Wednesday, 2 January 2013

हम समाजिक है ?


                       हम समाजिक है या नहीं अब इस पर शक गहरा गया है...इस देश की जनता समाजिक है या नहीं...उन्हें पता नहीं...क्योंकि पहली बार जब भारत रायसीना हिल्स जहां देश के राष्ट्रपति और देश के पहले नागरिक निवास करते है... कि ओर अपनी दास्तां अपनी पीड़ा को लेकर बढ़ा और अपने आने की दस्तक दी कि महामहीम हमारी अर्ज सुनो...हमेशा विदेशियों और महत्वपूर्ण व्क्ततियों के शान के इस महफिल से निकला आंसू गैस के गोलो, पानी का बौछार और लाठियों की झूंड...।

लोकतंत्र में जनता को बोलने की आवाज बुलंद करने का और अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है...पर जब रायसीना हिल्स से लेकर जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर दिल्ली पुलिस ने अपना बर्बर रूप दिखाई उससे एक बार फिर से गुलाम भारत की छवि उभर कर सबके सामने आई..।

दिल्ली पुलिस की अमानविए व्यवहार हमें इस शक के दायरे में ला दिया...जब अपनी आवाज को सुनाने के लिए जनता जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर इक्ठ्ठे हो कर शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे थे...इनकी आवाज सुनने ना तो हुक्मरान का ही कोई नुमाइंदा आया और ना ही अपील...आई तो सिर्फ दिल्ली पुलिस और अपने साथ में लाई आंसू गैस के गोले और वॉटर कैनन..और करने ढाहने लगी बेकसूर जनता पर अपना जुल्मों सितम...।इस आंदोलन का दमन करने के लिए दिल्ली पुलिस को जिस हद तक नहीं जाना चाहिए था उस हद को भी पार किया और सादे लिबास में आ कर महिलाओं को जबरन पकड़ कर बस और पुलिस वैन में डालने लगी...दिल्ली पुलिस इस आंदोलन से इतना उत्तेजित हो गई कि वो पूरे देश में इन आंदोलनकारी की आवाज पहुंचाने वाला लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानि मीडिया को भी नही बख्सा और उसके कैमरे और सामन को भी तोड़ा और लाठियों से वार किया...जिसमें कई निर्दोष मीडिया कर्मी घायल हो गए...।

पर विडंबना ये है कि इन सारी बातों से अबगत रहते हुए भी सरकार ने कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाई...और ना ही जनता के बीच आ कर किसी प्रकार का आशावसन ही दिया...।

हद तो तब हो गई जब सरकार के एक नुमाइंदे ने इस आंदोलन के पीछे असमाजिक तत्व का हाथ होने की बात कर के इस आंदोलन का दबाने बात कही...।
कुर्सी के मद में अंधी इस सरकार को जनता अब असमाजिक लगने लगी है..वो इससे बात करना भी ठीक नहीं समझती...और उसकी आवाज को दबाने के लिए तानाशाही फरमान के साथ हर कोशिश करने के लिए तैयार है...। पहले से भ्रष्टाटार में लिप्त इस सरकार के खिलाफ जब जब आबाज उठाई गई तब-तब इसका बर्बर रूप देखने को मिला है...जिसकी गवाही इतिहास देता है।

16 दिसंबर की रात को दिल्ली के एक फर्जी यात्री बस में जिस तरके से इंसानित को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम दिया गया उसके बाद पूरे देश में असंतोष का माहौल बनाने लगा...ये माहौल आज अचानक ही नहीं बना ये बरशों से महिलाओं के प्रति किए जा रहे अमानविए व्यवहार से पैदा हुआ..जिसे लोग अपने सीने में दफन कर बैठे हुए थे...।पर जब फिर से एक बार उनके जख्मों को कुदेरा गया तो बरशों पुरानी शांत ज्वालामुखी फट पड़ा...। और इस ज्वालामुखी को बंद करने और दबाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है...। पर ये नादान हुक्मरान ये नहीं समझ रही की जब जब जनता अपना अस्तित्व को बनाने रखने के लिए सड़कों पर उतरती है तख्तो-ताज को बदल कर ही शांत हुई है...।

हमारे समाज में महिला हमेशा से ही पुरषों के हाथों पीसती आई है...और अपनी संवेदना और अपनी आजादी को अपनी आंखों से बहा कर आंचल से पोछती आ रही है...आज हमरा समाज जब महिलाओं को पुरुषों के समक्ष समरूप मानने की बात कर रहा है तो क्या हम बातों से ही उसे उसका अधिकार देंगे या मानसिक रूप से हम इस को स्विकार करेंगे...। आज हम बरशों से चली आ रही समाज में गलत परंपरा को तोड़ने की बात करते है वही हम महिलाओं के प्रति हो रहे आत्याचार व्यवचार को कैसे सहेंगे...अब समय आ गया है जब हम अपनी नैतिकता का ध्यान रखते अपनी नजरिया को बदले...और एक स्वछ और सभ्य समाज बनाने की ओर अग्रसर हो...इसके लिए पहले हमें खुद को बदलना होगा क्योंकि जब तक हम खुद की मानसिकता को नहीं बदलेंगे महिलाओं के प्रति अपनी नजरिया को नहीं बदलेंगे तब तक एक सभ्य समाज की कल्पना नहीं कर सकते...।

आज जब कश्मीर से कान्याकुमारी तक पूरा देश इस जघन्य अपारध के प्रति एक हो चुका है और इस मुद्दे को गंभिरता से लिया है उसी प्रकार से सरकार को और सभी राजनीतिक दल को भी एक साथ मिलकर इस मुद्दे के प्रति गंभिरता दिखानी चाहिए...। और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर महिला सशक्तिकरण के बुलंद नारे को और बुलंद बनाने के लिए कड़े और कठोर कानून बनाने की तरफ अपनी रूख करनी चाहिए..। ताकि फिर से कोई देश शर्मसार ना हो और ऐसी वारदात को अंजाम देने से पहले सौ बार सोचे...। अगर ऐसा करने के लिए संविधान में संसोधन करने की जरूरत पड़े तो सब दल एक हो कर संसोधन की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाए।
प्रणब झा

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