Monday, 24 December 2012

सच का सामना



दिन आज का बड़ा सुहाना
मैसम भी बड़ा रुमानी था
चोरों तरफ धनेरे बादल
आसमां बरसने को बेकाबू था..
घटाओं की ओंट में आज
सूरज चांद सा दिखने वाला था..
कौन जानता है?
किस्मत की लकीरों को
आज ये आसमां तो
कहर बरपाने वाला था
बुझ गया था
सूरज भी अब तो..
ना चांद दिखनेवाला था..
खड़ा था मैं उस रास्ते
की मोड़ पर
जहां कोई नहीं आनेवाला था
अंधेरा था विरानी थी
रात तो नहीं थी
पर रात की रवानी थी
सोच जिसके लम्स मात्र से
रूह खड़ी हो जाती है
उस मोड़ पर आज सच
से सामना होने वाला था
रिश्तों की कच्ची डोर थी
बंधा हर तरफ मैं दिवाला था
देखा नहीं था जिस जगह को
वो आज उसी से वास्ता होने वाला था
टूट गई हर रिश्तों की डोर
मुहब्बत दोस्ती अब अफसाना था
मेरा मुझ में कुछ नहीं था
हर सय आज मिटने वाला था
मुकम्मल वही जो कभी ना हारे
वो भी एक जमाना था
आज खड़ा हूं मुकम्मल जहां में
जब सब कुछ खोने वाला था...।

प्रणव झा

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