के छिप गए हैं संस्कृति के ठेकेदार? कहां जिंदा लाश बन कर घूम
रहे हैं समाजवादी। वाह रे समाजवाद...!
ये वहीं हिंदुस्तान है ना, जहां दुर्गा को पूजते हैं, लक्ष्मी की अरधाना करते
हैं, जहां सरस्वती को देवी कहते हैं और औरत को शक्ति। शर्म आती है हिंदुस्तान के
इस बदकिस्मत हकीकत पर! धिक्कार है ऐसे
समाजवाद पर, धिक्कार है ऐसी संस्कृति पर.....।
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