पर अगर एक नजर हम
आजादी के बाद के वर्षों पर दें तो हमारे विश्वास कई बार तोड़ा गया और तोड़ने का
सिलसिला लगातार अभी तक चलता ही आ रहा है...आजादी के अगले वर्ष जब हम आजादी की पहली
सालगिरह मना रहे थे तभी देश को जीप धोटाले ने हमारे निजाम के ईमानदारी पर एक काले
सवाल का दाग चस्पा कर दिया और शुरू हो गया धपले धोटालों का दौर...1981 में
पनडुब्बी धोटला,1986 में बोफोर्स घोटाला जिसमें दिवंगत पूर प्रधानमंत्री राजीव
गांघी की ईमानदारी को अपने स्याह दामन में लिया पर हाल में ही सर्वोच्य न्यायालय
ने उनके दामन को पाक साफ बताया...पर इससे तत्कालिन सरकार का दमान नहीं साफ होता...फिर
1996 मिसाइल घोटाला,1999 में ताबूत धोटाला, 2003 में राइफल धोटाला, 2005 में लीक
प्रकरण, 2009 में ओएपबी कांट्रेक्ट फिक्सिंग, 2011 में टेट्रा ट्रक धोटला और अब
2013 में हेलीकॉप्टर घोटाला...।
ये तमाम धोटालें
हमरे सिस्टम को एक नई परिभाषा देने के लिए काफी साबित हो रहे है...। धपले धोटाले
और भ्रष्टाचार के इस दौर में सबसे बड़ा सवाल ये निकल कर आता है कि आखिर हम किस आधर
पर कहें कि हम अपने मुल्क में सुरक्षित है क्या हमारे निजाम हमें इसका भरोसा
देंगे...अगर औपचारिकता बस वो हमें ये भरोसा देते भी है तो हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली
में होते बम धमाके आतंकी हमले इनके वादों का पोल समय-समय पर खोल कर रख देता है...।
बात यहीं जा के खत्म नहीं होती ये सारे हमले तो देश की परिधी के बाहर से होता है
जिससे सीमा सुरक्षा और इंटेलिजेंस ब्यूरो की सक्रियता को सवाल के धेरे में लेता ही
है...अब बात करे देश की आंतरिक मामलों की तो हम यहां और भी हताश हो जाते
हैं...माओवाद, नक्सलवाद, भगवा आतंकवाद और सबसे बड़ा ठेकेदार हम यहां भी उतना ही
पंगू साबित होते है जितना हम बाहरी आतंकबाद से लड़ने में...। जहां पूरे मुल्क का
सुरक्षा का भार उठाए हमारे सेना में भ्रष्टाचार का इस कदर बोलवाला है वहीं देश के
आंतरिक सुरक्षा का ठेका उठाए हमारे कानून और प्रशासनका जमीर भ्रष्टाचार के सामने
झुक चुका है और ये पूरी तरह से नकार साबित होते ही जा रहे है...।
हाल फिलहाल में
हेलीकॉप्टर घोटाले ने देश के उस जख्म को फिर से हरा कर दिया है जो जख्म देश को
बोफोर्स घोटाले ने दियाऔर एक बार फिर से देश के हुक्मरान से लेकर सैन्य प्रमुखों
के विश्वसनियता को सवाल के कटघरे में ला कर खड़ा कर दिया है...।अब सवाल सिर्फ
सैन्य प्रमुखों और सेनाओं की विश्वसनियता तक ही सीमित नहीं रहा सवाल अब भारत के
1.5 करोड़ लोगों के अस्तिवत्व का है...जो अपने आप को 24 घंटे असुरक्षित महसूस कर
रहे हैं..चाहे वो भारत का कोई गांव हो या शहर...और भारत सरकार की रुख सुरक्षा को
लेकर जो है वो बहुत ही हताश करने वाला है...हमारे सेना के पास ना तो आधुनिक हथियार
है और ना ही आधुनिक तकनीक और इस बार बजट में वित्त मंत्रालाय ने रक्षा-बजट में 10
हजार करोड़ का कटौती की है जिसका असर निश्चित तौर पर हमारी सेना पर पड़ेगा ही और
हमारी सेना का गुणवत्त में कमी ही आएगी...।
इन सब के बीच भारत
को अपने पड़ोसियों से भी सतर्क रहन की जरूरत है जहां एक तरफ अंदरुनी भूचाल से जूझ
रहे पाकिस्तान हमेशा की तरह सरदर्द बना हुआ है और वहां की फौज अपने मुल्क में अपना
बर्चस्व बनाने के लिए भारत के अंदर गड़बड़ियां फैलाने से बाज नहीं आ सकता है...वहीं
अधिनाकवाद चीन भी पाकिस्तना के नापाक करगिस्तानी में अपनी समान्य भूमिका निभाता
हुआ नजर आ रहा है..और पाकिस्तना की मदद से वह हमारी सेना पर भी नजर गड़ए हुए है
वहीं 90 हजार वर्ग किलोमीटर के भारतीए क्षेत्र पर अपनी दावेदारी करता आ रहा
है...और हमारी सीमाओं पर उसकी हमेशा से निगेहवानी रही है...।
ऐसे में जो तस्वीर
उभर कर सामने आती है उस बाबत में रक्षा क्षेत्र में हमरी तैयारी भी पुख्ता होनी
चाहिए..और हम भी कभी भी किसी भी बाहरी मुसिबत से निपटने के लिए हमेशा तैयार
रहें...। पर हमरे देश के अंदर जो कोलाहल मचा है उसी में हम और हमारे निजाम झूझ रहे
है और उनके पास वक्त ही नहीं है कि उससे निकल कर इस मुद्दे पर भी विचार करें...।
हम भ्रष्टाचार के ऐसे अंधेरे कुएं में जा रहे जहां से निकलने कोई रास्ता ही नहीं
मिल रहा है...हम एक भ्रष्टाचार के जख्म से निकल भी नहीं पाते तबतक दूसरे घपले
घोटाले बोतल में बंद भूत की तरह बाहर आ जाता है...। आज हम देखे तो क्या गांव और
क्या शहर पूरा देश ही भ्रष्टाचार के अंधेर कुएं में जा कर गिर गया है और जहां से
निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा..। साफ है बाहरी विरोध और आंतरिक असंतोष के बीच
जो तस्वीर बनी रही है बहुत ही भायवाहक हो सकती है..।
ऐसे में अब हमरे
निजामों को देश के इस मुद्दे पर गौर करना ही चाहिए और हमारे फौज को और मजबूत बनाने
के तरफ कोई सकारात्मक कदम उठाना ही चाहिए...हमारे फौज में आज भी 30 हजार जवानों का
पद खाली है जबकि भारत में 65 फीसदी लोग 35 से कम उम्र के है ऐसी स्थिति में सैन्य
क्षेत्र में जवानों की कमी कहां तक तर्कसंगत है?और ऐसी ही स्थिति रक्षा के
हर क्षेत्र में है...अब अगर इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया और सेना को और
पारदर्शी नहीं बनाया गया तो देश को गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तौयार रहना
चाहिए...।
प्रणव झा
No comments:
Post a Comment