एफडीआई - सही या गलत
संसद में भारी हंगामा और यूपीए के धटक दलों को छोड़ कर करीब करीब हर सियासी दल के भारी विरोध के बाद भी कई सालों से लटका आफडीआई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में लाने का फैसला किया...जो एक साहसी कदम प्रधानमंत्री की ओर से उठाया गया...।
एफडीआई को लाने का फैसले के बाद पूरे देश में ताला लटका दिया गया...विपक्ष एक साथ आए और पूरे देश में बंद का नौटंकिया किया...इससे हासिल क्या हुआ? ये बाद कि बात है पर इस मुद्दे पर देश की सियासत में भारी उथल-पुथल मचा है...यूपीए के ही एक घटक दल तृणमूल कांग्रेस जिसकी अध्याक्षा ममता बनर्जी हैं उन्होंने कांग्रेस को फैसले पर विचार करने के लिए अल्टीमेटम तक दे दी और बाद में सर्त पर खड़े नहीं उतरने पर सरकार से अपनी भागीदारी वापस लेते हुए सरकार को अल्पमत में ला दिया...।
इन सब जिरह के बीच पहले हम ये जानते हैं कि एफडीआई है क्या बला?...आखिर इसके आने से आम लोग और देश को क्या नफा नुकसान हो सकता है?...इसके नाम मात्र से ही क्यों सियासत के दोस्त दुश्मन की भाषा बोलने लगे? क्यों इस मत पर सभी सियासी दलों का मतभेद है...।
एफडीआई यानि खुदरा व्यापार के क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश…। जिससे खुदरा व्यापारी, ग्राहक और देश की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर लाभ पहुंचेगा...जहां व्यापारियों को माल विक्राय संबंधी मामलों में लाभ होगा वहीं ग्रहकों को गुणवत्ता का लाभ होगा और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलगी...और देश सापिंग हब बन सकता है...खुदरा व्यापार का विस्तार होगा और उत्पादों के लिए उसकी मांग भी बढ़ेगी...बड़े शहरों में मध्य वर्ग के लोगों को खरिददारी का लाभ मिलेगा...ग्रहकों को किफायती कीमत पर बेहतरिन उत्पाद का लाभ मिलेगा... और देश की अर्थव्यवस्था में जान फुंकने वाले किसानों को बिचौलियों से मुक्ती मिलेगी और अपना समान सीधे बाजार तक पहुंचाएंगे और सही कीमत ले पाएंगे...विदेशी कंपनियों को कम से कम 30 फीसदी सामान भारतीए बाजार से ही खरिदना होगा जिससे लोगों को आय की समस्या कुछ हद तक दूर होगी...आज जो अन्न बाजार तक आते आते सड़ गल जाते है एफडीआई के आने से इस समस्या से निजात मिलेगी और सामान की सही कीमत भी मिलेगी...इन सब फायदो के बाद देश के विकास को भी रफ्तार मिलेगा...और विकास दर में भी सुधार होगा... जिसकी एक झलक हम दूरसंचार, वाहन और बीमा के क्षेत्र में हम देख सकते हैं...
इतना सब कुछ फायदे का होने के बाद फिर इस मुद्दे पर भारी असंतोष रहा है इसका मतलब क्या है...आखिर क्या अन्य सियासी दल नहीं चाहते की देश का हित हो क्या उनका इस फैसला का विरोध करना देश प्रेम को ठेंस पहुंचाना है क्या..? तो जानते हैं आखिर आफडीआई को लेकर इतनी मथापच्ची क्यों हैं क्यों इसपर भी सियासत की बिसात बिछाई जा रही है क्यों इस मुद्दे को सकारात्म की वजह नकारात्म लिया जा रहा है...क्यों हर नेता इस पर अपनी वाणी की बाण से एक दूसरे को घायल कर रह हैं...तो हम जानते हैं कि इसके पीछे का रहस्य क्या है...
भारत खुदरा कारोबार का देश रहा है यहां खुदरा बाजार ही बाजार की जान हैं और रोजगार का एक अनोखा साधन है खुदरा करोबार...गांव से लेकर शहर तक खुदरा बाजार एक अलग ही महत्व है...पर एफडीआई के आने के बाद खुदरा बाजार का अस्तित्व संकट में आ सकता है.. और जहां तक एफडीआई के विरोध का सवाल है तो इसके पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं...जो इस प्रकार हैं
एफडीआई का विरोध करने वाले कहते हैं कि खुदरा व्यापार में एफडीआई के आने से नौकरियां खत्म हो जाएगी और बेरोजगारी जो आग की तरह फैल रही है उसमें ये और घी डालने का काम करेगा...
एफडीआई के तहत लगने वाले सूपरमार्केट छोटे दुकान को निगल जाएंगे...जिसका जीता जागता सबूत हम यूरोप और अमेरिका के देशों में देख सकते हैं..
देश के जरूरी समानों पर विदेशी समानों का अकधिकार हो जाएगा..विदेशी कंपनियां सामान की कीमत को कम करके रखेंगे जिसका मुकाबले देसी सामान नहीं कर सकता जिससे देश में व्याप्त बेरोजगारी को एक और बल मिल जाएगा...
विदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार नहीं बल्कि बाजार पर कब्जा कर लेगी...जिसका असर 4 करोड़ लोगों पर पड़ेगा जो खुदरा बाजार से जुड़े हुए हैं...
देश में पहले से ही जिर्ण सिर्ण अवस्था में घरेलू उद्योग का अस्तित्व तक मिटा सकता है...जिससे उन लोगा का जीने का सहारा तक मिट जाएगा जिनका पेशा और रोजी रोटी का साधन भी यही है....
इन सब कारणों को अगर हम देखते हैं तो एफडीआई देश के लिए घातक हो सकता है...पर आज एफडीआई को लेकर कर जो देश में घामासान मचा है वो चिंता जनक ही नहीं बल्कि देश के लिए धातक भी हैं...पहले ही संसद का पूरा मॉनसुन सत्र हंगामें के भेंट चढ़ चुका है जिससे कई करोड़ रुपए का चुना देश को पहले ही लगा...अगर एफडीआई के कारण अगर मध्यविधि चुनाव होता हैं तो देश के खजाने को फिर से एक पलिता लगेगा...।
अगर एक बार हम इन मुद्दों से हट कर देश के बारे में सोचे तो ऐसा लगात है कि देश से तो किसी को मतबल है ही नहीं सबके सब अपनी जमीन को बचाने में लगे हुए हैं...देश का क्या होगा जनता का क्या होगा इसके बारे में किसी को सोच ही नहीं है एक के बाद एक मुद्दा बोतल में छुपे जीन की तरह निकला है और कुछ दिन तक अपना असर दिखा कर फिर से बोतल में बंद हो जाता है...।
अगर देश को बचाना है तो फिर से हमें ही सोचना होगा और पीछे की गई गलतियों से सबक लेना होगा...खुद जागना होगा और दूसरों को जगना होगा... की स्तिथि को बाकई में कैसे बेहतर बनाया जाय जिससे लोकतंत्र की स्मिता और हमारी अस्तित्व बची रहे...।
प्रणव झा
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